लोक की छाती पर सवार आततायी-भ्रष्ट तंत्र
लोक की छाती पर सवार आततायी-भ्रष्ट तंत्र
सुनील
भारतीय लोकतंत्र की 62 वीं वर्षगांठ पर हम अपने पड़ोसी देशों और दुनिया के अन्य गरीब देशों से तुलना करें तो अपने ऊपर गुमान कर सकते हैं। हमारा लोकतंत्र ज्यादा टिकाऊ और जीवंत साबित हुआ है। भारत में सेना पूरी तरह निर्वाचित सरकारों के अधीन है, न्यायपालिका और मीडिया स्वतंत्र है, चुनाव समय पर होते हैं, सरकारें भी बदलती रहती हैं। एक बार को छोड़कर पिछले छः दशक में किसी की हिम्मत भी नहीं हुई कि आपातकाल जैसी तानाशाही की ओर कदम बढाए।
किन्तु इतना काफी नहीं है। भारतीय जनता की समस्याओं तथा आकांक्षाओं की कसौटी पर हमारा लोकतंत्र बुरी तरह असफल दिखाई दे रहा है। जिसे हम गर्व से संख्या की दृष्टि से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं, उसी में दुनिया की सबसे ज्यादा कुपोषित, भूखी, बीमार और अशिक्षित आबादी भी रहती है। पिछले एक वर्ष की घटनाओं ने भारत की निर्वाचित सरकारों व जन प्रतिनिधियों तथा भारतीय जनता के बीच गहरी खाई को और ज्यादा उजागर किया है। एक भ्रष्ट, आततायी, असम्पृक्त व संवेदनशून्य होता तंत्र भारतीय लोक की छाती पर सवार दिखाई देता है। भारत के चुनाव पूंजी, दो नंबरी धन, अपराधी तत्वों, जाति व साम्प्रदायिक उन्माद के खेल बन गए हैं, और इस मायने मंे स्वतंत्र नहीं रह गए हैं। आतंकवाद-उग्रवाद-माओवाद की बढ़ती समस्याएं, बढ़ती हिंसा व आत्महत्याएं भी भारतीय लोकतंत्र की असफलता और कुछ बुनियादी गड़बडि़यों की ओर इशारा कर रही हैं। वक्त आ गया है जब इन्हें चिन्हित करके इनको दूर किया जाए।
लोकतंत्र मंे सुधार की चर्चा अक्सर मात्र चुनाव सुधारों तक रुक जाती है। किन्तु लोक और तंत्र के बीच बढ़ती दूरी का सबसे बड़ा कारण भारत की केन्द्रीकृत शासन व्यवस्था है। ब्रिटिश साम्राज्य की जरुरत के मुताबिक बने एक केन्द्रीकृत ढांचे को आजाद होने पर भी हमने करीब-करीब जारी रखा है। सत्ता जितनी केन्द्रित होगी, उतनी ज्यादा लोक-नियंत्रण से परे, भ्रष्ट तथा दुरुपयोग की संभावना वाली रहेगी। इसके क्रांतिकारी विकेन्द्रीकरण की जरुरत है। केन्द्र व राज्य सरकारों के विषयों एवं अधिकारों में भारी कटौती करके ग्राम सभाओं, ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं तथा जिले स्तर पर निर्वाचित सरकारों को हस्तांतरित करने होंगे। मौजूदा पंचायती राज इसका माॅडल नहीं है। वास्तविक अधिकारों, जिम्मेदारियों तथा आय के स्वतंत्र स्त्रोतों के अभाव में हमारी पंचायतें तो नौकरशाही के भ्रष्ट तंत्र का ही विस्तार बन गई हैं। यदि सही मायने में सत्ता के केन्द्र नीचे आएंगे तो लोगांे का दखल, नियंत्रण और आत्मविश्वास बढ़ेगा तथा लोकतंत्र मंे भी गुणात्मक सुधार आएगा। लातीनी अमरीका में स्वशासन तथा जनभागीदारी के जो प्रयोग पिछले दिनों हुए, उनसे भी हम सीख सकते हैं।
नागरिक आजादियों तथा लोकतांत्रिक अधिकारों की पूरी सुरक्षा, सत्याग्रह व जनांदोलनों का सम्मान, दमनकारी कानूनों का पूरा खात्मा तथा पुलिस, कानून एवं न्याय-तंत्र का सुधार भी लोकतंत्र की सफलता के लिए जरुरी है। इरोम शर्मिला जैसे प्रसंग गांधी के भारत के लिए कलंक हैं। भारत की जाति-व्यवस्था, स्त्री-पुरुष गैरबराबरी, अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व, शिक्षा का व्यवसायीकरण, घोर आर्थिक गैर- बराबरी तथा बढ़ता कंपनी राज भी लोकतंत्र को खोखला कर रहे हैं। आखिरकार सच्चा लोकतंत्र एक बराबरी पर आधारित समाज मंे ही आ सकेगा।


