लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है मौत की सजा
लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है मौत की सजा
मु. आरिफ
उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या के आरोपियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने के बाद, मृत्युदण्ड को समाप्त किये जाने सम्बन्धी बहस और भी तेज हो गयी हैं। देश के बुद्धिजीवियों का एक तबका इसे फांसी की सजा की समाप्ति की ओर एक बड़ी पहल मान रहा है। भारत समेत दुनिया भर में मृत्युदण्ड की समाप्ति को अब एक विकसित और सभ्य समाज की आदर्श दण्ड व्यवस्था के मानक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार दुनिया के 140 देश मृत्युदण्ड को समाप्त कर चुके हैं। भारत के पड़ोसी नेपाल और भूटान जैसे देश पहले ही मृत्युदण्ड को समाप्त कर चुके हैं। ऐसे में, यह और भी आवश्यक हो जाता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में न्यायपरक दण्ड व्यवस्था स्थापित की जाये और भारतीय राज्य और न्याय व्यवस्था मृत्युदण्ड जैसी बर्बर और आदिम सजा को समाप्त कर प्राकृतिक न्याय के मूल्य को स्थापित करे।
मृत्युदण्ड को समाप्त करने की पुरजोर वकालत सबसे पहले सन 1764 में इटली के न्यायशास्त्री सीज़र बेकारिया ने अपनी किताब ’एन एस्से ऑन क्राइम्स एंड पनिशमेंट’ में की थी । बेकारिया के अनुसार मृत्युदण्ड एक बर्बर और अमानवीय प्रथा है तथा मृत्युदण्ड से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है।
क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि जो न्याय व्यवस्था हत्या को गम्भीरतम अपराध मानती है और इसके लिये कठोर दण्ड का प्रावधान करती है, स्वयं कठोरतम दण्ड के नाम पर खुले तौर पर हत्या (मृत्युदण्ड) करती है ? वास्तव में मृत्युदण्ड को निरोधक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि इससे अपराधों में कमी आयेगी लेकिन इस बात के विश्वसनीय आंकड़े अब तक उपलब्ध नहीं है। इसके उलट अमेरिका के उन राज्यों में हत्या जैसे गम्भीर अपराधों की दर अधिक है, जिनमें मृत्युदण्ड का प्रावधान है बनिस्बत उन राज्यों के, जहाँ मृत्युदण्ड समाप्त कर दिया गया है।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत मृत्युदण्ड अपराध नहीं बल्कि अपराधी को ही समाप्त कर देता है। इसके साथ ही उसमे सुधार की सभी संभावनाओं को भी समाप्त कर देता है। दण्ड का उद्देश्य समाज को सबक देना नहीं है बल्कि समाज को बेहतर बनाना है और अपराधी में सुधार करना है।
जस्टिस ए.के.गांगुली ने सोनीपत में एक सेमिनार में मृत्युदण्ड को क्रूर, अलोकतांत्रिक और गैर जिम्मेदराना करार दिया था। साथ ही इसे संविधान के जीने के अधिकार के भी विपरीत बताया था।
वास्तव में मृत्यदण्ड राज्य के असीमित और निरपेक्ष शक्ति प्रदर्शन को अभिव्यक्त करता है। इसलिये मृत्यदण्ड को समाप्त किया जाना और भी आवश्यक है क्योंकि इसका अर्थ यह होगा कि राज्य की शक्ति असीमित नहीं है और वह कुछ भी करने (मृत्यदण्ड देने) के लिये स्वतंत्र नहीं है।
दूसरी ओर स्वयं कोई भी राज्य इतना पवित्र नहीं है कि वह किसी नागरिक का जीवन समाप्त कर सके, जिनके संरक्षण का उत्तरदायित्व राज्य पर था। राज्य इसे एक आसान विकल्प के रूप में स्वीकार कर लेते हैं और मान लेते हैं कि मृत्युदण्ड पाए अपराधी में सुधार सम्भव नहीं है। वस्तुतः यह राज्यों का एक पलायनवादी रवैया ही है।
बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा मृत्यदण्ड को दुर्लभतम मामलों में ही दिये जाने का उल्लेख किया गया है लेकिन अपराधों के सम्बन्ध में यह निर्धारण करना अँधेरी कोठरी में काजल ढूँढने जैसा है। इसके अलावा भारत में पिछले दिनों न्यायपालिका द्वारा सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने हेतु मृत्यदण्ड दिया गया है। यह तथाकथित सामूहिक चेतना भी अत्यन्त संदेहास्पद है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पूर्वोत्तर भारत या फिर आदिवासी बहुल क्षेत्रों की सामूहिक चेतना का वज़न कितना है। दिल्ली गैंगरेप के सभी अभियुक्तों को मृत्यदण्ड दिया जा चुका है वहीं मणिपुर की लौह महिला इरोम शर्मिला की मालोम नरसंहार के खिलाफ बारह साल से आज तक जारी भूख हड़ताल भारत में पूर्वोत्तर के हक में व्यापक संवेदनशीलता नहीं बना पायी है।
यह सामूहिक चेतना मीडिया और प्रचार के अन्य साधनों से तैयार की जाती है, इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में यह सामूहिक चेतना बिलकुल रोमन कालीन भीड़ की तरह है जो हारे हुये ग्लैडिएटरों के जीवन का फैसला करती थी। इस तरह की न्याय व्यवस्था को कतई लोकतांत्रिक और मानवीय नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इन्साफ, मूल्यों और सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिये न कि भावनाओं और आवेश पर, जैसा कि महात्मा गाँधी ने कहा था आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अँधा बना देगी ।
वस्तुतः मृत्युदण्ड देकर राज्य हमारी न्याय व्यवस्था में (न्यायिक) हत्या को स्वीकृति प्रदान कर रहे होते हैं। अल्बर्ट कामू ने अपनी रचना ’रेफ्लेक्शन ऑन द गिलोटीन’ में लिखा था कि हम यह तो जानते हैं कि कुछ अपराधों के सम्बन्ध में कठोर दण्ड अनिवार्य होता है, लेकिन हम कभी यह नहीं कह सकते कि किसी को मृत्यदण्ड कब दिया जाना चाहिए। मृत्युदण्ड के स्थान पर उम्रकैद एक लोकतांत्रिक और अधिक न्यायिक व्यवस्था होगी ।


