दयामनी बरला सिर्फ झारखण्ड के आदिवासियों की ही आवाज नहीं है। आज दयामनी ने अपने संघर्षों से बड़े बड़े पूंजीपतियों के षड्यंत्रों को नाकाम कर दिया है। जिंदल और मित्तल भले ही दुनिया के आमीरों में अपनी गिनती करवाते हों पर झारखण्ड के जंगलों ने उन्हें जनता की ताकत के आगे झुकाने पर मजबूर कर दिया है। दयामनी के नेतृत्व में आदिवासियों ने अपनी लड़ाई को जिस तरह से लड़ा है वो पूंजीवाद के खिलाफ गरीबो की ताकत को दिखने आ एक बड़ा उदाहरण है। अब वे चुनाव मैदान में हैं। पिछले दो दिन तक डा. सुनीलम उनके चुनाव अभियान में शामिल हुए। कार्यकर्ताओं की कई बैठक को दयामनी और सुनीलम ने संबोधित किया। सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार दयामनी बरला की झारखंड में चल रहे आंदोलनों में दयामनी बारला की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे नगड़ी और मित्तल विरोधी आंदोलनों में सक्रिय रही हैं। जन आन्दोलन की अभियान समिति देश के सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं से दयामनी बरला के चुनाव में मदद करती है ।
दयामनी बारला का जीवन एक संघर्ष की कहानी है, साथ ही असाधारण दृढ़ता और उपलब्धि की दास्तान भी है। अक्सर रेलवे प्लेटफार्म पर रात गुजारने वाली बारला ने अपनी बहुत कम आमदनी से बचाकर अपनी शिक्षा पर खर्च किया। आपनी मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता में प्रवेश किया और झारखण्ड की पहली आदिवासी महिला पत्रकार बनीं। अपने काम की वजह से उन्होंने कई सम्मान भी हासिल किए। उन्होंने अपना बचपन रांची में एक छोटी सी चाय की दुकान चलाकर गुजारा जिसके बारे में उनका कहना है कि यह लोगों की बात सुनने के लिए बेहतरीन स्थानों में से एक है। स्वीडन की कांफ्रेंस में उन्होंने झारखण्ड के चालीस गांवों की बात उठाई जो अर्सेलर मित्तल स्टील प्लांट की वजह से अपनी जमीन गंवा सकते हैं। कंपनी इस क्षेत्र में विश्व के सबसे बड़े स्टील प्लांट को लगाना चाहती है जिस पर वह 8.79 बीएन डॉलर खर्च करेगी। ग्रीन फील्ड स्टील प्रोजेक्ट को 12000 एकड़ भूमि और एक नया पावर प्लांट चाहिए। बरला के संगठन- आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच (स्थानीय और आदिवासी लोगों की पहचान की सुरक्षा करने वाल फोरम) का कहना है कि स्टील प्रोजेक्ट के लगने से बड़े स्तर पर विस्थापन होगा और वन क्षेत्र की हानि होगी। इसका प्रभाव जल संसाधनों पर, इकोलॉजी पर और पर्यावरण के साथ स्थानीय लोगों के जीवन पर पड़ेगा।
बारला का कहना है कि ‘हम एक इंच जमीन भी नहीं देंगे’। यह कहना गलत नहीं होगा कि दयामनी बारला मित्तल के लिए कुछ इसी तरह की मुश्किलें पैदा कर सकती हैं जैसी टाटा मोटर्स के लिए पश्चिम बंगाल में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पैदा की थीं। बारला और गांव वालों का साफ तौर पर कहना है कि ‘‘हम अपनी जान देने के लिए तैयार हैं लेकिन अपने पूर्वजों की भूमि का एक इंच भी मित्तल को नहीं देंगे। मित्तल को उनकेपुरखों की भूमि छीनने की इजाजत नहीं दी जाएगी।’’
नोट -दयामनी बरला के बारे में बीबीसी की साईट और ब्लाग से यह सामग्री ली गई है। जन आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्त्ता ऐसे सभी उम्मीदवारों के बारे में उनका सक्षिप्त परिचय और आन्दोलन की फोटो भेज सके तो हम इसे साईट पर डाल सकेंगे।
जन आन्दोलन की अभियान समिति की तरफ से जारी