लोग अपने-आप को ख़ुद ही पंडित और उस्ताद घोषित कर रहे हैं- शुभा मुद्गल
लोग अपने-आप को ख़ुद ही पंडित और उस्ताद घोषित कर रहे हैं- शुभा मुद्गल
भाषा का राजनीतिकरण होने से बोलियाँ ख़त्म हो रही हैं- मृणाल पाण्डे
मृणाल पाण्डे की कृति “ध्वनियों के आलोक में स्त्री’’ का लोकार्पण
राम जोशी
नई दिल्ली- भारतीय शास्त्रीय संगीत की मशहूर गायिका शुभा मुद्गल ने कहा है कि समय के साथ संगीत की दुनिया भी बड़ी तेज़ी से बदल रही है. इस बदलाव के साथ कुछ अच्छी चीजें भी हो रही हैं, लेकिन शास्त्रीय संगीत की दुनिया में अब लोग ख़ुद ही अपने-आप को पंडित और उस्ताद घोषित कर देते हैं. साधना और संयम की कमी हो रही है. आज ठुमरी के विशेषज्ञ काम हो रहे हैं. ठुमरी गायिका के लिए परिपक्व मानसिकता की जरूरत होती है. आजकल जो लोग गा रहे हैं, उन्हें बोलियों के शब्दों का इस्तेमाल करना नहीं आता. इससे अर्थ का कुअर्थ हो रहा है. यह एक चिंता का विषय है.
संगीत जगत के अनदेखे-ओझल वृत्तान्तों को पेश करने वाली मृणाल पाण्डे की इस कृति के लोकार्पण समारोह के दौरान निकले प्रसंगों पर उन्होंने कहा कि महिला रचनाकारों ने तमाम बंदिशों की रचना की, लेकिन कभी किसी ने उन रचनाओं पर अपने नाम की मुहर नहीं लगाई, जबकि पुरुष रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में अपने उपनामों का इस्तेमाल किया है. इसलिए हम उन बंदिशों को उनकी रचनाकार महिलाओं के नाम से नहीं जानते. उनको शायद पारिवारिक, सामाजिक अड़चनें रही होंगी, तभी वे अपना नाम अपनी रचनाओं में नहीं देती थीं.
उन्होंने कहा कि पहले भली महिलाएं घर-गृहस्थ सँभालने वाली हुआ करती थीं और गायिकाएं बुरी महिलाओं की श्रेणी में आती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं है.
किताब की लेखिका मृणाल पाण्डे ने संगीत के इस हालात के लिए हर क्षेत्र में हो रहे राजनीतिकरण को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि भाषा का राजनीतिकरण होने से बोलियाँ ख़त्म हो रही हैं. हिंदी ने बोलियों से नाता तोड़ दिया है. ध्वनियाँ बोलियों में ज्यादा खिलती हैं. हमारी सारी बंदिशे बोलियों में ही हैं.
आज हम जो संगीत देख रहे हैं वह राज-समाज ने मिलकर बनाया है. राज-समाज की इस चमक-धमक में संगीत के बड़े-बड़े उस्ताद भी अपना भविष्य चमका रहे हैं. उनकी दिलचस्पी महिला कलाकार की प्रतिभा निखारने में कम और अपना भविष्य चमकाने में ज्यादा है.
कवि और संगीत समीक्षक यतीन्द्र मिश्र के इस सवाल कि उन्होंने गाना छोड़ कर गाने पर लिखने की वजह पर मृणाल पाण्डे ने कहा, ‘कला का क्षेत्र बड़ा निर्मम और कठोर होता है. आपको तय करना होता है कि आपका बाज़ यानी आपकी लगन किस में है. और मेरा रुझान लिखने में था. मैं शब्दों के साथ ऐसे खेल सकती हूँ जैसे कोई बतख का बच्चा पानी में खेलता है’.
वरिष्ठ कवि और समीक्षक अशोक वाजपेयी ने कहा कि समय के साथ संगीत का भी लोकतांत्रिकीकरण हुआ है. लोकतांत्रिकीकरण होने से शास्त्रीय संगीत, जो एक अभिजात वर्ग का ही संगीत हुआ करता था, वह अब जन-जन तक पहुँच रहा है. इससे संगीत के श्रोताओं की तादाद तो बढ़ी है, लेकिन संगीत अपनी जटिलताओं और सूक्ष्मताओं से दूर होता जा रहा है. लोकप्रिय मंचों से बारीक़ काम नहीं हो सकता. बावजूद इसके हमें निराश होने की जरूरत नहीं है.
श्री वाजपेयी ने कहा कि जिस प्रकार भक्ति करने से ज्ञान मिलता है, उसी तरह रसिकता से भी ज्ञान हासिल होता है. आज एक ऐसा श्रोता वर्ग तैयार हो रहा है, जो इस कला को गंभीरता से ले रहा रहा है, भले ही इस बारे में उसकी समझ शून्य हो. धीरे-धीरे सुन कर भी समझ हासिल की जा सकती है. ...और नया वर्ग इस संगीत को सुनकर इस नतीजे पर पहुंच रहा है कि यह संगीत, साढ़े तीन मिनट के गाने से बेहतर लगता है, कुछ तो बात है इसमें. ये शास्त्रीय संगीत के लिए शुभ संकेत हैं.
पुराने समय में संगीत पर राजे-रजवाड़ों का वर्चस्व होने की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि अभिजात वर्ग ने शास्त्रीय संगीत को खांटी शिल्प में ढालने की कोशिश की थी. अब ये वर्जनाएं टूट रही हैं. उन्होंने कहा कि हमारा संगीत मूलतः गायन है और गायन के क्षेत्र में अच्छी-खासी युवा पीढ़ी विकसित हुई है. खास बात ये है कि इस पीढ़ी में घरानों के प्रति आकर्षण बढ़ा है.
श्री वाजपेयी ने पुराने समय में संगीत में महिला गायिकाओं की दशा का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले महिलाओं को इस क्षेत्र में सामाजिक लांछन का सामना करना पड़ता था. आज हमारे समाज में स्त्रियाँ बोलने लगी हैं. इसलिए अच्छा गा रही हैं. अब सामाजिक लांछन जैसी बातें ख़त्म हो गई हैं.
कार्यक्रम का संचालन करते हुए यतीन्द्र मिश्र ने अपने सवालों के माध्यम से संगीत जगत के कई अनदेखे पहलुओं को विशेषज्ञों के सामने रखा.
राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक सत्यानन्द निरुपम ने कार्यक्रम में आए सभी अतिथियों का स्वागत किया और प्रबंध निदेशक अशोक माहेश्वरी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया.


