वकील की वकालत
वकील की वकालत
जुगनू शारदेय
तर्क जिसका पेशा हो , उसे बहुत नामों से पुकारा जाता है । एक नाम वकील भी है । एक मायने में लाबीकारक भी वकील ही होता है । यह अपनी बात और तर्क से समझाता है कि गलत कैसे सही होता है या सही कैसे गलत होता है । यह कोई अचरज की बात नहीं कि एक जमाने में सारे नेता वकील होते थे । वकील भी नहीँ बैरिस्टर । सच बात यह है कि बहुत सारे लोगों को बैरिस्टर का मतलब नहीं मालूम होता है । बस इतना समझिए कि विलायत से कोई बड़ी डिग्री पास बड़ा वकीलनुमा जीव होता है । ऐसे ही एक वकील हैं कपिल सिब्बल । फिलहाल भारत सरकार में मानव संसाधन मंत्री होते । विलायत पास से बारिस्टरी पास नेताओं के जमाने के होते तो शिक्षा मंत्री कहलाते । पर बड़े लोगों की बड़ी बात होती है । हमारे देश में ऐसे ही बड़े लोगों की कमी नहीं है । सो एक दिन एक बड़े आदमी राजीव गांधी ने तय किया कि शिक्षा मंत्री मानव संसाधन मंत्री कहलाएगा । बड़ा भारी और बहुत बड़ा विभाग है यह । लोग कहते हैं कि लगभग सवा सौ विभाग इस मंत्रालय के पास है । राजनीति में कभी कभी नहीं अकसर ही बिल्ली के भाग से छींका टूटता है । टूटा । और अतिरिक्त प्रभार के नाम पर सूचना टेक्नॉलॉजी मंत्रालय भी मिल गया । इसी विभाग के पास है हवा हवाई उर्फ मामला ए मोबाइल । इसी मोबाइल ने जड़ बना रखा है संसद को और गतिशील बना रखा है संसदीय परंपरा और प्रतिष्ठान को भी ।
अब देखिए न , एक हवाहवाई मुद्दे पर क्या से क्या नहीं हुआ । एक मंत्री ए. राजा का बजा बाजा । मामला यहां पर भी नहीं रुका । देश को सी ए जी ने याद दिलाया कि हवाहवाई के खेल में ए राजा ने 1 करोड़ 76 लाख रुपए का नुकसान देश का करा दिया । आप कल्पना कर सकते हैं कि उस वक्त प्याज महंगा नहीं हुआ था , पर भारत माता इतने बड़े नुकसान पर जार जार हंस रही थी । भारत माता कितना रोए बेचारी । रोते रोते तो वह इंडिया हो गई । और इंडिया को सिर्फ हंसना आता है । देखिए न , इंडिया तो प्याज के आंसू भी नहीं रो रहा है । और क्यों रोए । दूध भी इतना महंगा होता जा रहा है कि किसी को नहीं कहा जा सकता कि तुम दूध के धुले हो । इसी से प्रेरणा पा कर बहैसियत सूचना टेक्नॉलॉजी मंत्रालय के मंत्री कपिल सिब्बल ने ठेठ सीबीआइ की तरह खोज की कि जिसे हम अब तक अरबों – खरबों का घाटा समझते थे , वह घाटा ही नहीं है ।
इसे कहते हैं वकील की वकालत की साबित कर देना कि घाटा , घाटा नहीं है ।
अब यहां पर वह यह भी कहते हैं , जरा घुमा फिरा कर – हंस बोल हंसा कर कि कहीं न कहीं सी ए जी के हिसाब किताब करने के अंदाज में गड़बड़ी है । यहां पर हमें अपने दादा की कहानी याद आती है कि मरते दम तक वह अपने सुपुत्र को कोसते रहे कि बड़ा भारी घाटा हुआ क्योंकि सुपुत्र ने उस दिन माल नहीं बेचा जिस दिन माल का बाव चढ़ा था । यहां तो माल भी सरकार का था , भाव भी सरकार का । सरकार कोई मौका परस्त व्यापारी तो नहीं कि जब चाहे तब भाव बड़ा दे । पर वकील की वकलत एक बहस को जन्म देती है कि सरकार का माल कौन बेचे , कब बेचे और क्यों बेचे । हमेशा हमें बाद में पता चलता है कि सरकारी माल सस्ते में बिका । अरे यार , यह राष्ट्रीय संपति है । इस पर सबका हक है । जैसे वकील को वकालत का हक है ।


