मोहन श्रोत्रिय
"बेमानी है उलझना
उन लोगों से
जो दावे करते हैं चाहे
साझे सरोकारों के।
समय कठिन है बेशक
और तय है यह भी
कि यह और कठिन होता
चला जाएगा। और तब बहुत
मुमकिन है
अमल करने लग जाएं वे भी
खुद के अहर्निश प्रवचनों पर।

कौन नहीं जानता
असल कसौटी होती है
वैचारिक निष्ठाओं की
#कहे और #किए की एकता ही।

तो इंतज़ार करें हालात के
पक जाने का। और सिर्फ़
साक्षी भाव बनाए रखें
तब तक तो अवश्य ही।"

मोहन श्रोत्रिय, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। आपने 70 के दशक में चर्चित त्रैमासिक ‘क्‍यों’ का संपादन किया और राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में आपकी अग्रणी भूमिका रही। आप 1980-84 के बीच राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ के महासचिव तथा अखिल भारतीय विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक महासंघ के राष्‍ट्रीय सचिव रहे।