हिमालय नीति अभियान
गावों खुंदन, डाक बंजार, जिला कुल्लू, हिमाचल प्रदेश
ईमेल: [email protected], फोन: 9418277220
दिनांक : 23-8-2015
प्रेषित:

माननीय विधायक महोदय,

हिमाचल प्रदेश विधान सभा –शिमला।

विषय: वन भूमि पर से दखल हटाने पर रोक तथा वन अधिकार कानून 2006 लागू करवाने बारे।

मान्यवर,

हम आप को यह पत्र जनहित में इस आश्य से भेज रहे हैं कि आप जन-प्रतिनिधि होने के नाते वन भूमि पर से चल रही गैरकानूनी वेदखली को रोकने तथा वन अधिकार कानून 2006 लागू करवाने बारे चल रहे विधान सभा स्तर में चर्चा करेंगे और प्रदेश के आदिवासी व अन्य परंपरागत वन निवासियों के हितों की रक्षा करने के लिए आगे आएंगे।

आप जानते हैं कि पिछले दिनों में वन विभाग ने वन भूमि पर से दखल हटाने के नाम पर अप्पर शिमला व प्रदेश के अन्य स्थानों में H.P. Public Premises & Land (Eviction & Rent Recovery) Act, 1971 के तहत कार्यवाही कर के वन भूमि पर लगे सेव के बगीचों को निर्ममता से काटा है। ऐसा ही अप्रैल माह में गोहर में भी किया गया था, जब एक बगीचे को काटा गया था। कांगड़ा तथा प्रदेश के अन्य हिस्सों में घरों से बिजली व पानी के कनेक्सन काटे गए तथा कुछ घरों को तोड़ दिया गया है। यह वेदखली कि कार्यवाही अभी जारी है। यह कार्य सरकार वन विभाग ने हिमाचल उच्च न्यायालय के 6 अप्रैल 2015 व इस से पहले के आदेशों की आड़ में किया। इस में भी छोटे व गरीब किसानों पर ही गाज गिराई, जबकि बड़े किसानों तथा प्रभावशाली लोगों पर यह कार्यवाही नहीं की गई। यह केस उच्च न्यायालय में वर्ष 2008 से चल रहा है, जिस पर इस से पहले भी कोर्ट ने कई आदेश जारी किए, जब की प्रदेश सरकार ने आज तक इस पर वन अधिकार कानून 2006 की वाध्यता का पक्ष कोर्ट में नहीं रखा।

वेदखली की यह कार्यवाही वैधानिक नहीं है

वनाधिकार कानून 2006, जो अप्रैल 2008 से देश भर में लागू है, की धारा 4(5) के मुताविक, जब तक इस कानून के मुताविक वन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक आदिवासी व अन्य परंपरागत वन निवासी किसी भी तरह से उन के परंपरागत वन संसाधनों व वन भूमि पर आजीविका के लिए कर रखे उन के दखल से वेदखल नहीं किए जा सकता, न ही तब तक इसे नाजायज कब्जा कहा जा सकता है। नियामगिरी के फैसले WRIT PETITION (CIVIL) NO. 180 OF 2011

Orissa Mining Corporation v/s Ministry of Environment & Forest & Others दिनांक 18 अप्रैल 2013 में भी उच्चतम न्यायालय ने यह प्रस्थापना दी है कि जब तक वन अधिकारों की मान्यता व निरीक्षण की प्रक्रिया वन अधिकार कानून के तहत पूरी नहीं होती तब तक वन भूमि से वेदखली की कार्यवाही व भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया नहीं चलाई जा सकती है। जबकि प्रदेश में वन अधिकार कानून के तहत गठित मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्यस्तरीय निगरानी समिति ने भी दिनांक 22 मई 2013 की बैठक में प्रस्ताव पारित कर के यह कहा था कि कोई भी वन निवासी तब तक वेदखल नहीं किया जा सकता क्योंकि जब तक वन अधिकारों कि मान्यता व निरीक्षण की प्रक्रिया उक्त कानून के तहत पूरी नहीं हो जाती है। बैठक में सरकार से अनुरोध किया गया था कि इस पर उच्च न्यायालय में पुनरावलोकन याचका दायर करे, परंतु सरकार की ओर से कोई भी पहल नहीं हुई।

वन अधिकार कानून 2006 संसद द्वारा पारित एक विशेष अधिनियम है, जिसकी धारा-4 की उपधारा (1), (5) तथा (7) के तहत जब तक वन अधिकारों की मान्यता व निरीक्षण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती तब तक किसी भी तरह की वन भूमि से वन निवासियों की वेदखली नहीं हो सकती है। विशेष अधिनियम होने के कारण, दूसरा कोई भी प्रादेशिक व केंद्रीय वन तथा राजस्व कानून इस पर प्रभावी नहीं हो सकता। ऐसे में वन भूमि से वन निवासियों कब्जा हटाना वन अधिकार कानून व उच्चतम न्यायालय की अवहेलना है। ऐसे में प्रदेश भर में H.P. Public Premises & Land (Eviction & Rent Recovery) Act, 1971 के तहत की गई वेदखली की कार्यवाही बैधानिक नहीं है।

5 अगस्त 2015 को लोक सभा में Atrocity बिल 2015 पारित किया गया जिस में वन अधिकारों को प्राप्त करने से रोकना व गैरकानूनी वेदखली को प्रताड़णा की श्रेणी में शामिल कर दिया गया है।

हिमाचल प्रदेश में अप्रैल 2008 में आदिवासी क्षेत्रों में पहले चरण में इस कानून के तहत वन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया शुरू की गई परंतु यहाँ अभी तक आधे अधूरे दावे पत्र ही भरे जा सके हैं जबकि वन अधिकार पत्र अभी तक जारी नहीं किए हैं और दावे जिला वन अधिकार समिति के पास लंबित पड़े हैं।

दूसरे चरण में मार्च 2013 में गैर आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले परंपरागत अन्य वन निवासियों के वन अधिकार के दावे आमंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है जो प्रक्रिया अभी तक लंबित है। हिमाचल प्रदेश में लगभग सभी आदिवासी व गैर आदिवासी किसान (जो तीन पुश्तों से यहाँ रहते हैं) इस कानून के तहत वन निवासी की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में जब तक वन अधिकार कानून 2006 के तहत प्रक्रिया पूरी नहीं होती तब तक किसी भी वन निवासी की वेदखली किसी भी कानून के तहत नहीं हो सकती है।
वन अधिकार कानून के तहत पात्रता व अधिकार के प्रमुख: प्रावधान
वन अधिकार कानून में कोन से वन अधिकार प्रदान करता है :

1 सामूहिक वन अधिकार (Community Forest Resources-CFR-rights) – 13 दिसंबर 2005 से पहले के सभी परंपरागत उपयोग शामिल हैं :- पशु चराई, घास-पत्ती, लकड़ी, जड़ी-बूटी, फल, लघु वन उत्पाद, रास्ते, आस्था के स्थल, परंपरागत ज्ञान, लघु खनिज जैसे मिट्टी पत्थर इत्यादि, मछली, पानी, नदी-नाले, (शिकार को छोड़ कर) बाकी सभी तरह के वन उत्पाद का निजी उपयोग व बेचने से प्राप्त आय का अधिकार।

2 निजी वन अधिकार (Individual Forest Resources-IFR rights):- 13 दिसंबर 2005 के पहले से वन निवासी ने वन भूमि पर अपनी आजीविका के लिए खेती कर राखी हो तथा रिहायशी मकान बना रखा हो का अधिकार।

3 वन संरक्षण, उपयोग व संबर्धन का अधिकार।

4 विकास का अधिकार – गाँव के सामूहिक विकास कार्यों- जैसे स्कुल, सड़क, रास्ते, हास्पिटल, पानी की नहर व कुआं इत्यादि के लिए ग्राम सभा एक हेक्टर तक भूमि स्वीकार कर सकती है परंतु उस में 75 से ज्यादा पेड़ न कटते हों। यह प्रस्ताव जिलाधीश को भेजा जाएगा, जिस पर जिलाधीश को उक्त कानून में अधिकार प्राप्त है कि एक महीने में वन हस्तांतरण का आदेश कर के ग्राम सभा व कार्य करने वाले विभाग को स्वीकृति प्रदान करे। एक हेक्टर तक के ऐसे सभी गावों के सामूहिक कार्यों के लिए वन विभाग से हस्तांतरण की स्वीकृति लेने की जुरुरत नहीं होगी।

इस कानून के तहत दो वन आश्रित वन निवासी श्रेणियाँ वन अधिकार की पात्र हैं

1 आदिवासी वन निवासी- जो अपनी आजीविका की मूलभूत जरूरतों के लिए वन भूमि व वन संसाधनों पर निर्भर हैं। चाहे वे वन के अंदर रहते हों या वन से बाहर परंतु वे उस क्षेत्र में 13 दिसंबर 2015 से पहले से रह रहे हों और वनों का उपयोग कर रहे हों ।

2 अन्य परंपरागत वन निवासी- जो अपनी आजीविका की मूलभूत जरूरतों के लिए वन भूमि व वन संसाधनों निर्भर हैं। चाहे वे वन के अंदर रहते हों या वन से बाहर परंतु वे उस क्षेत्र में तीन पीढ़ियों (75 वर्षों) से रह रहे हों और वनों का उपयोग कर रहे हों।

नोट: ऐसे में हिमाचल के लगभग सभी निवासी, वन निवासी की श्रेणी में आते हैं। अन्य परंपरागत वन निवासी की व्याख्या करने वाला पत्र दिनांक 8 जून 2008 को पत्र संख्या 17014/02/2007 – PC&V (जिल्द VII) भारत सरकार से जारी किया गया है। हिमाचल सरकार को भारत सरकार से इस बारे में खास कर स्पष्टीकरण पत्र दिनांक 1-4-2013 को office memorandum F.No.23011/22/2010- FRA के तहत जारी किया गया है।
अधिकार पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया:-
1. वन अधिकार समिति (FRC) का गठन वन अधिकार कानून के तहत गठित गावों/ राजस्व गावों स्तर की ग्राम सभा करेगी। यह वन अधिकार समिति सभा के सदस्यों से वन अधिकार के निजी व सामूहिक दावे आमंत्रित करेगी। दावों का दस्तावेजीकरण करने के बाद सांझा निरीक्षण किया जाएगा, जिस में वन, राजस्व व पंचायत विभाग के प्रतिनिधि भी भाग लेंगे। इस के बाद इस दावों के दस्तावेज़ को गावों/ राजस्व गावों स्तर की ग्राम सभा में पारित करने के लिए पेश किया जाएगा। ग्राम सभा इसे पारित करके उप मण्डल अधिकारी की अध्यक्षता वाली उप मण्डल स्तर की समिति को भेजेगी, जो जांच के बाद जिला स्तर की समिति को दावों के दस्तावेज़ को अंतिम फैसले के लिए भेजेगी।

2. जिलाधीश की अध्यक्षता वाली यह जिला स्तरीय समिति, निरीक्षण व जांच के बाद उक्त दावों के अधिकार पत्र जारी करेगी। दस्तावेज़ की कमी या अन्य कारणों से आपत्ति की स्थिति में समिति दावे को ग्राम सभा को वापिस भेज सकती है परंतु खारिज करने का अधिकार उसे नहीं है।

3. मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य स्तरीय निगरानी समिति को पूरी प्रक्रिया की निगरानी रखनी है और विवाद की स्थिति में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार है।

नोट: हिमाचल प्रदेश में लगभग 90% से ज्यादा वन अधिकार समितियों का गठन हो चुका है, परंतु शहरी क्षेत्रों में इन का गठन होना अभी वाकि है। जबकि उपमंडल स्तरीय समिति, जिला स्तरीय समिति व राज्य स्तरीय समिति का गठन 2013 में हो चुका है।


वन अधिकार कानून के तहत वन अधिकारों की मान्यता के बाद अधिकारों की वास्तविक स्थिति:
आज जो वन बर्तनदारी के हक हकूक लोगों को मिले हैं, वे राज्य द्वारा प्रद्त छूट के तहत है, जिसे record of Bartan में वन बंदोबस्त व वन की working planकी compartment history sheet में गावों बार दर्ज किया गया है । राजस्व बंदोवस्त में Village Rights Records का विस्तृत हवाला वाजिव-उल-अर्ज तथा नक्शा बर्तन में दर्ज है। परंतु सरकार इन अधिकारों व छूटों को कभी भी समाप्त कर सकती है।

1 वन अधिकार कानून के तहत वन अधिकारों की मान्यता के बाद अधिकारों की वास्तविक स्थिति कानूनन हो जाएगी तथा अधिकारों का लोप सरकार नहीं कर पाएगी। लोप की स्थिति में सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून के तहत धारा 42(iii) के अनुसार अधिकारों का अधिग्रहण करना होगा।

2 वनों का प्रबंधन, विकास, तथा संरक्षण की ज़िम्मेदारी समुदाय की होगी। लोक मित्र वनों का विकास और समाज व जीवजगत के लिए लाभकरी बृक्षों,जड़ीबूटी, फलदार पेड़ व घास पति इत्यादि का रोपण करना। वन उत्पाद का सामूहिक दोहन व उसे प्रशोधन व बेचना। वन working plan के बनाने व उसे लागू करवाने की ज़िम्मेदारी। वन क्षेत्र में MNREGA व अन्य योजनों के तहत विकास व संरक्षण के कार्य करना।


हिमाचल में वन भूमि पर खेती करने के कारण:
1 प्रदेश में सरकारी आंकड़ों के मुताविक कुल क्षेत्रफल का 11% क्षेत्र की निजी मलकीयत के रूप में कृषि भूमि के तौर पर उपलब्ध है। समय के साथ लोगों द्वारा नए घेरों का निर्माण, उद्योगों, बांधों, जलविद्युत परियोजनयों व सार्वजनिक कार्यों जैसे सड़कों व संस्थानों इत्यादि के लिए भी इस भूमि का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ है। ऐसे में वास्तव में कृषि भूमि घट कर 9% से भी कम रह गई है। कृषि भूमि की कमी के इस तथ्य को 60 के दशक में उस समय कि सरकार महसूस समझा और नौतोड़ का प्रावधान इसी लिए 1968 में किया गया। जबकि ने भूमि सुधार कानून पूर्ण तौर पर लागू किया जा चुका था। क्योंकि यहाँ पहले से आवादी के मुकवले कृषि भूमि कम थी।

2 आवादी बढ्ने के कारण भी जोतें का आकार कम हो गया हैं, आज स्थिति यह है कि 80% से भी ज्यादा किसान सीमांत किसान हो गए हैं, जिन के पास केवल पाँच बीघा से कम कृषि भूमि रह गई है। बहुत से लोग तो गावों में भी पारिवारिक बँटवारे के बाद विस्वों के मालिक रह गए हैं।

3 हिमाचल की ज़्यादातर कृषि भूमि ढलान-दार व असिंचित है। ऐसे में देश के दूसरे इलाकों के मुकाबले यह भूमि कम उपजाऊ भी है। इसीलिए बार-बार नौतोड़ की आज भी मांग होती रहती है और लोगों ने वन भूमि पर कब्जे भी किए हैं तथा उन को नियमित करने के सरकारी प्रयास भी होते रहे हैं।


वन भूमि पर कब्जों की वास्तविक स्थिति:
1 हिमाचल के किसानों को परंपरा से बाजिब- उल – अर्ज में अधिकार प्राप्त है कि वे खेत से लगती वन भूमि पर कब्जा कर के खेती कर सकता हैं। जिस का बंदोबस्त के दौरान मलकियत के तौर पर इंद्राज़ होता रहा है।

2 किसानों के पास कृषि भूमि कम होने के कारण ही नौतोड़(वन व सरकारी भूमि से कृषि के लिए भूमि का आबंटन) का प्रावधान 1968 में किया गया था। जिस के तहत 1980 तक नौतोड़ मिलती रही है। वन सरक्षण कानून 1980 के पारित होने के बाद वन भूमि का खेती के लिए हस्तांतरण पर प्रतिबंध लग गया। केवल संविधान की 5वीं अनुसूची के क्षेत्रों (आदिवासी क्षेत्र) में राज्यपाल की अनुमति से यह प्रतिबंध हटाया जा सकता है, जो अनुमति हिमाचल सरकार ने दिनांक 17-7-2014 को पत्र संख्या FFE-B-F(5)2/2002-Pt।IV-Loose के तहत प्राप्त कर ली है। गैर अधिवासी क्षेत्रों में यह छूट नहीं तब तक मिल सकती है, जब तक इस बारे में वन संरक्षण कानून में संसद के दोनों सदनों से इस पर सशोधन पारित नहीं होता है, जो आज के समय में संभव नहीं लगता। आज केवल किनौर में ही छ: हजार से ज्यादा नौतोड़ की मिसलों के पट्टे 1980 से लंबित हैं, जबकि दूसरे जिलों में भी इसी तरह की कई हजारों नौतोड़ मिसलें लंम्बित हैं जब की किसान 1980 से पहले से उन पर काब्ज है। जिन्हें आज वन विभाग नाजायज कब्जा घोषित कर रहा है।

3 भाखड़ा, पोंग डैम व अन्य 1980 के पहले की जल विद्युत परियोजनायों की तो अजब स्थिति है, जिस में सरकार ने अघोषित तौर पर स्वयम विस्थापित लोगों को वन भूमि पर कब्जे करने को प्रेरित किया। भाखड़ा विस्थापित लोग आज भी कहते हैं कि सरकार ने साठ के दशक में हमें लगते वनों पर घर व खेती करने को कहा। 1971 में भाखड़ा विस्थापितों के लिए पुनर्वास की नीति पारित की गई थी, जिसे जिस के तहत इस क्षेत्र के लिए विशेष नौतोड़ नीति के तहत लागू की गई। कुछ विस्थापित लोगों को इस नीति के तहत पट्टे हासिल हुए परंतु आज भी हजारों विस्थापित परिवार वन भूमि पर खेती कर रहे हैं परंतु उन्हें आज तक मालियत के पट्टे नहीं मिले हैं। आज इन लोगों पर नाजायज कब्जे के केस दर्ज कर के नोटिक जारी किए गए हैं।

4 प्रदेश सरकार ने HP Regularisation of Encroachments (in certain cases) on Government Land and Disposal of Encroached Public Property Rules, 2002 के तहत 20 बीघे तक के नाजायज कब्जे नियमित करने के लिए काबिज भूमि के शपथ पत्र मांगे। इस के तहत 1 लाख 65 हजार किसानों से भी ज्यादा किसानों ने कब्जे बहाली के शपथ पत्र तहसील कार्यालय में जमा किए। जिस पर वन संरक्षण कानून 1980 की बजह से न्यायालय ने प्रतिबंध लगा दिया, जब की आज वे सभी शपथ पत्र नाजायज कब्जे के प्रमाण बन गए। वास्तविक स्थिति यह है कि प्रदेश की सभी सरकारों ने कृषि भूमि कम होने की सचाई को समझा हैं और इसी लिए बार-बार खेती के लिए भूमि प्रदान करने की उक्त कोशिशें हुईं हैं।
इस समस्या का आज कानूनी समाधान क्या है:
आज देश में सरकारी/वन भूमि पर नाजायज कब्जे की बहाली का कोई भी प्रावधान नहीं है परंतु केवल वन अधिकार कानून के तहत 13 दिस्म्बर 2005 के पहले के कब्जे के अधिकार पत्र इस कानून के तहत मिल जाएँगे। अत: इस कानून के अमलिकरण की प्रक्रिया पूरी की जाए।

भारत सरकार ने 10 जून 2015 को देश के सभी मुख्य सचिवों को पत्र जारी किया है कि वन अधिकार कानून को लागू करने के लिए अभियान चलाए और छ: माह में वन निवासियों के सभी अधिकारों कि मान्यत की प्रक्रिया पूरी की जाए। परंतु प्रदेश सरकार ने कुछ दिनों पहले केंद्रीय सरकार से पंचायत चुनावों का बहाना कर के इस में छूट का आवेदन किया है।