प्रेम पंचोली
1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान न कोई दलित था और न सवर्ण था, सिर्फ उत्तराखण्डी थे जिन्हें एक शुद्ध पहाड़ी राज्य की चाहत थी। तब कौन सोचता था कि दस साल के भीतर ही लोग जाति और भेद में बँट जायेंगे और सामाजिक विषमता की खाई गहराने लगेगी। दलित हितों के लिये समर्पित ‘समता आन्दोलन’ का मानना है कि दलित उत्थान के लिए जितनी भी योजनाएँ राज्य में चलाई जा रही हैं, वे या तो कागजो में धूल फाँक रही हैं या उसका बजट साल के अन्त मे लैप्स किया जाता है।

राज्य बनने के बाद दलित उत्थान के लिए ‘स्पेशल कम्पोनेंट प्लान’ नाम से एक योजना आरम्भ हुई। योजना को जमीनी रूप देने के लिए अनुश्रवण कमेटियाँ बनाई गयीं। इस कमेटी के एक सदस्य ने राज्य के दलित बहुल ग्रामसभाओं में 20 पंचायत भवन बनाने का जिम्मा लिया था। एक पंचायत भवन की लागत 5 लाख रुपये थी। मगर एक भी भवन पूर्ण रूप से नहीं बना और एक करोड़ रुपयों का वारा न्यारा कर दिया गया। इस प्रकरण की जाँच बैठी, मगर मामला अब तक ठण्डे बस्ते में ही पड़ा हुआ है।

‘समता आन्दोलन’ के अनुसार निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं से सबसे अधिक प्रभावित दलित ही हो रहे हैं। विष्णुगाड़ जलविद्युत परियोजना से प्रभावित चांई गाँव के 25 परिवारों का अब तक पुनर्वास नहीं हुआ, कयोंकि इनमें अधिकांश दलित हैं। जबकि उत्तरकाशी में भू-धँसाव से प्रभावित सवर्णों के गाँव बागी का पुनर्वास वरुणावत के पैकेज से करवा दिया गया। श्रीनगर जल विद्युत परियोजना से बेघरबार दलितों के 35 परिवारों को मुआवजे के नाम पर फूटी कौड़ी तक नसीब नहीं हुई। जबकि इसी परियोजना से प्रभावित धारी देवी मंदिर के लिये 9 करोड़ रुपया दिया जा रहा है। समता आन्दोलन की रिपोर्ट में उल्लेख है कि अल्मोड़ा में आज भी किसी दलित को मकान किराये पर इसलिए नहीं मिलता कि वह अछूत है। उत्तरकाशी के मातली गाँव के दलित परिवार की पुष्पा व उसकी छोटी बहन बलात्कार की शिकार हुई। अब तक इस घटना की प्रथम सूचना रिपोर्ट ही नहीं लिखी गयी।

अब तो सरकारी योजनाओं में भी भेदभाव की ‘बू’ आने लगी है। संस्कृति विभाग एवं पर्यटन विभाग ने दो योजनाएँ आरम्भ कीं। इनके अनुसार संस्कृति का प्रशिक्षण सिर्फ दलितों को लेना है और पर्यटन विभाग को दलितों के मंदिरो का जीर्णोद्धार करना है। यह बात दलित समुदाय के गले नहीं उतर रही है। उनका कहना है कि उत्तराखण्ड में तो दलितों के अलग से न तो कोई मन्दिर हैं और न उनकी कोई अलग संस्कृति है। अलबत्ता बहुत सारे गाँवों में आज भी मंदिरों में दलितो का प्रवेश वर्जित है। जबकि न सिर्फ इन मंदिरों के शिल्पी दलित हैं, बल्कि पूजा-अर्चना के समय ढोल बजाने तथा मंदिरों की सजावट के तमाम कार्य दलित समुदाय के ही जिम्मे है। ऐसी अव्यावहारिक योजनायें बनाने के बदले सरकार उत्तराखण्ड के 16 हजार मंदिरो में दलितों के प्रवेश हेतु कोई उल्लेखनीय कार्य योजना बनाती।

एच. एन. बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल में भी एक संस्कृति निष्पादन केन्द्र की स्थापना की गयी है। यह केन्द्र भी बार-बार ढोलियों को प्रस्तुत कर उनके हुनर को संस्कृति का संरक्षण बताता है। लेकिन जब ये ढोली प्रशिक्षक की हैसियत से विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किये जाते हैं, तब उन्हें मेहनताने के बदले लॉलीपॉप थमा दिया जाता है। उधर विभिन्न विभागों में अनुसूचित जाति के 8000 पद रिक्त है, जिन्हें अब तक नहीं भरा गया है। दस वर्षो में सरकार ने गैरसैंण में एक ‘ढोल प्रशिक्षण केन्द्र’ की स्थापना अवश्य की, मगर इस केन्द्र की भी अब तक कोई उपलब्धि सामने नहीं आ पाई है। भेद-भाव के इन मुद्दो पर निर्वाचित दलित जन प्रतिनिधियों का दृष्टिकोण कुछ अलग है। वे कहते हैं कि यदि वे दलितों के उत्थान के मुद्दों पर प्रखर रूप से सामने आयेंगे तो वे भविष्य में चुनाव नहीं जीत पायेंगे। उनके हाथ में सिर्फ कलम है, स्याही और कागज किसी और के हाथ में है।
साभार नैनीताल समाचार