विधानसभाई चुनाव
प्रकाश कारात
असम, केरल, पुदुचेरी, तमिलनाडु तथा प0 बंगाल की विधानसभाओं के लिए चुनाव का एलान हो गया है। 4 अप्रैल से मतदान शुरू होगा और अलग-अलग क्षेत्रों में 16 मई तक मतदान जारी रहेगा। इन सभी राज्यों के विधानसभाई चुनाव की मतगणना 19 मई को होगी। इन चुनावों का महत्व सिर्फ इतना ही नहीं है कि इनसे संबंधित राज्यों में किस की सरकार बनेगी इसका फैसला होगा बल्कि इन चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति की भावी दिशा पर भी असर पड़ने जा रहा है।
भाजपा के नेतृत्ववाला गठबंधन, जिसे लोकसभा में अच्छा बहुमत हासिल हुआ था, इस गति को बनाए नहीं रह पाया है। महाराष्ट्र,

झारखंड तथा हरियाणा के चुनावों में शुरूआती जीतों के बाद, भाजपा की जमीन खिसकनी शुरू हो गयी। पहले दिल्ली और फिर बिहार के विधानसभाई चुनावों में उसे हार का मुंह देखना पड़ा जबकि लेाकसभा चुनाव में इन दोनों ही राज्यों में उसे जोरदार जीत हासिल हुई थी। मोदी सरकार के लंबे-चौड़े दावों से जनता का मोहभंग बिहार में खास तौर पर प्रखरता से सामने आया था।
बहरहाल, विधानसभाई चुनावों के इस चक्र में, असम को छोड़कर दूसरे किसी भी राज्य में भाजपा की कोई खास ताकत नहीं है। बहरहाल, असम में अच्छा प्रदर्शन करने के अलावा, भाजपा को इस चुनाव में दूसरे राज्यों में भी एक बढ़ती हुई ताकत होने का सबूत देना होगा। यह उसके लिए एक कठिन चुनौती साबित होने जा रहा है। पश्चिम बंगाल तथा केरल, दोनों में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में क्रमश: 17 फीसद तथा 10.3 फीसद वोट हासिल कर, पहले से प्रगति दिखायी थी। बहरहाल, उसके बाद से भाजपा के प0 बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरने के सारे प्रचार के बावजूद, अब यह स्पष्ट हो चुका है कि उसका जनसमर्थन नीचे खिसका है। यह सांप्रदायिक तनावों को भुनाने की उसकी सारी बदहवास कोशिशों के बावजूद हुआ है। केरल में भी भाजपा, संसदीय चुनाव में हासिल हुआ अपना वोट नहीं बनाए रख सकती है। लोकसभा चुनाव में उसे जो कांग्रेस विरोधी वोट हासिल हुआ था, उसका एक हिस्सा विधानसभाई चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूडीएफ को हराने के लिए एलडीएफ के पक्ष में पडऩे जा रहा है। इतना ही नहीं, केरल की जनता ने मोदी सरकार की नीतियों से पैदा हुई समस्याओं को भी झेला है। इसलिए, उसकी नजरों में यह महत्वपूर्ण होगा कि हिंदू सांप्रदायिकता तथा जातिवादी गुटों को बटोरने के जरिए केरल में आगे बढ़ने के भाजपा के मंसूबों को विफल किया जाए।
वास्तव में मोदी सरकार का 22 महीने का रिकार्ड, इन सभी राज्यों में चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने जा रहा है। भाजपा ने तमिलनाडु में लोकसभा चुनाव के समय कई पार्टियों को जोड़-बटोरकर एक गठजोड़ खड़ा किया था। उस गठजोड़ में शामिल रहीं ज्यादातर पार्टियां अब भाजपा का साथ छोड़ चुकी हैं। इनमें डीएमडीके, पीएमके तथा एमडीएमके जैसी पार्टियां शामिल हैं। ऐसे हालात में इस राज्य में भाजपा के चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद करना, ख्याली पुलाव पकाना ही होगा।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसका इस चुनाव में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। देश में जिन तीन बड़े राज्यों में उसकी सरकारें हैं, उनमें से दो-असम तथा केरल-में इस चक्र में चुनाव होना है। इनके अलावा एक कर्नाटक ही ऐसा बड़ा राज्य है, जहां उसकी सरकार है। उसकी अन्य सरकारें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर तथा मिजोरम जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्यों में ही हैं। केरल में उसकी ओमन चांडी सरकार अपने भ्रष्टाचार, संदिग्ध धंधों और राज्य के सामने उपस्थित आर्थिक समस्याओं का सामना करने में अपनी पूर्ण विफलता के लिए पूरी तरह से बदनाम हो चुकी है। एलडीएफ, केरल को सरकार से मुक्ति दिलाने और राज्य को नये रास्ते पर ले जाने के लिए बहुत ही अनुकूल स्थिति में है। असम में भी तरुण गोगोई की सरकार घेरे में फंसी हुई है। कांग्रेस के कई नेता दलबदल कर भाजपा में चले गए हैं और उसकी सरकार में शामिल रही बोडो पार्टी, अब भाजपा के साथ गठजोड़ कर चुकी है।
जहां तक सी पी आइ (एम) का सवाल है तमिलनाडु, पुदुचेरी तथा असम में पार्टी ने अपनी राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन के आधार पर अपनी कार्यनीति तय की है। पार्टी के स्वतंत्र विकास तथा वामपंथी व जनतांत्रिक ताकतों को गोलबंद करने का प्राथमिकता देने की समझ को आधार बनाकर, इन राज्यों में पार्टी ने किसी भी प्रभुत्वशाली क्षेत्रीय पार्टी के साथ कोई समझौता नहीं किया है। तमिलनाडु में दोनों बड़ी द्रविड़वादी पार्टियों के विकल्प के तौर पर चार पार्टियों-सी पी आइ (एम), सी पी आइ, एम डी एम के तथा वी सी के ने एकजुट होकर, जन कल्याण मोर्चा बनाया है। पुदुचेरी में भी जन कल्याण मोर्चे का गठन किया गया है। असम में, कांग्रेस और भाजपा, दोनों के खिलाफ लड़ने के लिए, छ: वामपंथी पार्टियों ने एक गठबंधन कायम किया है।
सी पी आइ (एम) और वामपंथ के लिए ये चुनाव पश्चिम बंगाल तथा केरल के चलते विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। बंगाल में लड़ाई सिर्फ सरकार बनाने की नहीं है। वहां पांच साल से लगातार पिटते आ रहे जनतंत्र के ही बचने नहीं बचने का सवाल है। वाम मोर्चा, जनतंत्र की रक्षा के लिए और गुंडों के आतंक राज के खिलाफ, एक मुश्किल लड़ाई में लगा हुआ है। यह लड़ाई ममता सरकार के लुटेरे कुशासन से बंगाल को बचाने की लड़ाई भी है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा, दोनों की राजनीति, बंगाल को एक सांप्रदायिक कढ़ाह में तब्दील कर देने वाली नीति है। तमाम जनतांत्रिक ताकतों को एकजुट कर के और जनता की एकता के जरिए, तृणमूल कांग्रेस इस चुनाव में हराया जा सकता है।
उधर केरल में एलडीएफ जनता के सामने एक जनहितकारी विकास एजेंडा रख रहा है, जिसके केंद्र में मेहनतकश जनता की आजीविका तथा अधिकार हैं। यूडीएफ सरकार की नीतियों तथा कुशासन के खिलाफ पिछले पांच साल में चलाए गए जनसंघर्षों का सुफल इस चुनाव में मिलने जा रहा है।