अंशु शरण
बनारस भारत का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करने के साथ ही साथ पूर्वांचल एवं पश्चिमी बिहार की अघोषित आर्थिक राजधानी भी है। और इसी मद्द्देनज़र इस चुनाव में उत्तर प्रदेश और बिहार के वोटरों को प्रभावित करने के लिए बनारस को सम्प्रेषण केंद्र बनाने में लगे राजनैतिक दलों ने मोदी केजरीवाल और मुख़्तार जैसे अलग अलग छवि वाले प्रत्याशी को इस राष्ट्रीय अखाड़े में उतारा है जो कि न सिर्फ बनारसीपन से दूर है बल्कि बनारस के इतिहास भूगोल और धार्मिक महत्ता से अर्जित किये गए सामाजिक एवं सांस्कृतिक विभिन्नता का राजनैतिक लाभ उठाने में लगे हुए हैं। इसके नाटकीय प्रस्तुतीकरण और प्रसारण में लगी हुयी टी. वी. मीडिया ने भी स्थानीय विकास के साथ-साथ बनारसीपन को जीवंत रखने वाले मुद्दों को भी दरकिनार किया है।
पिछले लोकसभा चुनावों में राष्ट्रवाद के नाम पर चुने गए वाराणसी के पूर्व और निवर्त्तमान सांसद सैलानी मात्र ही थे जिन्होंने संसद को आरामगाह समझते हुए कार्यकाल को शीतनिद्रा कि तरह पूरा किया। लेकिन इस बार स्थिति इसलिए भयावह है कि व्यक्तिवाद के चपेट में अँधा हो चुका राष्ट्रवाद, देश में आम चुनावों से पहले ध्रुवीकरण का केंद्र वाराणसी को बना रहा है जोकि बनारस कि सांस्कृतिक विभिन्न्ता और सम्पन्नता की लूट होगी।
अंशु शरण, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।