मुकेश कुमार

60 फीसद वाले युवा देश में बहुमत शिक्षित-कम शिक्षित युवाओं का निपट बेकार धक्के खाना समझ में आता है। असल में निरंतर गिरती अर्थव्यवस्था भी आंकड़ों की चोंचलेबाजी में विकास की ओर रेंगनें का दंभ भरती भी संदक दिख रही है। बुलेट ट्रेन सी तेजी से स्वास्थ्य सेवाओं व शिक्षण संस्थाओं का निजी पूंजी को खैरात में परोसना भी जमता है। देश में शिक्षकों के सालों से लाखों पद खाली रहने पर भी ठेकेदारी प्रथा के अधीन न्यूनतम मजूरी से भी कम पर शिक्षकों को बतौर दास व बंधुआ बनाए रखने की सारी जुगाड़बाजी थमने को राजी नहीं है। फिर भी हम देश से विश्व के स्तर पर शिक्षकों का निर्यात करके की दम लेंगे क्योंकि विकास के लिए सरजी का सपना भी तो पूरा करना है। फिर तमाम सच्चे राष्ट्रवादियों व देशभक्तों के ख्यालात से लंकेश, पानसरे, कलबुर्गी, अखलाक, पहलूखान आदि की हत्या भी नाजायज नहीं है। बेसक तमाम राष्ट्रवादियों के लिए गाय प्रथम माता है पर खिचड़ी भी तो हमारा राष्ट्रीय भोजन है ना और गोमूत्र राष्ट्रीय तरल पेय। लेकिन दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था, मेक इन इंडिया, डिजीटल इंडिया और विकासमान इंडिया के सामने किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याऐं, यूपी व गुजरात के अस्पतालों में थोक में हो रही मासूम बच्चों की मौतें, महिलाओं व बच्चियों पर पल-पल बढ़ती शारिरिक हिंसाएं, विकासमान साम्प्रदायिक धंधे व जातीय हिंसाएं व क्रूरताएं, असहिष्णुता जैसी बातें बोलना व कहीं लिखना जनाबेआली को कत्तई बरदाश्त नहीं है, ये सभी आंखें खोलकर सुन ले।

अंबानी-अडानी के सहयोग तथा नोटबंदी व जीएसटी से तो हम दुनिया में सबसे ज्यादा ताकतवर हो ही गए हैं। पर वो बात अलग है कि इससे इकोनॉमी तो कैशलैस नहीं हुई परन्तु देश की बड़ी आबादी अवश्य ही पूर्णतः कैशलैस हो गई है।

हम करते-करते इतना विकास कर गए कि बहुत ही कम समय में हमने लगभग दुनिया का चक्कर काट लिया है और हम वसुधैव कुटुम्बकम की फिलोसॉफी के ना केवल और नजदीक आ गए है बल्कि उसको भी पार कर गए हैं।

किसी देश के निजाम का विदेशी धरती पर जाकर 8-7 घन्टे के समय में 5-6 बार शूट बदलना भी तो एक तरह के विकास का ही प्रतीक माना जाना चाहिए? ट्रम्प से पाकिस्तान को गरियाना भी तो हमारे मजबूत होने का ही तो सुबूत है वो बात अलग है कि हमने उनको अरबों-खरबों का बिजनेस दिया है और हम उनके सामने लगभग नंगें हो गए है। फिर भी विकास तो हो ही रहा है ना चाहे नंगा ही सही? कोई बात नहीं मसूद अजहर को हम अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित नहीं करा पाए तो इससे हमारे भगवा झन्डें पर थोड़े ही कोई दाग लगा है।

झारखंड, उड़ीसा जैसे राज्यों में भूख से मौतें होना, भगवा सीएम के गृहजिला गोरखपूर के सरकारी हस्पताल में आक्सीजन खत्म हाने के कारण तीन दिन में 40 से ज्यादा मासूम बच्चों की मौत होना व विकास पुरुष के गृह राज्य के अहमदाबाद के सिविल हस्पताल में 36 घन्टें में 11 नवजात बच्चों की मौत, महाराष्ट्र के नासिक में 55 बच्चों की मौत होना, बच्चियों का लगातार गिरता लिंगानुपात, डेड साल बच्ची से लेकर 80 साल की बुढी के साथ हो रहे बलात्कार, महिला, दलित, आदिवासी व अल्पसंख्यकों पर निरंतर हमलो का बढ़ना, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार का चोपट होते जाना, देश की जनता को ना चाहते हुए भी दिल्ली के रेस कोर्स से नागपूर तक बुलेट मे बिठा घुमाते रहना, शिक्षा व इतिहास का भगवाकरण करना, मीडिया का सत्ता की गोद में बैठे रहना आदि आदि का राग अलापना ये विपक्ष की टुच्ची राजनीतिक चुनावी चालें है ऐसा हमारे हुक्मरानों व देश के लम्बरदारों का कहना है। क्योंकि अभी हिमाचल व गुजरात में विकास की स्वच्छ-निर्मल गंगा बहने वाली है।

हमारे उनका कहना है कि देश में अम्बेडकर व महिषासुर, शिक्षा व रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में सैंकड़ो लोगों का रोज मरना, किसान-मजूरों द्वारा सुसाइड करना, निजीकरण, बढ़ती मंहगाई, एफडीआइ, आरक्षण, महिला सुरक्षा आदि के इलावा भी तो अनेको राष्ट्रीय मुद्दे हैं जैसे राष्ट्रभक्ति, हमारी संस्कृति, कश्मीर का मसला, राम मंदिर, स्वच्छता, गोडसे की देशभक्ति, पाकिस्तान का मुस्लिम आतंकवाद, स्वदेशी उत्पादों का प्रयोग, चीनी सामान का बहिष्कार, घर वापिसी, गाय, राष्ट्रीय व्यंजन खिचड़ी, योग, रामदेव, हनीप्रीत, केरल त्रिपुरा व बंगाल में हिंदुओं के खिलाफ कम्युनिस्टों का लाल आतंकवाद, आरक्षण को खत्म करने जैसे कितने ही तो सवाल हैं, जिन पर घर में, टीवी बहसों में, चाय की स्टालों पर, बसों में, गांव-शहर के चौराहों पर, सरकारी दफ्तरों में बहसे की जा सकती है। ऐसा हमारे सरजी व इनके आजू-बाजू वाले प्यादों का कहना है।

वैसे भी सरजी के मन लुभावन भाषणों, एकल मन की बातों ने एक-एक हिन्दुस्तानी को धर्म की चासनी में डुबोकर सबको पक्केवाला देशभक्त बना मर मिटने तक को तैयार कर दिया है ठीक बाबा राम रहीम के फॉलोवर्स की तरह। क्योंकि हर परिवर्तन त्याग व कुर्बानी मांगता है और आज भंयकर बदलाव का दौर है। जाति से लेकर धर्म तक, नोटो से लेकर टैक्स तक, इतिहास से लेकर भविष्य तक, अर्दली, संतरी से लेकर जजों तक, राजनीतिक लोगों से लेकर राज्यों की सत्ताओं तक, आयोगों से लेकर मंत्रालयों तक, चपरासी से लेकर वाइस चांसलर तक, केएफसी व मैक डी से लेकर खिचड़ी तक, नानवेज से वेज तक, आदि आदि ओर भी ना जाने क्या-क्या? आज चहुंओर भारतमाता की जय-जयकार, वंदे मात्रम का उदघोष ऐसे ही थोड़े ना है। जय भीम का लगभग वंदे मात्रम में विलय हो जाना, लाल सलाम को साम दाम दंड भेद से घेरा, खदेड़ा व उखेड़ा जाना ये सब बड़ी मसक्कत के काम है।

ये सरकार व प्रशासन की राष्ट्र व हिन्दुत्व के प्रति व्यक्तिगत धार्मिक आस्था का सवाल कि वो हरियाणा के सरकारी अध्यापकों को स्कूलों की बजाय मन्दिरों के गेटों पर प्रसाद बांटने के लिए, दान पेटियों की सुरक्षार्थ और भक्तजनों की व्यवस्था व सुविधाओं का ध्यान रखने के लिए नियुक्त किए गए है। बाकायदा अध्यापकों को पुजारी बनने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है और जो अध्यापक पुजारी प्रशिण कार्यक्रम में नहीं पहूचें प्रशासन ने ऐसे शिक्षकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के समन भेजे है। वैसे भी सरकारें अधिकतर समय शिक्षकों को विभिन्न सर्वेक्षणों व योजनाओं में ही व्यस्त रखती है एक तरफ तो पिछले 15-20 दिनों से टीवी के कई चैनल बजा रहे है कि देशभर में शिक्षकों के 50-60 फीसद से भी अधिक पर खाली पड़े है, जो है उनको सरकार मन्दिरों में पुजारी लगा रही है यानि सत्ताओं व सरकारों की मंशा साफ है कि वो बच्चों को शिक्षा देना ही नहीं चाहती है? वैसे भी हमारे सरजी ऐसे छोटे-मोटे मामलो पर मगज खपाई नहीं करते है? देश की 130 करोड़ आबादी के लिए पिछले 4-5 रोज से मडिया व विमर्श के तमाम हल्कों में बहस का मुद्दा ये है कि हमारा राष्ट्रीय व्यंजन खिचड़ी हो, देश की बोद्धिकता पर रोणा ही रोया जा सकता है। मतलब आज के दौर में हम खिचड़ी पर बहस कर रहे है, खिचड़ी पर, आखिर ये विकास हमंे किस युग में धकेल रहा है?

आज गुजरात की रैलियों में विकास का भूत राहुल जी के सर चढकर बोल रहा है जिससे राहुल जी मंचों पर जय भीम-जय भीम चिल्ला रहे हैं जिससे चौड़े सीने वाले सरजी की सांसे फूली हुई हैं, कुछ हड़बड़ा से भी गए है। यहां के दलितों, पटेलों, व्यापारियों के आंदोलनों ने इनके हलक से गुजरात माडल जैसे शब्द निकाल फेंके हैं और सार्वजनिक तौर पर घोषणाएं हो चुकी हैं विकास पगला गया है। जिससे अब इनसे कुछ कहते नहीं बन रहा है। जबसे यहां की तीगड़ी ने बताया है कि वो राज्य की 120 से अधिक सीटों पर झौल मारेगें तो नागपूर तक की चुल्हें हिल गई है।

पर सरजी ने साफ-साफ कह दिया है कि ये सैकुलर वामपंथी टाइप लाल सलाम वाले कुछ लोग कह रहे है कि हाल ही झारखंड में भूख से तीन मोते हुई है, कुछ दिनों पहले इन्होनें यह अफवाह भी उड़ाई थी कि नोटबंदी के दौरान बैंकों की लाइनों में 150 से अधिक लोग शहीद हो गए थे, असहिष्णुता की बात भी यहीं करते है, किसानों को भी इन्होनें ही उकसा रखा है, जंतर-मंतर पर भी सालों से ये ही कब्जा जमाए बैठे थे। पर हमारे सरजी देशद्रोहियों की ये सब चाले अच्छी तरह समझते है तभी इन पर सरकारी गोलिया चलवाने, लट्ठ बरसवाने में तनिक भी झिझकते नहीं। हमारे सरजी के सारे फन्डे बिल्कुल क्लीयर है कि 21वीं सदी में कोई भूखा नहीं है, पैदाइसी व आदतन लोग टैक्स चोर है, नेताओं व इनकी जायज-ना... संतानों के इलावा बाकि देश भ्रष्टाचार में डुब चुका है और रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य की इनको कत्तई जरुरत नहीं है, शादीशुदा पर अकेले रहने वालंे व बिना शादी वाले पुरुष ही देश की सच्चें सेवादार है। इन्होनंे कभी नहीं कहा कि ’आधार‘ के नाम पर लोगों को शहीद करो? परन्तु जीएसटी, बैंक, डीजिटल इंडिया, बायोमैट्रिक तकनीक, आधार से देश को जोड़ने पर देश का विकास होगा, अर्थव्यवस्था मतबूत होगी, भ्रष्टाचार जड़ से मिट जाऐगा और काला धन तो ऐसे गायब होगा जैसे गधे के सिर से सींग? ऐसा सपना है अपने सरजी का। 36 घन्टे बिन पसीने वाला खुन बहा रहे है जनाब देश के लिए फिर भी विपक्ष वाले इनकी लांगड़ उतारने पर आमादा रहते है। अब विपक्ष वालों ने ही यह कहकर अन्तर्राष्ट्रिय बेशर्मी मचाई है कि आधार व बायोमैट्रिक तकनीक ने ही झारखंड में कई लोगों को मोत के पास भेज दिया? अगर एकबारगी यह मान भी ले कि ये सही है तो फिर भी कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता है ना सरजी? फिर यह बात तो ट्रम्प जी व शिंजो जी जो हमें आधुनिक हथियार व बुलेट ट्रेन बेच रहे है, भी नहीं मानेगें कि देश के सबसे अमीर राज्य में लोग भूख से मर रहे है? ट्रम्प जी तो बेचारे आज तक यह भी नहीं समझ पाए कि हमारे सरजी राज्यों में चुनाव हार कर भी कैसे सरकार बना लेते है?

यह बात दीगर है कि हम भूख से होने वाली मोतों के मामले में दुनिया में 100वें पायदान पर है? पड़ोसी देश नेपाल व बांगलादेश भी हमसे बेहतर है पर इसमें ज्यादा इतराने की कोनो बात ना है और यह कोई अन्तर्राष्ट्रीय शर्म की बात भी ना है और फिर आदमी को बेशर्म होना चाहिए क्योंकि शरम तो आणी-जाणी चीज है। अपने सरजी को ही देख लो अनेको मामलों में नखालस बेशरम पाए जाते है। वैसे अपन सरजी बहुराष्ट्रिय नेता है कब किधर निकलने का मूड बन जाए कोई पता नहीं होता? वो कहावत है ना कि मारते हुए का हाथ पकड़ा जा सकता है बोलते की जबान नहीं पकड़ी जा सकती है। कहने वालंे तो यह भी कहते पाए जाते है कि सरजी अक्सर पृथ्वी का चक्कर लगाने में ही बीजी रहते है और 15 अगस्त व चुनावों के दौरान भाईयों-बहनों के बीच चुनावी मोड पर रहते है। कहने वाले तो यह भी कह रहे है कि मीडिया मैनेज करके सरजी एक धर्म एक राष्ट्र की नीति पर चल रहे है। लोकतांत्रिक तानाशाही के दौर में सरकारी तंत्र सांमती व जमीनदारी युग से भी ज्यादा निर्दयी हो गया है अब कहने वालों की पूंछ थोड़े ही पकड़ी जाती है।

सरजी का फोकस एक राष्ट्र-एक धर्म, एक राष्ट्र-एक कर, एक राष्ट्र-एक नेता, एक राष्ट्र-एक चुनाव, एक राष्ट्र-एक जाति की बारी भी आने ही वाली होगी...।

जैसे देश में आधार एक यूनिक आईडी है ठीक उसी तरह हमारे सरजी भी दुनिया में यूनिक है। हालांकि देश पर सरजी का रोब-दाब अब भी बरकरार है। सरजी का डंडा पुलिस, कोर्ट, कचहरी, भीड़, टीवी, मीडिया, आदि सब पर जमा हुआ है पर पट्ठे ये लाल सलाम वाले काबू नहीं आ रहे है सरजी ने सारे ताणे तुड़ा लिए पर....। तभी तो सरजी कह रहे है ‘ऑल इज नॉट वैल‘ भाइयों-बहनों......।

आधार पिता व भारत माता की जय हो।