विनोद रैना : जहाँ ज्ञान का वजन नहीं होता था
विनोद रैना : जहाँ ज्ञान का वजन नहीं होता था
साथी विनोद रैना को लाल सलाम
विनीत तिवारी
विनोद के साथ पहली मुलाकात की याद नहीं। ज़ाहिर है कि न तो वह बहुत यादगार परिस्थितियों में हुयी होगी और न ही उसे लेकर ऐसा कोई ख़्याल दिल में आया कि हम मानो अभी बिछड़ने वाले हों इसलिये सब पुरानी चीज़ों को और यादों को साथ-साथ सहेजा जाये। हम तो अभी बहुत लम्बे वक़्त उसके साथ को सोच कर चल रहे थे।
जो चीज़ मुझे असग़र अली इंजीनियर और विनोद के बारे में एक ही तरह से याद आती है, वह यह कि मैंने दोनों का ही इन्टरव्यू किया और सोचा कि अगर कुछ रह भी गया हो तो ये तो अपने ही लोग हैं, इनसे फिर कभी भी बात कर लेंगे।
क़रीब चार-पाँच साल पहले हम लोग संदर्भ केन्द्र की तरफ़ से स्कूली शिक्षा के अलग-अलग स्तरों को लेकर एक डॉक्युमेन्ट्री बना रहे थे। तभी शिक्षा के अधिकार विधेयक को लेकर भी काफ़ी गहमागहमी मची हुयी थी। तो हमने अनिल सद्गोपाल और विनोद रैना, दोनों को ही भोपाल में जाकर इंटरव्यू किया। बाद में जब शूटिंग देखी तो पाया कि बाजू के मकान में होने वाले निर्माण कार्य का काफ़ी सारा शोर विनोद की आवाज़ को दबा गया है। हमने सोचा हम लोग फिर शूट कर लेंगे। लेकिन वह फिर कभी आ न सका।
उसी तरह असग़र अली इंजीनियर एक दिन बहुत हल्के-फुल्के मूड में सुबह-सुबह अपना बचपन याद करने लगे तो मैंने कैमरा लगा दिया। वे जया के घर रुके थे और वहाँ वे बहुत सहज भी महसूस करते थे। काफ़ी सारी दिलचस्प बातें होती रहीं फिर कहीं जाने का वक़्त हो जाने पर सिलसिला टूट गया था। हम दोनों ने ही एक-दूसरे को कहा कि बहुत मज़ा आया और आगे इसे और बढ़ायेंगे लेकिन वह कभी हो नहीं पाया और वे भी चले गये।
इसके पहले विनोद से होशंगाबाद की किसी मीटिंग में या नर्मदा आन्दोलन के दौरान किसी-किसी मौके पर और कई बार दिल्ली में भी मिलना हुआ था, लेकिन सबसे पहली दफ़ा उसके साथ शिक्षा के मसले पर लम्बी चर्चा तब हुयी जब इंदौर में सन्दर्भ केन्द्र के एक सालाना जलसे के मौके पर हमने शिक्षा के व्यावसायीकरण का विषय चुना और सरकारी स्कूलों को युक्तियुक्तकरण के नाम पर बन्द करने की सरकारी साजि़शों और उनके पीछे मुख्य रूप से मौजूद वैश्वीकृत पूँजीवादी डिजाइन के खुलासे के लिये विनोद को, बनारस से गुड़िया संस्थान के साथियों को और अहमदाबाद से महात्मा गांधी इंटरनेशनल स्कूल के निजीकरण के खि़लाफ़ लड़ाई लड़ चुके और पानी की तोपों और लाठियों की मार झेल चुके साथियों को बुलाया था। तब विनोद ने अपनी बात को रखने के साथ ही एक बहुत प्यारा गीत भी हम लोगों को सुनाया था और अनेक बार यहाँ-वहाँ लिखकर रखने के बावजूद जब उस गीत की याद आती या कहीं जि़क्र छिड़ता तो हम सीधे विनोद को फोन लगाकर कहते कि वो गाना सुनाओ - ‘जैसा मैं चाहती हूँ, मेरे गुरुजन मुझे वैसा नहीं पढ़ाते।’ और वो गाना सुना देता। कई बार वो कहता कि अभी फोन लगाता हूँ। और उसका फोन आता और हमें विनोद गाना सुनाता।
भारत ज्ञान-विज्ञान समिति ने जब भोपाल में कला-जत्थे का आयोजन किया तो आशा ने मुझे और जया को हमारी सांप्रदायिकता विरोध वाली फिल्म ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं’ लेकर बुलाया था। जब फिल्म का प्रदर्शन हुआ तो कुछ बिन्दुओं को लेकर वहाँ मौजूद साथी थोड़ी बहस करने लगे। तब भी विनोद ने न केवल हमें हमारा जवाब रखने दिया बल्कि यहाँ तक कहा कि कश्मीर के मामले में अच्छे-अच्छे मार्क्सवादी कश्मीरी हिन्दू हो जाते हैं। हम लोग बहुत हँसे। खुद विनोद कश्मीरी हिन्दू था लेकिन मेरे परिचितों में आज तक मुझे विनोद और संजय काक ही ऐसे कश्मीरी मिले जो हिन्दू होने के बावजूद किसी कश्मीरी हिन्दू ग्रंथि से ग्रस्त नहीं हैं। दिनेश अबरोल, असगर वजाहत, राजेश जोशी और रामप्रकाश त्रिपाठी, अजेय कुमार वगैरह के साथ मैं भी दो दिन वहाँ रहा और लेखकों की अनेक अराजकताओं के बीच विनोद उनमें से काम की चीजें निकलवा ही लेता था।
उसकी साफ सोच और भीड़ में भी प्रभावित न होकर तल्ख सच्चाई देखने की काबिलियत का मैं तब कायल हुआ जब भोपाल में ही प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा सज्जाद ज़हीर जन्म शताब्दी समारोह मनाया जा रहा था। हिंदी और उर्दू के बड़े से बड़े दिग्गज वहाँ जमा थे। हमें विनोद के भोपाल में होने का पता भी नहीं था, लेकिन वो टीटीटीआई के सभाकक्ष में जब मिला तो मैंने कमला प्रसाद जी से कहा कि विनोद जैसा विद्वान व्यक्ति सभा में सहज रूप से मौजूद है, आप उसे कुछ कहने के लिये कहिये। कमला प्रसाद जी सहर्ष तैयार हो गये लेकिन विनोद ने उतनी ही विनम्रता से कहा कि मैं तो सुनने के लिये आया हूँ। लेकिन जब हिंदी-उर्दू के सत्र में बात भारत-पाकिस्तान और गंगा-जमुनी सभ्यता और ‘आखि़र वे भी वृहत्तर भारत के ही हिस्से हैं’ जैसे उच्छ्वास शुरू हो गये तो विनोद से रहा नहीं गया और उसने पूरी विनम्रता और दृढ़ता से कहा कि भारत में रह रहे हम लोग जब तक पाकिस्तान पर अहसान दिखाकर अपना छोटा भाई बताते रहेंगे तब तक वह एक देश की पहचान पाने के लिये छटपटाता रहेगा। हम उसे एक आज़ाद देश के रूप में स्वीकारना शुरू करें और उस पर अपने बड़प्पन का वजन डालना बन्द करें। विनोद की बात से भली-भली बातों के बीच एक सनाका खिंच गया था लेकिन कोई उसकी बातों के विरोध में कोई तर्क नहीं दे सका था। विनोद की लोकतांत्रिकता की यह समझ व्यक्तिगत रूप से मेरे लिये काफ़ी सीखने वाली रही थी।
विनोद उन दोस्तों में से था जिसकी सोच का दायरा संस्कृति, शिक्षा से आगे भी काफ़ी बाहर फैला था। उसके दोस्त भी समाज के लगभग हर क्षेत्र से थे। वैज्ञानिक, शिक्षाशास्त्री, अर्थशास्त्री, राजनीतिक, पत्रकार, आन्दोलनकारी अनेक किस्म के साथी उसके दोस्त थे। ऐसे सक्रिय साथी का इतनी जल्दी चले जाना हम सब के लिये एक बहुत बड़ी क्षति है लेकिन वैसा ही विश्वास भी है कि विनोद अपने विशाल मित्र परिवार में अपने पीछे ऐसे काफी सारे नौजवान और प्रतिबद्ध साथी छोड़कर गया है जो उस काफिले को मंजिल की तरफ बढ़ाते रहेंगे जिसका कि विनोद भी एक अहम हिस्सा था और किसी न किसी शक्ल में वह बना रहेगा।
कुछ लोगों से आपका रिश्ता ऐसा होता है कि उनसे कुछ भी सीखा हुआ आपको वजन नहीं लगता। विनोद ऐसा ही था। उससे बहस की जा सकती थी और बिना किसी वजन के कुछ नया सीखा जा सकता था। जीवन में तो उसने ऐसा किया ही लेकिन ऐसा ही उसने अपनी मौत के साथ भी किया। वह जिस तरह से गया, जैसे उसने अपने जाने का एक बेहद शांत, सहज और गौरवपूर्ण रास्ता बनाया, वैसा करने के लिये उसने किसी से नहीं कहा कि तुम भी ऐसा ही करना या ऐसा ही होना चाहिये, बल्कि बड़े प्यार से उसने ऐसा ख़ुद के लिये किया और उसके चाहने वालों के लिये उसका रास्ता उन्हें भी कुछ सिखा गया।
प्रगतिशील लेखक संघ और सन्दर्भ केन्द्र की तरफ़ से मैं हमारे पूरे आन्दोलन के एक अत्यन्त सक्रिय, तेजस्वी और सहज अपनत्व से भरे साथी विनोद रैना को लाल सलाम कहता हूं। और उनके परिजनों व भारत ज्ञान-विज्ञान समिति के उनके वृहत्तर परिवार को अपनी एकजुटता और संवेदनाएं प्रेषित करता हूँ।
विनीत तिवारी
महासचिव,
म. प्र. प्रलेसं, इंदौर


