विमुद्रीकरण-बनिया व्यापार की रीढ़ तोड़कर बहुराष्ट्रीय हमले का रास्ता चौड़ा #जनता_त्रस्त_भ्रष्टाचारी_मस्त

उज्ज्वल भट्टाचार्या

मुझे नहीं लगता कि माया-मुलायम या सोनिया को सीधा करने के लिये नोटबंदी की गई है. अब वक़्त है कि इसके आर्थिक कारणों का गंभीरता से विवेचन किया जाय.
आर्थिक मामले मेरे पल्ले नहीं पड़ते. साथ ही, हज़ार या लाख करोड़ों के आंकड़ों से मेरा दिमाग चकरा जाता है. कुछ समझ नहीं पाता हूं. फिर भी कोशिश करता हूं.
1975 में इंदिरा के आसपास सिमटी सत्ता के लिये सचमुच एक आपात स्थिति थी, जिसका एक आर्थिक पक्ष था. उसकी सिर्फ़ घोषणा की गई. आपात स्थिति की घोषणा के साथ इंदिरा की स्थिति मज़बूत करने के साथ-साथ आर्थिक अनुशासन के ज़रिये संकट को दूर करने की कोशिश की गई. प्रारंभिक सफलता के बाद नये आर्थिक व राजनीतिक संकट मुंह बाये सामने खड़े हो गये.

इस बार कैसा संकट है ?
अर्थजगत के दूसरे पक्षों में संकट नहीं, समस्यायें हैं. लेकिन बैंकिंग व्यवस्था अंदर से खोखली हो चुकी थी, चरमराकर गिर सकती थी. इसकी वजह है कॉरपोरेट जगत को दिये गये बेतहाशा ऋण, जो लौटाये नहीं जाएंगे, जो ज़ब्त हो चुके हैं.
यह एक आर्थिक आपात स्थिति है. इससे निपटने के सवाल पर मतभेद के कारण रघुराम राजन को जाना पड़ा. मोदी सरकार को यह समस्या कुछ हद तक विरासत में मिली थी, लेकिन अपने आर्थिक आकाओं को ख़ुश करने के लिये समस्या से निपटने के बदले पिछले ढाई सालों में इसे बढ़ाकर संकट बना दिया गया है, घटाने की कोई नीयत नहीं है.

नोटबंदी से उल्लेखनीय मात्रा में बड़े नोट मुद्रा प्रवाह से हट जाएंगे, जो बैंकों का शुद्ध लाभ होगा.
इसके ज़रिये बैड लोन की खाई को भरा जा सकेगा. आंकड़ों में नहीं जा रहा हूं, जानकार मित्र हमारा ज्ञान बढ़ा सकते हैं.
एक पार्श्व प्रभाव यह भी होगा कि नगदी में चलने वाले बनिया व्यापार की रीढ़ तोड़कर एफ़डीआई के ज़रिये बहुराष्ट्रीय हमले का रास्ता चौड़ा किया जाएगा. मूलतः यह भी एक यूपीए-एनडीए प्रोजेक्ट है.
यही वजह है कि तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों की ओर से नोटबंदी का समर्थन व विरोध जुमलों के स्तर पर हो रहा है.
आम आदमी या छोटे-मोटे धंधे करने वालों की बात करना बकवास है. अर्थनीति या राजनीति क्या उनके आसरे चलेगी ?
मस्त रहिये.