आलोका

झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने को लेकर लंबी बहस चल पड़ी है। ज्यादातर लोगों का मत है कि झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाने से विकास के नए द्वार खुलेंगे। राज्य में तेजी से तरक्की होगी और खुशहाली का नया दौर शुरू होगा।

मुझे लगता है कि आज न सिर्फ इस सवाल पर बहस होनी चाहिए कि झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा मिले, बल्कि इस सवाल पर भी मंथन जरूरी है कि क्या झारखंड को सिर्फ विशेष राज्य का दर्ज मिल जाने भर से राज्य का विकास हो जायेगा? बहस तो इस सवाल पर भी होनी चाहिए कि क्यों न झारखंड को आंशिक राज्य का दर्जा मिले। झारखंड गठन के बाद से यहाँ की जो स्थिति रही है, उसमें इसे विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के बजाय आंशिक राज्य का दर्जा दिलाने की माँग ही ज्यादा उपयुक्त लगती है। देश में राजधानी नई दिल्ली और पाण्डिचेरी को यह दर्जा हासिल है। ऐसे राज्यों में मंत्रिमंडल और कार्यपालिका तो होती हैं, लेकिन उनकी शक्तियाँ सीमित होती हैं। उनके कुछ कानून भारत के राष्ट्रपति के विचार और स्वीकृति मिलने पर ही लागू हो सकते हैं। और तो और इस सवाल पर भी बहस क्यों नहीं होनी चाहिए कि क्यों न झारखंड को केंद्रशासित राज्य का दर्जा मिले और राज्य को वर्तमान स्थिति से उबारने के लिये यहाँ सीधे-सीधे भारत सरकार का ही शासन चले।

गौरतलब है कि झारखंड गठन के तकरीबन 13 साल पूरे हो चुके हैं। इस पूरी अवधि में राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बनी रही। एक के बाद एक कई सरकारें आयीं और गयीं। राज्य के लगभग सभी प्रमुख दल और उसके नेता सत्ता के लिये संघर्ष करते रहे। इन्हें मौके भी मिले। राज्य में लगभग सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों ने राज किया। भाजपा से लेकर कांग्रेस और जदयू से लेकर राजद तक को राज्य चलाने का अवसर मिला। इतना ही नहीं, एनसीपी और वामपंथी दल सीपीआई और मासस को भी अवसर मिले। क्षेत्रीय दल भी पीछे नहीं रहे। झामुमो, आजसू से लेकर झारखंड पार्टी ने भी राज्य चलाने में अपनी हिस्सेदारी निभाई। और तो और इसमें निर्दलीय भी पीछे नहीं छूटे। एक निर्दलीय विधायक को तो मुख्यमंत्री का ताज भी मिला। लेकिन नतीजा क्या निकला ? झारखंड के साथ अस्तित्व में आये उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ विकास की दौड़ में आगे निकल गये। झारखंड पीछे छूट गया। ऊपर से इस राज्य को भ्रष्टाचार के कई बड़े सौगात भी मिले।

आज भी सत्ता की बागडोर इन्हीं किसी के हाथों में है। अगर झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा मिल भी जायेगा तो क्या चमत्कार हो जायेगा ? सरकार चलाने के इनके अनुभवों से हम अच्छी तरह वाकिफ हैं। राज्य में पिछले 13 वर्षों में जितनी भी सकरारें बनीं, लगभग सभी के हश्र एक जैसे ही रहे। झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की वकालत कई राजनीतिक दल भी कर रहे हैं। कुछ तो इसके लिये सड़क पर भी उतर चुके हैं। लेकिन कल जब ये ही सत्ता में थे तो इन्होंने विकास की कौन सी बानगी प्रस्तुत की, यह किसी से छुपी नहीं है। सच तो ये है कि ये अपने कार्यकाल में विकास के करोड़ों रूपए खर्च भी नहीं कर पाये। पिछले नौ-दस सालों की बात करें तो वर्ष 2002-03 में विकास के 574.8 करोड़ सरेंडर हुए। 2003-04 में 821.92 करोड़ धरे रह गए। 2004-05 में 534.49 करोड़ खर्च नहीं हो पाए। 2005-06 में 444.14, 2006-07 में 2488.08, 2007-08 में 722.21, 2008-09 में 931.99, 2009-10 में 1686.72 और 2010-11 में 8442.18 करोड़ रूपए सरेंडर हो गये। कमोबेश यही स्थिति 2011-12 की भी रही। पिछले दस वर्षों में राज्य में बनी सभी सरकारों ने मिलकर 43874.72 करोड़ रूपए खर्च किये हैं। इसके बाद भी हम आज कहाँ खड़े हैं। आज भी राज्य पर 28 हजार करोड़ रूपए से अधिक कर्ज है। कुल 61 लाख परिवार में 35 लाख परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं। 75.3 फीसदी परिवार के मुखिया वेज लेबर हैं। राज्य परिवारों की औसत आमदनी मात्र 29087 रूपए सलाना है। आज भी 92.3 प्रतिशत अदिवासी परिवार कच्चे घरों में रह रहे हैं। जन जातीय इलाकों में विकास की दर मात्र 5.6 फीसदी है। राज्य भर में सर्व शिक्षा अभियान के निरन्तर प्रयास के बावजूद महिलाओं की साक्षरता दर 52.04 प्रतिशत तक पहुँची है। प्रत्येक वर्ष 18.78 प्रतिशत महिलाएँ रोजी-रोटी की तलाश में सिर्फ दिल्ली के लिये पलायन कर जाती हैं। अन्य राज्यों के लिये भी हजारों महिलाएँ पलायन करती हैं। महज सात प्रतिशत ग्रामीणों को ही पाईप से जलापूर्ति की जाती है। आज भी राज्य साढ़े पाँच लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। राज्य के छह हजार गाँव के लोग आज भी ढिबरी युग में जी रहे हैं। राज्य के छह जिले देश के 100 पिछड़े जिलों में सबसे ऊपर हैं। ये जिले झारखंड की असली तस्वीर पेश करते हैं। राज्य में अब भी 1000 वर्ग किमी पर 219.9 किमी सड़क की स्थिति ही बेहतर है। झारखंड बेरोजगारी के मामले में भी गोवा को छोड़कर देश के अन्य सभी राज्यों से ऊपर है। यहाँ 27.6 प्रतिशत लोग बेरोजगार हैं। राज्य में 43.9 प्रतिशत लोग स्कूल का मुँह भी नहीं देख पाये हैं। राज्य में 35469 शिक्षकों की कमी है। स्वास्थ्य की स्थिति और भी बुरी है। राज्य में 3686 चिकित्सकों की जरूरत है। इसके विरूद्ध मात्र 1500 चिकित्सक ही उपलब्ध हैं। राज्य में 1316 विशेशज्ञ चिकित्सकों की आवश्यकता है। लेकिन उपलब्धता मात्र तीन सौ है। इसी तरह राज्य के स्वास्थ्य विभाग में स्टाफ नर्स, पारा मेडिकल स्टाफ, एएनएम, मल्टी पर्पस वर्करों की भी भारी कमी है। झारखंड में कृषि योग्य भूमि 29.74 लाख हेक्टेयर है। इसमें से मात्र 24.25 लाख हेक्टेयर में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है।

ये आँकड़ें पिछले 13 सालों में राज्य में बनी-बिगड़ी सरकारों की विफलता ही दर्शाते हैं। किसी भी क्षेत्र में सरकारों ने बेहतर कार्य नहीं किये। यही वजह रही कि राज्य में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। बल्कि भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े कीर्तिमान जरूर बने। जिन्हें भी सत्ता मिली, भ्रष्टाचार की नई कहानी गढ़ी। सभी के सभी राज्य का विकास करने के बजाय अपने ही विकास करने में मग्न रहे। ऐसे में इनसे ही यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि विशेष राज्य का दर्जा मिलने पर ये राज्य का कायाकल्प कर देंगे। ऐसे में हम झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के बजाय इसे आंशिक राज्य का दर्जा दिलाने या केंद्र शासित राज्य बनाने की वकालत क्यों नहीं करें ? राज्य में पिछले 13 वर्षों की स्थिति देखकर तो यही लगता है कि इसे विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की माँग के बजाय इसे केंद्रशासित राज्य बनाने की माँग जोरदार तरीके से उठाई जाये। जाहिर है कि अगर इस राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिलेगा तो इसे 90 प्रतिशत केंद्रीय अनुदान मिलेगा। शेष 10 प्रतिशत की राशि ब्याजमुक्त कर्ज के रूप में मिलेगा। लेकिन ये तमाम राशि तो खर्च करने की जिम्मेवारी राज्य सरकार को ही होगी। और इस मामले में यहाँ की सरकारों के तजर्बों से हम पहले से ही वाकिफ हैं। लेकिन अगर यह राज्य आंशिक राज्य के दर्जे में आयेगा तो इन्हें अनुदान तो मिलेगा ही, इस पर केंद्र सरकार या राष्ट्रपति की नजर भी बनी रहेगी। राज्य को नई दिशा देने के लिये बेहतर सुझाव भी मिलता रहेगा। इससे राज्य के नेताओं को एक मजबूत और पारदर्शी व्यवस्था में काम करने का अनुभव भी हासिल होगा। साथ ही भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा। झारखंड जैसे नौसिखिये नेताओं को बेहतर तरीके से सरकार चलाने की सीख भी मिलेगी। इस व्यवस्था में उन्हें लड़खड़ाने या भटकने की सम्भावना भी बहुत कम होगी। झारखंड जैसे राज्य के लिये यह अन्य व्यवस्था से कहीं ज्यादा उपयुक्त लगती है। झारखंड की स्थिति देखकर तो मन में झारखंड जैसे राज्य को केंद्र शासित राज्य बनाने की तरफदारी करने की भी इच्छा प्रबल होती है। इस व्यवस्था में झारखंड के नेताओं को भले ही राज्य चलाने का मौका नहीं मिलेगा, लेकिन राज्य की जनता के लिये बेहतर ही साबित होगा। इसमें न सिर्फ राज्य में अनुदान की राशि बढ़ेगी, बल्कि इसपर सीधे-सीधे भारत सरकार का शासन भी होगा। आज झारखंड के नेताओं ने यहाँ की जो स्थिति बना रखी है, उसमें यहाँ के लिये केंद्रशासित राज्य की माँग करना भी गुनाह नहीं है।