अशोक गुप्ता
गरीबी की ताज़ा रेखा को लेकर बड़ा हंगामा है। सरकारें अपने अपने नज़रिए से गरीबी की सीमा को परिभाषित करती हैं। ताज़ा आंकड़ा यह है कि शहर में सैंतालीस रूपया प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है, भले ही उसके आश्रित परिवार में सत्तर बरस से बूढ़े और सात बरस से कम के अन्य सदस्य भी हों जिनके कमाऊ होने की बात सरकार भी नहीं करती है। यह आंकड़ा कितना व्यावहारिक है या कितना हास्यापद है, उसका अंदाज़ बस एक बात से लगाया जा सकता है। शहर में आवास की मद में व्यय का औसतन खर्च बीस प्रतिशत माना जाता है। इस मानक के अनुसार, किसी सद्य अ-गरीब के लिये यह राशि करीब दो सौ सत्तर रुपये महीने बैठती है। दिल्ली तो छोड़िये, मेरे पुराने शहर सीतापुर ( यू पी ) में भी कोई तीन सौ रुपये महीने के किराये में कोई कमरा दिलवा दे तो मान जाऊं। खैर इस संदर्भ में, और इसके विश्लेषण पर, बहुत लोग कह सुन रहे हैं, इसलिये मैं इसे छोड़ अपने मुद्दे पर आ जाता हूँ।
मेरा सोच है कि जिस तरह गरीबी की विभाजक रेखा खींची जा रही है, उसी तरह कोई अमीरी की रेखा भी होनी चाहिये। जैसे, गरीबी पार के न्यूनतम स्तर से दस गुणा अधिक आय वाला व्यक्ति अमीर और बीस गुणा अधिक आय वाला व्यक्ति धनाढ्य पारिभाषित किया जाना चाहिये। इस तरह, पंद्रह हज़ार रुपये प्रति माह कमाने वाला व्यक्ति अमीर और तीस हज़ार रुपये वाला व्यक्ति धनाढ्य बताया जाय। इसी क्रम में, पचास हज़ार प्रतिमाह या इससे ऊपर कमाने वाले व्यक्ति को ऐसी श्रेणी में रखा जाना चाहिये, जिसे टकसाल कहा जा सकता है।
क्या हमारी सरकार का वित्त मंत्रालय, इन सभी अमीर, धनाढ्य और टकसाली व्यक्तियों को ‘भारी टैक्स दाताओं’ की श्रेणी में रख सकता है, भले ही वह सरकारी नौकर हों, सांसद मंत्री हों या व्यवसायी ? सरकारी या निजी संस्थाओं में काम कर रहे वह व्यक्ति जिनको मुफ्त का आवास मिला हुआ है या जिन्हें आवास के साथ वाहन व्यय भी दिया जाता है, उनकी आय को, वेतन पर बीस से तीस प्रतिशत बढ़ा कर गिना जाना चाहिये।
मैं समझता हूँ कि अगर सरकार गरीबी की रेखा को इस मापदंड पर तय करके अपनी पीठ थपथपाना चाहती है तो वह अमीर, धनाढ्य और टकसाली वर्ग को भी इसी पैमाने से पारिभाषित करे और बिना किसी अपवाद, क्रमिक रूप से भारी टैक्स नीति की घोषणा करे और टैक्स वसूले।
सरकार की घोषित नीति ही बाल मजदूरी के खिलाफ है। इस तरह सरकार प्रति सद्य अ-गरीब व्यक्ति की जिम्मेदारी में कम से कम दो ‘आय वंचित बाल मजदूर’ मान कर चले। और पूरे परिदृश्य को इस निगाह से दुबारा देखे।
मुझे पूरा विश्वास है। अगर सरकार की वित्त मंत्रालय ऐसा करने की सोच भी लेगा तो प्रधानमंत्री के पांव के नीचे की ज़मीन खिसक जायेगी। यही नया घोषित अमीर और धनाढ्य वर्ग तो सरकार निर्णायक मतदाता है। यह अमीर, धनाढ्य और टकसाली होने की ओर बढ़ रहा वर्ग, मंहगाई से सचमुच त्रस्त भी है। शहर में बीस-तीस हज़ार महीना कमाने वाला एक व्यक्ति जिसके कम से कम दो बच्चे पढ़ाई के दौर में हैं और वह एक जोड़ा वरिष्ठ नागरिकों का सुपुत्र है, उसे जो राजनैतिक दल अमीर धनाढ्य कह देगा उसकी तो जमानत स्थाई तौर पर गई समझो... उसके पहले तो सरकारी बाबू, अफसर और सांसद विधायक ही रायता फैला देंगे।
सैंतालिस रुपये पाने वाले अ-गरीब को तो सरे आम मां बहन की गाली कोई भी दे सकता है। अब यह मनमोहन सिंह ने दी या मोदी जी ने, इसमें कोई बहादुरी की बात नहीं है। यह चाहें तो इस गाली के भाष्य का व्यवहारवत् प्रमाण भी दे सकते हैं... दे ही रहे हैं।
तो, बताए कोई भी सरकार या उसका वित्त मंत्रालय, कि क्या वह उच्च स्तरीय वैकल्पिक विभाजक रेखाएं स्थापित करने की चुनौती स्वीकार करने को तैयार है...?
अशोक गुप्ता दुनिया देखने के लिए सारे झरोखे खोल कर रखने वाले इंसान हैं, क्योंकि अपनी दुनिया में भरपूर जीना है। पेशे से इंजीनियर रहे और अब अवकाशप्राप्त अशोक गुप्ता की कलम, कैमरा और आवाज़, के सहारे हस्ती बुलंद है और कई साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं। “Hate the sin but not the sinner. Dont take offence, dont give offence.” उनकी पसंदीदा उक्ति है।