अनिल सिंह
लखनऊ। मोदी लहर की बेला में दूसरे दलों से छिटके-भटके लोग भारतीय जनता पार्टी के भीतर आ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ कैडर से जुड़े नेता अपनी उपेक्षा से नाराज होकर दूसरी पार्टियों का दामन थाम रहे हैं। कुछ बड़े नेताओं के भी जल्द ही पार्टी छोड़ने का कयास हैं। संभावना जताई जा रही है कि चार बार सांसद रह चुके अशोक प्रधान सपा का दामन थाम सकते हैं। सूर्य प्रताप शाही को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है।

केंद्र की सत्ता तक पहुंचने के लिए भाजपा नेतृत्व नैतिकता और नीतियों से समझौता कर रहा है। पार्टी केवल नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह के इर्द-गिर्द सिमट गई है। मोदी गुजरात में अपने विपक्षियों को निपटा रहे हैं तो यूपी में राजनाथ सिंह विपक्षियों को पटखनी देने में लगे हुए हैं। सियासी हलकों में यह चर्चा आम है कि ये दोनों ही नेता अपने राहों पड़ने वाले कांटों को बड़े इत्मीनान से साफ करते हैं। गुजरात में केशु भाई पटेल उदाहरण हैं तो यूपी में कल्याण सिंह। कभी भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार रहे ये लोग राजनीतिक हाशिए पर पहुंच गए हैं। मोदी-राजनाथ की जोड़ी ने भाजपा को पहचान और ऊंचाई देने वाले लालकृष्ण आडवाणी को निपटाया। इसके बाद दूसरे वरिष्ठ जसवंत सिंह भी निपट गए। अगर डा. मुरली मनोहर जोशी ने समझौतावादी रुख अख्तियार नहीं किया होता तो उन्हें भी परेशानी झेलनी पड़ सकती थी। राजनाथ सिंह की कूटनीति को समझना आसान नहीं है। जिस अशोक प्रधान के कंधे पर बंदूक रखकर राजनाथ ने कल्याण सिंह को दुबारा पार्टी छोड़ने पर मजबूर किया, उन्हीं राजनाथ ने अब कल्याण सिंह का साथ निभाने के दिखावा करते हुए अशोक प्रधान को हाशिए पर डाल दिया है।

लगातार चार बार खुर्जा से सांसद तथा अटलजी के मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री रहे अशोक प्रधान को एक सुरक्षित सीट तक नसीब नहीं हो पाई। प्रधान हाथरस सीट से टिकट पाने की कोशिशों में लगे थे, लेकिन यूज एंड थ्रो की रणनीति अपनाने वाले राजनाथ सिंह अशोक प्रधान को किनारे कर दिया। अब खबर है कि नाराज प्रधान सपा का दरवाजा खटखटा सकते हैं। प्रधान के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि अगले दो-तीन दिन के भीतर वे सपा का दामन थाम सकते हैं। अभी आगरा के भाजपाई मेयर ने पूर्व सांसद के साथ सपा का दामन थामा है। इसके साथ ही यह भी खबर आ रही है कि भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही भी सपा का दामन थाम सकते हैं। शाही राजनाथ सिंह के कूटनीति के शिकार हो गए हैं। हालांकि उनका कहना है कि वे भाजपा छोड़कर कहीं नहीं जा रहे, लेकिन सूत्रों के हवाले से जो खबर आ रही है उसमें पता चला है कि शाही सपा के एक वरिष्ठ नेता व वर्तमान सांसद से मुलाकात कर चुके हैं। हालांकि यह पता नहीं चल पाया है कि यह डील फाइनल हुई है या नहीं। पर चर्चा है कि शाही अगर सपा में शामिल होते हैं तो पार्टी उन्हें बालेश्वर यादव की जगह देवरिया से उम्मीदवार भी बना सकती है। अगर ये दोनों घटनाएं हुईं तो भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका होगा क्योंकि दोनों ही नेता कैडर से जुड़े हुए तथा पार्टी के प्रति समर्पित रहे हैं।
(स्रोत- डीएनए)