शिक्षा-शिक्षक और सामाजिक परिवेश
शिक्षा-शिक्षक और सामाजिक परिवेश
रूद्रेश उपाध्याय
अतीत में शिक्षा एक दान की वस्तु रही है। हमारे ऋषि-मुनि अपने शिष्यों को शिक्षा उनके उज्ज्वल भविष्य व ज्ञान पिपासा की पूर्ति के लिए देते थे। आज निजी शिक्षण संस्थानों ने, जो हर गली कूचों में परचून की दुकान की तरह खुली हैं, शिक्षा का व्यापारीकरण कर दिया है। आय का कोई साधन न जुटा पाने की स्थिति में हर कोई 20-30 बच्चे एकत्र करके बड़े ही आकर्षक नाम से शिक्षा संस्था खोल कर बैठ जाता है और अच्छी शिक्षा के नाम पर अभिभावकों से प्रवेश के समय मासिक शुल्क, आने जाने की सुविधा व ड्रेस के लिए मोटी रकम वसूल करता है।
इन संस्थानों का उद्देश्य अधिक से अधिक ढोंग दिखा कर अपने आप को आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ करना है। इन संस्थानों के पास 10-20 निश्चित शब्द होते हैं, जैसे ए फार एपल, हैलो, थैंक्यू ,बाय-बाय आदि। ऐसे शब्दों की बच्चों को रटवाई करवा दी जाती है,इन शब्दों के प्रयोग से अभिभावकों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और वे सोचने पर विवश हो जाते हैं कि हमारा बच्चा आधुनिक व अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रहा है। जितना समय निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ऩे वाले बच्चों के अभिभावक उन्हे देते हैं, उससे आधा समय भी सरकारी पाठशाला में पढ़ऩे वाले बच्चों के अभिभावक उन्हें दें तो कहीं अच्छा परिणाम अपेक्षित है।
सरकारी पाठशाला में कार्यरत अध्यापकों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या बच्चों का नियमित रूप से पाठशाला में न आना, आठवीं कक्षा तक बच्चों का फेल न करना, बच्चों को डाँटने की मनाही तथा अभिभावकों की अपने बच्चों के प्रति उदासीनता है।
अनिवार्य शिक्षा नीति तथा शिक्षा अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत 20 घरों की ढाणी में भी सरकार ने स्कूल खोल दिये हैं। कौआ चले हंस की चाल, अपनी भी खो बैठे-पश्चिम की चाल चलने की कोशिश में हम अपनी संस्कृति को भूल बैठे हैं। क्या हम उनकी तरह सुविधाएँ जुटा पाएंगे? आज अध्यापकों के पास पढ़ाने के अलावा बाकि सारे काम हैं। अधिकतर अध्यापक सर्व शिक्षा अभियान के द्वारा बनवाए जा रहे कमरों का निर्माण, मिड डे मील, पल्स पोलियो, वोटर लिस्टें बनाना, पहचान पत्र बनाना व विभागीय डाक तैयार करने में लगे रहते हैं। पढ़ाने के लिए अध्यापक के पास समय ही कहाँ बचता है।
सर्व शिक्षा अभियान, जिसमें न है शिक्षा और न है ज्ञान।
बनवा कर कमरे शिक्षकों से, बना दिया उन्हें बेईमान।।
साईकलों, सेमिनारों, कैम्पों की सुविधाएं प्रदान करके,
अधिकारी बन गए कमीशन खोर, फिर भी नाम है,
सर्व शिक्षा अभियान
इस वास्तविकता को स्वीकारें या नहीं, परन्तु असलियत यही है। गत वर्षों में शिक्षा कर स्तर जितना नीचे गिरा है, वह जग जाहिर है। कागजों में कुछ भी हो सकता है, शिक्षण कोई आँकड़ों का गणित नहीं है, इसमें बच्चों के मस्तिष्क रूपी कोरे कागज पर बिना कलम स्याही के अक्षर उभारने पड़ते हैं। इस जटिल कार्य के लिए अभिभावक, परिवेश व सरकार का सहयोग वांछित है।
शिक्षा क्षेत्र में आई शिथिलता चाहे वो शैक्षणिक कार्य की हो, नकल प्रवृति की हो, ट्यूशन की हो या अन्य प्रकार की हो, इनके लिए केवल अध्यापक को ही उत्तरदायी मानना उचित नहीं है। इसके लिए हमारा समाज भी बराबर का उत्तरदायी है। कागजों में चाहे कितनी ही योजनाएँ बनती हों, गोष्ठियाँ, चर्चाएँ होती हों, लेख लिखे जाते हों, भाषण दिये जाते हों परन्तु उन्हें कार्यान्वित करने व गम्भीरता से लेने का समय किसी के पास नहीं है। सम्पन्न परिवारों के बच्चे निजी शिक्षण संस्थानो में, निर्धन व मध्यम परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों में जाते हैं।
दिहाड़ीदार अभिभावकों के पास तो इतना समय भी नहीं होता कि वे सोच सकें या पूछ सकें कि आज उनका बच्चा स्कूल भी गया है या नहीं। यदि गया भी है तो उसने क्या किया।
आजकल सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगभग बढऩे लगी है क्योंकि सरकार ने निजी शिक्षण संस्थानों में जाने वाले छात्रों को धन का लालच देकर उन्हे सरकारी स्कूलों में बुलाने की चाल चली है। सरकारी स्कूलों में रिजर्व कैटेगरी के बच्चों को एकमुश्त व मासिक प्रोत्साहन राशि देना शुरू की है जिससे बच्चे अधिक सख्यां में सरकारी स्कूल में आएं। बच्चों का नियमित रूप से पाठशाला में न आना, आठवीं कक्षा तक बच्चों का फेल न करना,बच्चों को डाँटने की मनाही तथा अभिभावकों की अपने बच्चों के प्रति उदासीनता और ऊपर से सरकार द्वारा दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि, परिणाम स्वरूप शिक्षा का स्तर ऊपर उठने की बजाए इतना नीचे गिर चुका है, जिसकी जिम्मेवार सरकार और समाज दोनों हैं। ठीक है कि हम स्वतन्त्र हैं, हमें बोलने-लिखने-करने का अधिकार है परन्तु जितने हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुए हैं उससे कहीं अधिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग व समर्पित होना अधिक अपेक्षित है, तभी हम अपने देश, समाज यहाँ तक कि अपने आप के साथ न्याय कर सकेंगे। हर नागरिक में अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित भावना, समानता की भावना ही अपने देश को अतीत में “सोने की चिडिय़ा” कहलाने का गौरव पुन: दे सकती है।


