शिवराज सिंह चौहान जी, जो रास्ता हमें ऊपर लेकर जाता है, हमें नीचे भी लाता है
शिवराज सिंह चौहान जी, जो रास्ता हमें ऊपर लेकर जाता है, हमें नीचे भी लाता है
शिवराज सिंह चौहान के नाम खुला पत्र
आदरणीय शिवराज सिंह चौहान
मुख्यमंत्री, भोपाल- मध्यप्रदेश।
आदरणीय शिवराज सिंह चौहान, पता नहीं क्यों मेरे अंदर से हर बार यही आवाज आती है कि मैं आपको नमस्कार न करूं, लेकिन स्वभाव और शिष्टता के नाते मेरा औपचारिक नमस्कार आप स्वीकार करिए।
जब मध्यप्रदेश में नहीं रहता था, तब भी आपका नाम बहुत सुनता था, कि आपकी अगुवाई में प्रदेश ने वह सारा कीर्तिमान हांसिल कर लिया, जिसे प्रदेश को सख्त जरूरत थी।
खैर चार साल से तो मैं आपको नियमित तौर पर देख रहा हूं और सुन भी रहा हूं, लेकिन आपके द्वारा बोला गया कोई भी वाक्य चरितार्थ होते हुए नहीं देख पाया। जब आपके प्रदेश में आया तो सबसे पहले मैं यह जानने में लगा कि आपके अंदर ऐसी क्या खूबी है कि आप ही को लगातार प्रदेश की कुंजी हांसिल हो रही है। इस संदर्भ में कई लोगों से पूछताछ किया पर संतोषजनक जबाब नहीं मिल सका।
मैं ठहरा हठधर्मी स्वाभाव का आदमी तो आपकों लेकर मंथन करना शुरू किया और एक दिन इस नतीजे पर पहुंच गया कि आपमें एक खूबी है जो आपको प्रदेश में सभी नेताओं से अलग दर्जा देती है। वह खूबी है आपकी भाषाई चतुरता। आप दर्शनशास्त्र के छात्र रहे हो, तो स्वभाविक सी बात है कि आपको भाषा से खेलने का हुनर बहुत अच्छी तरह से आता होगा। आप इस कला का उपयोग भी खूब किए। लेकिन आप एक बात नहीं जानते हैं, वह यह कि जो रास्ता हमें ऊपर लेकर जाता है फिर वही रास्ता हमें नीचे भी लाता है। आप देखिएगा आपकों एक दिन आपकी दोहरी भाषा की कला ही आपके लिए चक्रव्यूह साबित होगी और आप कुछ नहीं कर पाएंगे।
आपके नेतृत्व मे प्रदेश विकास कर रहा है ऊधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश का चौतरफा विकास हो रहा है, और इधर मेरा कलेजा फटा जा रहा है। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि आप लोग किस विकास की बात करते हैं?
क्या आप लोगों की नजर में आप लोगों का फतवा ही विकास का रूप है तो नहीं चाहिए मुझे यह विकास।
यह मेरी आवाज नहीं है बल्कि उस बच्ची की आवाज है जिसके आंखों में कल तक नीला आसमान डूबता और उतराता था, आप उस लड़की को मीरा समझ सकते हैं, लेकिन मैं उस लड़की को जारा कहता हूं।
रात भर जारा अपने टूटे हुए घर के पास बैठकर अपनी स्मृतियां संजोती रहती है। जब भी मैं उसके पास खड़ा होता हूं, वह मुझे बहुत ही गौर से देखती है, मुझे ऐसा लगता है कि मैं इसके घर का हत्यारा हूं। मैं भी उससे आंख नहीं मिला पाता हूं। लेकिन बहुत हिम्मत करके जब जारा की आंखों में देखता हूं तो जानते हैं शिवराज जी, मुझे क्या दिखाई देता है? उसकी आंखों में उसका घर जल रहा है, उसकी स्मृतियां राख हो रही हैं, वह कभी रो रही है, तो कभी अपनी भूख संभालती हुई किताबों को बचाना चाहती है, लेकिन कुछ नहीं कर पाती और सब कुछ खत्म हो जाता हैं।
जारा की आंखे बार- बार कहती हैं मेरा क्या गुनाह था, जो मेरा घर गिरा दिया गया।
बोलिए शिवराज जी आप क्या जबाब देंगे?
आप तो यहीं कहेंगे स्मार्ट सिटी के चलते जारा का घर गिर गया। लेकिन आप खुद सोचिए जारा कभी आप से यह कहने के लिए आई थी क्या कि आप मेरे घर को स्मार्ट बना दीजिए। वह तो अपने कागजों की दुनिया में स्याही भर कर खुश होने का हर रोज बहाना ढूंढ रही थी, लेकिन पिछले कुछ रोज से वह अपने सपनों की राख पर बैठकर आसमान में खुद को खोज रही है।
एक तरफ आप खुद को बच्चों का मामा कहते- फिरते हैं, लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि आपके प्रदेश में इधर दो सालों से हामिद ने कोई सपना नहीं देख पाया।
हामिद जब भी स्कूल जाता है वह खाली हाथ वापस लौटता है। जानते हैं क्यों ?
क्योंकि प्रदेश के अधिकांश शिक्षक पिछले कुछ सालों से काली दीवाली के साए में जिंदगी गुजार रहे हैं। ऐसे में ये अध्यापक स्कूलों में क्या पढ़ांएंगे? जब अध्यापकों के पास आपको जगाने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा, तो मजबूर होकर नब्बे अध्यापकों ने आपको अपने खून से पत्र लिखा है। लेकिन मैं जानता हूं इन पत्रों का आपके ऊपर कोई असर नहीं होने वाला है। क्योंकि आप शिव नहीं है बल्कि शव है।
आप खुद सोचिए एक तरफ आपके प्रदेश में जारा का ख्वाब दफन हो रहा है, हामिद स्कूल से खाली हाथ वापस लौट रहा है और प्रदेश के । ऐसी कठिन स्थिति में आप अपने घर में बैठकर सपरिवार शिव की पूजा कर रहे हैं। क्या आपने यही अपने सनातन धर्म से आज तक सीखा है?
शिवराज जी भोपाल स्थित वह घर आपका नहीं है, बल्कि प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता का है।
आपका एक मंत्री सीना ठोक कर कहता है कि प्रदेश में किसान इसलिए आत्महत्या कर रहा है कि क्योंकि उसे भूत- प्रेत पकड़ ले रहा है।
आप इस बात से कहां तक सहमत है?
एक तरफ आपके मातहत अधिकारी आत्महत्या रोकने के लिए हेल्पलाइन बना रहे हैं। मसलन आपके प्रदेश में कुछ भी ऐसा नहीं हो रहा है कि जिससे मेरे जैसा आदमी हंसने का बहाना खोज सके।
जानते हैं शिवराज जी आपके प्रदेश में मैं पिछले चार साल से मौन हूं, नहीं इच्छा होती है कुछ बोलने की। क्योंकि मैं गंगा के किनारे का हूं, बोलूंगा तो किसी के वैभव खत्म हो जाएगा।
भाषाई मजदूर
नीतीश मिश्र


