शुक्रिया मणि जी...तो महिषासुर अनैतिक और लंपट हो गया था ?
शुक्रिया मणि जी...तो महिषासुर अनैतिक और लंपट हो गया था ?
सुमंत भट्टाचार्या
दलित राजनीति के पैरोकार जब "महिषासुर" को भारतीय मूल वासियों का राजा और देवी दुर्गा को "गणिका" बताते हैं, और यह भी कहते हैं कि आर्यों ने एक गणिका का सहारा लेकर असुरराज महिषासुर की छल से हत्या करवाई थी तो मैंने कल अपनी पोस्ट पर कुछ अपने संशय जाहिर किए थे। दलितों के आह्वाहन पर "भारतीय चिंतन की श्रमण परंपरा" के तहत मिथकीय इतिहास के इस प्रकरण पर अपनी संशय सामने भी रखे और दलित चिंतकों से कुछ सवाल पूछें। हालांकि मेरे साथ फेसबुक पर बहुतेरे दलित चिंतक हैं, लेकिन एक भी मित्र सामने नहीं आया।
मित्रों की जानकारी के लिए बताना चाहूंगा, महिषासुर की पूरी श्रमण आख्या मणि जी के लिखे "यह हम किसे पूज रहे हैं?" पर आधारित है। जो सबसे पहले "हिंदुस्तान" अखबार में छपी, फिर "विकल्प" में और अब "फॉरवर्ड प्रेस" में। जिस पर "जेएनयू" में "दलित-पिछड़ा छात्र संगठन" ने "महिषासुर पूजा कार्यक्रम" का आरंभ किया।
मैं समझना चाहता था कि मेरे उठाए संशय पर मणि जी क्या राय है। क्योंकि मुझे आशंका थी कि कहीं मेरे यह सवाल मेरे जातिगत आग्रह के हिस्से तो नहीं हैं? मणि जी ने बताया, "आपकी पोस्ट कई बेवसाइट्स और पोर्टल ने साझा की है। बिहार से मेरे एक मित्र ने आपकी पोस्ट को फोन पर पढ़कर सुनाया।" फिर मणि जी बोले," सुमंत जी मैं आपके उठाए सवालों और संशय से पूरी तरह से सहमत हूं और मैं अपना पूरा समर्थन देता है।" मणि जी का स्पष्ट कहना है, "कोई भी शासक, राजनीति या सोच यदि अनैतिक है तो उसका पतन अनिवार्य है, यह ठीक वैसे ही है, अस्सी के शुरुआत के लालू को 95 के लालू से नहीं आंका जा सकता है, सत्ता का नैतिक पतन ऐतिहासिक सत्य है और मिथकों को विश्लेषण करते समय़ हम इस इतिहासबोध से खुद को अलग नहीं रख सकते।।
अब प्रश्न यह कि यदि समय के साथ जाति योद्धा वाले आज के नेताओं की तरह महिषासुर एक लंपट, भोगी और दुश्चरित्र राजा बन गया था, और एक ऐसा राजा जिसके वध पर उसकी प्रजा या बहुसंख्य कोई प्रतिक्रिया नहीं करती। तो हमें सोचना होगा कि क्या वास्तव में महिषासुर को महिमा मंडित करने का कोई नैतिक आधार है भी? और यदि है तो उस नैतिक आधार पर मुक्त ह्दय से विमर्श होना चाहिए। दूसरे, इसी बिंदू पर हमें यह भी सोचना होगा कि वह कौन सा समाज था जिसने महिषासुर की हत्या पर एक गणिका यानी दुर्गा नामक महिला को इतना पूज्य और अराध्य बना दिया? हालांकि "अंबेडकर" इस बिंदू पर कहते हैं, "हिंदू संस्कृति के देव इतने कायर थे कि पुरुषार्थ के लिए उन्हें एक महिला की आवश्कता पड़ी।" जब अंबेडकर ऐसा कहते हैं तो मुझे लगता है कि उनका जातिवादी आग्रह और तब के शिक्षित और सवर्ण समाज के प्रति यह उनका निजी सोच प्रभावी था। अब तो अंबेडकर पर भी श्रमण परंपरा के तहत मुक्तह्दय से विचार होना चाहिए। क्या दलित चिंतक इसके लिए राजी होंगे?
जबकि इसका मूल प्रश्न तो कहीं व्यापक है। दलित आख्या है, देवी दुर्गा एक गणिका यानी वेश्या थी, यदि ऐसा है तो वह समाज वाकई धन्य है, जिसने एक वेश्या को हमेशा के लिए इस संस्कृति में पूज्य बना दिया। और देवी दुर्गा के इन आराधकों में सिर्फ कथित आर्य ही नहीं, कथित अनार्य भी एकमत से शामिल हुए। कहीं कोई प्रतिरोध का स्वर नहीं दिखाई देता है। और पारदर्शिता-स्वीकृति ऐसी कि देवी दुर्गा को आज भी गणिका स्वीकार करते हुए देवी दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण के लिए वेश्यालयों की मिट्टी लाई जाती है। छिपाने का कोई कुत्सित प्रयास नहीं दिखाई देता। धन्य है वह समाज और उसकी सोच।
निजी तौर पर मुझे लगता है कि जब तक दलित चिंतन मिथकीय प्रतीकों की पुनर्व्याख्या में यह स्पष्ट नहीं करेगा कि आखिर उस कथित मूलनिवासियों का "नीतिशास्त्र" क्या था? क्योंकि हिंदू धर्म को पूरा खारिज तभी किया जा सकता है जबकि उसके सारे नीतिगत आधार ढहा दिए जाएं। और यह बताया जाए कि जो समाज शोषित हुआ, दमित रहा। उसके नीतिगत आधार और मानक कहीं व्यापक और तार्किक हैं। वरना, ऐसे मिथकीय प्रतीकों को स्थापित करने या पुनर्परिभाषित करने का हर प्रयास खारिज होता रहेगा। बाहरी समझे जाने वाले आर्यों और भीतरी समझे जाने वाले अनार्यो, दोनों के बीच ही। मां दंतेश्वरी इस सोच की एक जिंदा मिसाल है। जो बस्तर के बहुसंख्य जनजातियों की पूज्य देवी हैं। जो शक्ति की ही प्रतीक हैं।
अब अगली पोस्ट में वर्णवाद पर बात करूंगा। फिलहाल इतना ही।
(सुमंत भट्टाचार्या की फेसबुक वॉल से साभार)
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