राजेन्‍द्र राठौर

मध्य प्रदेश में खुशहाली के दावे करने वाली सरकार विधानसभा में मान रही है कि 86 दिन में 136 किसान मौत को गले लगा चुके हैं। दो साल के आकड़ों पर नजर डालें, तो 400 किसान आत्महत्या कर चुके

हैं। सरकार के उपेक्षित रवैये से मध्य प्रदेश का अन्नदाता पूरी तरह टूट चुका है, हताश हो चुका है। किसान को लगने लगा है कि उसके वोटों से चुनकर आई सरकार दावे कितने भी क्यों न कर ले, लेकिन उसकी मुश्किलों को हल करने की नीयत सरकार की नहीं है।
भारत की आत्मा किसानों में वास करती है। पिछले महीने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय भी सरकार से सवाल कर चुका है कि किसान जान क्यों दे रहे हैं? जाहिर है, सरकार को पता है कि किसान जीने की बजाय मरना बेहतर क्यों समझ रहा है? सरकार को उसकी जर्जर होती जिंदगी के बारे में पता है, लेकिन कुछ-कुछ करने की मंशा कहीं नजर नहीं आ रही। कर्जे के बोझ में दबे किसान को उबारने के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे। नकली खाद-बीज और कीटनाशक धड़ल्ले से बिक रहा है, लेकिन उसे रोकने वाला कोई नहीं। शीतलहर और पाले ने किसानों की आशाओं पर पानी फेर दिया, लेकिन उसकी सुध लेने की परवाह सरकार को नहीं है। किसानों के चेहरे पर मुस्कराहट लाने की घोषणा चुनाव से पहले भी की गई थी और दो सालों से आश्वासनों का झुनझुना तो बजाया जा रहा है, लेकिन किसानों को राहत नहीं मिल पा रही। इसके कारणों पर नजर डाली जाए, तो पता चल जाएगा कि सरकार की प्राथमिकताएं किसान नहीं कोई और है। सरकार की प्राथमिकता जमीन जोतने वाले किसान से अधिक जमीनों पर कब्जा कर बेचने वाले भू-माफिया के बचाव की नजर आती है। किसान कर्जे के बोझ में दबे हैं, लेकिन उबारने की बजाय सरकार यदि सूदखोरों के साथ ही खड़ी नजर आए, तो उन्हें बचाने कौन आएगा? मुख्यमंत्री किसानों के लिए मुआवजे ऐलान करते हैं, लेकिन मुआवजे के लिए भी किसानों को तरसना पड़ रहा है। राज्य की नौकरशाही इतनी स्वच्छन्द हो चुकी है कि उसे किसी से डर नहीं लगता। न उसे सरकारी घोषणाओं पर अमल की परवाह है और न ही अपने कर्तव्यों की! इसे देश की त्रासदी ही कहा जाएगा कि किसानों के वोटों से बनी सरकारें सत्ता में आते ही किसानों को भूल जाती हैं। यही कारण है कि आजादी के बाद देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का 55 फीसदी योगदान आज 15 फीसदी तक सिमटकर रह गया है। मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसे लगातार दूसरी बार सत्ता की सीढियों तक पहुंचाने वाला किसान अगर त्रस्त है, तो खुशहाली और विकास के उसके तमाम दावे खोखले ही माने जाएंगे। कांग्रेस शासित राज्यों में किसानों की आत्महत्या का मामला जोर-शोर से उठाने वाली भाजपा के शीषस्थ नेतृत्व को भी मध्यप्रदेश सरकार से इस मुद्दे पर जवाब-तलब करना चाहिए। भारत हो, मध्‍यप्रदेश, छत्‍तीसगढ या राजस्‍थान खुशहाल नजर तभी आएंगे, जब किसान खुशहाल होंगे।
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शराबी और पागल थे मरने वाले किसान !

मध्यप्रदेश सरकार ने विधानसभा में 348 किसानों की मौत का जो रहस्य बताया है,वह चौंकाने वाला है। सरकार ने मरने वाले किसानों में से 65 को शराबी और 35 को पागल करार दिया है। जबकि कुछ किसानों की मौत नपुंसक व अन्य कारणों से होने की जानकारी सरकार ने सदन में रखी है। सरकार के इस जवाब से कई सवाल उठने लगे हैं।
मध्यप्रदेश सरकार ने मृत्यु के जो कारण गिनाए हैं, वे कई प्रश्न पैदा कर रहे हैं। क्या शराब के नशे का आदी किसान बेवजह अपनी जान दे सकता है या मरने वाले किसानों में 10 फीसदी मानसिक रूप से विक्षिप्त हो सकते हैं? किसी की नौकरी नहीं लगी, तो उसने इहलीला समाप्त कर ली। पत्नी वियोग, प्रेम प्रसंग और परिजनों की मृत्यु भी सरकार की पड़ताल में किसानों की मृत्यु के कारणों के रूप में उभरी हैं। एक किसान की मौत मामूली पेट दर्द से हुई है। ऐसे और भी किसान हैं, जिनकी मौत सामान्य कारणों से होना बताया गया है। विधानसभा में इस बारे में भी प्रश्न पूछा था कि मरने वाले किसानों पर राष्ट्रीयकृत बैंक, सहकारी बैंक एवं निजी साहूकारों का कितना कर्जा था। इसके उत्तर विभागों से मंगवाकर सत्र के दौरान उपलब्ध कराए जाने की बात गृहमंत्री द्वारा कही गई है। इस पर विपक्ष ने आपत्ति जताई है। इधर किसानों की मौत के मामले में गृहमंत्री की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार भोपाल जिले के अरविंद गौर (18) व बुरहानपुर के घनश्याम पुरा निवासी धर्मा, इंद्रपाल व परसराम की मौत की वजह शादी नहीं होना था। शाहनगर के किसान राकेश को तो साले की शादी न होने का गम ले डूबा। सरकार ने मृतक किसानों में सागर जिले के थाना देवरी के त्रिलोकी और पटेरा के नन्हे भाई की मौत का कारण कर्ज माना है। वहीं दमोह में तेजगढ़ के नंदकिशोर व कुलुआ के नंदराम की मौत फसल खराब होने के कारण होना स्वीकार किया गया है। विधानसभा में सरकार की ओर से जो तथ्य प्रस्तुत किए गए है, उसके अनुसार मरने वालों में ऐसे किसान भी हैं, जो नपुंसक थे। इसलिए उन्होंने मौत को गले लगा लिया। इनमें झाबुआ के इटावा के बालू किसान का उदाहरण दिया गया है। इसी तरह 5 एकड़ जमीन के सीमान्त कृषक दौलत सिंह ने पढ़ाई में मन न लगने के कारण जहर खा लिया। हाकम सिंह गुर्जर परिवार में बैलगाड़ी के बंटवारे से असंतुष्ट था। हल्के राम को पत्नी शराब पीने के लिए पैसा नहीं देती थी। ऐसे और भी कई कारण गिनाए गए है, लेकिन खुद को जनता का हितैषी बताने वाली मध्यप्रदेश सरकार यह कतई मानने को तैयार नहीं है कि कहीं न कहीं किसानों की आत्महत्या के लिए उनका प्रशासनिक तंत्र काफी हद तक जिम्मेदार है। विधानसभा में राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत किए गए चंद आंकड़ों से ऐसा जाहिर हो रहा है कि सरकार किसानों को खुशहाल बनाने के बजाय किन्ही कारणों से उनकी मौत के बाद आंकड़े गिनाकर खुद को पाक साफ बताने में ज्यादा विश्वास रखती है।