<यह कविता दिल्ली स्थित भारत में सऊदी अरब दूतावास के एक राजनयिक पर दो नेपाली महिलाओं (माँ-बेटी) को कई महीनों तक अपने घर में बंधक बनाये रख उन्हें अपनी और अपने मेहमानों की हवस का शिकार बनाये जाने की घटना से प्रेरित है. इन महिलाओं को दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास और नेपाली गैर सरकारी संगठन की पहल पर दिल्ली पुलिस ने छापा मार कर छुड़ाया. लेकिन डिप्लोमेटिक इम्युनिटी लागू होने की वजह से, सऊदी राजनयिक पर सामूहिक बलात्कार का मुकदमा दर्ज करने के बाद भी दिल्ली पुलिस उसे और उसके परिवार (पत्नी व बच्चे) सहित अब तक गिरफ्तार नहीं कर सकी है. यह बात गौर तलब है कि नेपाली महिलाओं को न्याय दिलाने में अब भारत स्थित नेपाली दूतावास इस मामले में चुप्पी साध रहा है, क्यूंकि सऊदी अरब में लाखों की संख्या में नेपाली मजदूर काम करते है और इस कारण नेपाल-सऊदी अरब सम्बन्ध ख़राब न हो जाएँ>
-पवन पटेल
तुम पे नोंच खसोट के निशान
नहीं हैं सीमित
मात्र बच्चेदानी से उपजी
सभ्यता नाम की कायनात पर/
लम्पट सरमायादारी के कैनवास रचते हैं
तुम्हारी नियति का अट्टहास
एक बंधक राष्ट्र की आत्मा पर
रोज ब रोज की दर से
अपने स्वजन के हाथों ही
कुछ ही हजार में बिक जाने की नियति/
जीबी रोड की खांसती मनहूस गलियां
एचआईबी कोठे
रही है शरणस्थली
सदियों से तुम्हारी/
ओ! तीन पांच सिरपेंचधारी जंग बहादुरों
अपनी बेटियों का शेखों के हरम में
हुए ‘कन्यादान’ पर
चुप क्यूँ हो ?
नहीं, नहीं
क्या उम्मीद हो
जब चुप्पी दर चुप्पी पसरी हो
बच्चियों, बेटिओं, बहनों, माओं के ‘कन्यादानों’ पर
वो भी थोक के भाव
देश व्यापी स्तर पर/
हिन्दुस्थान में जन्मे
कैश माओवाद की माया से उपजी
संविधान सभा में
सालों से जारी महा मृत्युंजय जाप का
यही है, नारकीय सत्य
जिसकी है, फसल
शेखों के हरम में घुटती मूक वेदनाएं/
शेखों के हरम
जी बी रोड, सोनागाछी
तब तक
मेरी बेटिओं तुम्हारी शाश्वत नियति है/
मुक्ति की लहरें जब तक
पछाड़ खाकर भी
फिर से अपने रुदन में
सदियों का जमा लाल लावा लाकर
राख नहीं कर देती
इस नरक को//
<लेखक पवन पटेल- नेपाली समाज के एक भारतीय बिद्यार्थी है. वे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में पी.एच.डी. कर चुके हैं>