नेशनल बुक ट्रस्ट में दैनिक वेतन भोगी मजदूरों की दशा
सुनील कुमार
नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) की स्थापना 1957 में हुयी थी। इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य था, कम मूल्य में किताबों का प्रकाशन करना, पुस्तक पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करना, विदेशों में भारतीय पुस्तकों को प्रोत्साहन दिलाना, लेखकों और प्रकाशकों की सहायता करना, बाल साहित्य को बढ़ावा देना जिससे कि बच्चों को अच्छी पुस्तक मिल सकें, उनको देश के इतिहास, विज्ञान इत्यादि से परिचय कराया जा सके। नेशनल बुक ट्रस्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अन्तर्गत एक स्वायतशासी संस्था है। जिसकी जवाबदेही न के बराबर है लेकिन वहाँ पर लाभ व भ्रष्टाचार के मामले में किसी भी संस्था से कम नहीं है।

इस संस्था में कम्प्यूटर ऑपरेटर, पिउन, स्टोर, लिफ्ट ऑपरेटर, बिजल कर्मी, सफाईकर्मी, गार्ड सहित करीब 150 कर्मचारी दैनिक वेतन भोगी हैं। यहाँ पर तीन ठेकेदार हैं उनके अन्तर्गत काम करते हैं। ऐसे ही एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी से मेरी मुलाकत 12 अगस्त को बस में हुयी जब मैं ऑफिस से घर जा रहा था। वह बस में किसी व्यक्ति से काम के लिये कह रहा था। जिज्ञासावश मैं उनसे बात करने लगा तो उन्होंने बताया कि वह करीब तीन वर्ष से नेशनल बुक ट्रस्ट में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के रूप में काम कर रह थे। उनका परिवार गाँव में रहता है। इनके परिवार में तीन बच्चे और पत्नी हैं। ये हर महीने कुछ पैसा बचाकर गाँव को भेजते थे जिनसे इनके परिवार का खर्च और बच्चों की पढ़ाई किसी तरह चल रही थी। उन्हें काम पर आने-जाने और दो चाय पीने में करीब 60-70 रु. खर्च हो जाते थे, इनको अभी 298 रुपये प्रति दिन ईएसआई, पीएफ काट कर मिल रहा था। ईएसआई कार्ड तो मिला है जिस पर वे इलाज भी करवाते रहे हैं लेकिन आज तक उनको पीएफ की कोई रसीद प्राप्त नहीं हुयी है इनके पीएफ नम्बर का इंटरनेट पर कुछ अता-पता नहीं है। हर तीन माह पर उनके अनुबंध का नवीनीकरण कर नये सिरे से काम पर रख लिया जाता था इधर कुछ समय से अनुबंध एक माह पर ही नवीनीकरण किया जाने लगा था। पहले स्टोर में पैकेजिंग का काम किया करते थे बाद में एनसीसीएल बच्चों की लाइब्रेरी में चपरासी के रूप में काम करने लगे। जहाँ पर फाइलों को इधर से उधर करना साथ ही साथ किताबों की सफाई करना और उसको सही जगह पर रखने का काम किया करते थे। एनसीसीएल में दो प्योन तथा एक कम्प्यूटर आॅपरेटर ठेके पर थे। इनको बिना किसी पूर्व सूचना के 31 जुलाई को काम से हटा दिया गया इसी तरह कम्प्यूटर ऑपरेटर को भी 15 जुलाई को ही हटा दिया गया जब कि इस कर्मचारी का अनुबंध 31 जुलाई तक का था। अब वो चिंतित है कि उनको काम कब तक मिलेगा अभी बारिश का मौसम है सभी जगह काम की मंदी है। घर का खर्च कैसा चलेगा, बच्चों की फीस कैसे दी जायेगी, फीस जमा न होने पर उनकी पढ़ाई छूट जायेगी। पीएफ की निकासी के लिये ठेकेदार को 300 रु. भी दिये कि जल्दी फॉर्म जमा कर दे।’’ एनबीटी में किसी भी अवकाश का पैसा नहीं मिलता है और सप्ताह में दो दिन शनिवार, रविवार की छुट्टी होती है ये छुट्टी भी दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को नहीं मिलती है। इस तरह वहाँ काम करके 6000रु. तक पा जाते थे जो कि सरकार के आँकड़े के हिसाब से गरीब नहीं है उनको बीपीपएल कार्ड या अन्य कोई सरकारी सुविधा की जरूरत नहीं है।

बच्चे पढ़ पायेंगे कि नहीं पढ़ पायेंगे उस संस्था के कर्मचारी सोच रहे हैं जिस संस्था का निर्माण इसलिये किया गया था कि लोगों में पढ़ने की रूचि पैदा की जाये बच्चों के लिये अलग से विभाग बनाया गया था कि और उसी लाइब्रेरी में काम करने वाला कर्मचारी सोच रहा है कि उनके बच्चे अब कैसे पढ़ेंगे।

इस संस्था के डायरेक्टर एम.ए. सिकन्दर हैं जो कि पूर्व में दिल्ली विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार रह चुके हैं। इससे पता चलता है कि शिक्षा क्षेत्र से जुड़े व्यकित भी किस तरह से मेहनतकश जनता के प्रति असंवेदनशील हो चुका है। न तो उनको अपने मातहत काम करने वाले पीड़ित कर्मचारियों की वर्तमान की चिंता है और न उनके आने वाली भविष्य की। क्या इन कर्मचारियों को जीने का अधिकार नहीं है? इनके बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है ? जहाँ पर इन कर्मचारियों को बिना बताये एक झटके में निकाल दिया गया वहीं दूसरी तरफ डायरेक्टर द्वारा अपने परिचतों को डिस्पैच, आर्ट सेल, एकाउन्टस, आईपी सेक्शन, एवं सेल्स कोऑर्डीनेशन में रखवाया गया है। एनबीटी का नेहरू भवन अभी 4-5 वर्ष पहले बना है लेकिन उसमें कन्सट्रक्शन का काम जोर-शोर से करवाया गया है। निश्चय ही डायरेक्टर एम.ए. सिकन्दर को इस काम की प्रेरणा दिल्ली विश्वद्यालय से मिली होगी। हम सभी जानते हैं कि कन्सट्रक्शन के काम में क्या होता है ये बात किसी से दबी-छुपी नहीं है। हम समझ सकते हैं कि एनबीटी जिस उद्देश्य के लिये बना था वहाँ पर क्या हो रहा है?

अभी हाल में ही सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है कि दिहाड़ी कामगारों को शोषण क्यो? लेकिन इन तीन सालों से काम करने वाले दैनिकवेतन भोगी कर्मचारियों को एक झटके में निकाल बाहर किया गया। क्या यहाँ का श्रम कानून केवल फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिये ही है? यहाँ बड़े पदों पर आसीन लोगों की कोई जवाबदेही क्यों नहीं है?