श्री कृष्ण जैसे जुझारू क्रांतिकारी को लाल सलाम
श्री कृष्ण जैसे जुझारू क्रांतिकारी को लाल सलाम
श्री कृष्ण जैसे जुझारू क्रांतिकारी को लाल सलाम
श्री कृष्ण वन्दे जगद्गुरु
राजीव नयन बहुगुणा
हो सकता है कि कृष्ण नामक कोई पुरुष कभी भारत में रहे हों, और हो सकता है कि कपोल कल्पित हों। क्योंकि हम भारतीयों में दर्शन, कविता, धर्म, आयुर्वेद आदि को लेकर तो जागरूकता रही है, लेकिन इतिहास बोध हममें नहीं था। यह हमें कालांतर में इब्ने बतूता और फिर बर्नियर ने सिखाया, जिन्होंने कि तिथि एवम् समय का उल्लेख करते हुए घटनाओं को लिपिबद्ध किया।
हमारे रचनाकारों द्वारा लिखित सभी राम एवम कृष्ण कथाओं में इतिहास तत्व का अभाव है
लेकिन जो भी हों, कृष्ण वैसे कदापि न थे, जैसा कि उन्हें एक अय्याश और मक्कार राजनेता के रूप में पेश किया जाता है।
उन्होंने आमरण कष्ट भोगे। जेल में पैदा होकर माता पिता से दूर होना पड़ा। युवक होते ही अपने क़बीले समेत विस्थापित होकर गुजरात जाना पड़ा। अपनी सुहाग रात को समुद्र में आयी सुनामी के कारण बिस्तर पर भार्या को एकाकी छोड़ राहत और बचाव कार्य में जाना पड़ा। गुरु के अपहृत पुत्र को छुड़ा लाने खाड़ी देशों की जोखिम पूर्ण समुद्र यात्रा करनी पड़ी। अक्सर रथ की बजाय घोड़े पर बैठ गुजरात से दिल्ली, मेरठ, हरियाणा की कठिन यात्रा करते थे।
तत्कालीन भारत के सबसे बड़े हस्तिनापुर साम्राज्य के भाग्य विधाता बने, लेकिन स्वयं कभी सम्राट न बने, अपितु एक छोटे से क़बीले के कुलपति रहे। सम्पूर्ण संतति का नशे में विनाश देखा। स्वयं व्याध के हाथों मारे गए।
ऐसे जुझारू क्रांतिकारी को लाल सलाम । लेकिन पुनः कह दूं कि श्री कृष्ण इतिहास नहीं अपितु कल्पना का विषय हैं ।


