संघ का नया एजेंडा हार्दिक पटेल
संघ का नया एजेंडा हार्दिक पटेल
गुजरात में एक 22 साल का नवयुवक तूफान की तरह खड़ा हो गया है, इस तूफान में न सिर्फ गुजरात की शांति तहस-नहस हो गई, बल्कि नरेन्द्र मदी का विकास का गुजरात मॉडल भी तिनके की तरह उड़ गया। यह सवाल उभर कर सामने आने लगा, कि अगर गुजरात की सबसे सम्पन्न माने जाने वाला पटेल समुदाय ही अगर अपनी बदहाली की बात कर आरक्षण मांग रहा है, तो वहां किसका विकास हुआ ?
असल में धीरे-धीरे इस आंदोलन की और परतें सामने आने लगी हैं, यह आंदोलन आरक्षण मांगने के लिए है या आरक्षण खत्म करने के लिए। हार्दिक पटेल की जो नई मांग समाने आई है, वह यही है। एक बात तो पहले ही दिन से साफ थी, कि पूरा आंदोलन संघ प्रायोजित है, खासकर संघ के उस घड़े की इसमें मुख्य भूमिका है, जिन्हें नरेन्द्र मोदी ने किनारे लगा दिया था। गुजरात उन्होंने इसलिए चुना, क्योंकि वे उन्हें उन्हीं के घर में घेरना चाहते हैं। जिस तरह मीडिया इस आंदोलन को लेकर उत्साहित था, उसके बाद एक बात और साफ हो गई, इस पूरे आंदोलन के पीछे पूंजीपतियों का भी एक वर्ग काम कर रहा है, क्योंकि आरक्षण को लेकर गुर्जरों और जाटों के इससे पहले आंदोलन हो चुके हैं, मीडिया ने उन्हें इस तरह महत्व नहीं दिया।
असल में राहुल बजाज ने जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर पिछले दिनों निशाना साधा था, उसके बाद यह साफ हो गया था, कि भारतीय उद्योगपतियों का एक हिस्सा मोदी के खिलाफ हो गया है, यह समूह नरेन्द्र मोदी को केवल कुछ घरानों का प्रधानमंत्री मान रहा है।
जहां तक हार्दिक पटेल की बात करें, उसके फोटो हिंदूवादी नेता तोगड़िया के साथ सामने आए हैं। हालांकि संघ के एक घड़ा यह प्रचारित करने में लगा था, कि वह केजरीवाल का चेला है और नीतीश की तारीफ करता है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने भी जिस तरह उसकी तारीफ की, उसने इस मामले को और बल दिया, पर जल्दी ही सब साफ हो गया। हार्दिक पटेल खुद बाल ठाकरे को अपना आदर्श मानता है और उन्हीं की तरह रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाना चाहता है। गुजरात पटेलों का नारा तो चल नहीं सकता, पर उसे यह बात समझ में आ गई, जिस समुदाय से वह जुड़ा है, वह सबसे प्रभावी और सम्पन्न है। आरक्षण के बहाने वह इस समाज को लामबंद करने में कामयाब भी हो गया। उसकी आक्रामकता इतनी है, कि खुद नरेन्द्र मोदी को महात्मा गांधी याद आ गए।
हार्दिक जो चाहता था, वह उसने प्राप्त कर लिया है, इसीलिए वह धीरे-धीरे अपने आंदोलन को नई दिशा देने में लग गया था, जो आरक्षण को खत्म करने की दिशा में ले जाती है। असल में संघ परिवार लंबे समय से इस प्रयास में है। प्रधानमंत्री वी पी सिंह के समय जो आरक्षण के खिलाफ जो मुहिम शुरु हुई थी, उसका नेतृत्व भी अघोषित रुप से संघ की कर रहा था, यह बात इसलिए भी दावे से कही जा सकती है, क्योंकि इस आंदोलन के अधिकांश बड़े नेता बाद में भाजपा में शामिल हुए।
इस आंदोलन ने खासकर सवर्ण युवाओं में जो जातीय श्रेष्ठता का भाव पैदा किया, उसका पूरा उपयोग संघ परिवार ने राम रथ यात्रा के दौरान किया, जो इस आंदोलन के दौरान ही शुरु की गई थी। इस रथयात्रा के दौरान जो दंगे हुए, उसमें इन युवाओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा भी लिया। आज भी संघ परिवार जिन वर्गों को आरक्षण नहीं मिलता, उनमें आरक्षण विरोधी भावना फैलाने का काम करता रहता है, नए सोशल मीडिया पर हर रोज इस प्रकार के संदेश भरे रहते हैं।
असल में आर्थिक नीतियों से जो निराशा उपजती है, उसकी दिशा मोड़ने के लिए इस प्रकार के आंदोलन जरूरी हैं। बात अन्ना हजारे के आंदोलन की करें या हार्दिक पटेल के आंदोलन की। अन्ना ने भी केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया, वह संघ प्रायोजित था, यह बात भी अब साफ हो गई है, क्योंकि अब अन्ना न काले धन पर बोलते हैं, न भाजपा शासित प्रदेशों के भ्रष्टाचार पर। यहां तक कि अन्ना भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ जो पदयात्रा निकालने वाले थे, उसे इसलिए स्थगित किया गया, क्योंकि इस यात्रा का बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश से होकर गुजरता और वहां अन्ना को व्यापमं घोटाले के खिलाफ बोलना पड़ता। हार्दिक पटेल भी कहते हैं, कि गुजरात में जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं, वे अधिकांश पाटीदार हैं, दूसरा हमारे युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा, इसलिए आरक्षण चाहिए।
जिस तरह भ्रष्टाचार नई उदारवादी नीतियों का परिणाम है और अन्ना हजारे उसके खिलाफ कुछ नहीं बोलते, उसी प्रकार किसान आत्महत्या व बेरोजगारी भी इन्हीं नीतियों की देन हैं, हार्दिक पटेल भी उसके खिलाफ कुछ नहीं बोलते। क्या आरक्षण मिलने से आत्महत्या खत्म हो जाएंगी? जिन वर्गों को आरक्षण मिल रहा है, क्या वहां आत्महत्या नहीं होती? या जिन्हें आरक्षण मिलता है, उन लोगों में बेरोजगारी नहीं है।
मैं यह बात भी आज तक नहीं समझ पाया हूं, कि जो लोग आरक्षण को लेकर आंदोलित हो जाते हैं, व्यापमं जैसे घोटाले उन्हें आंदोलित क्यों नहीं करते? आरक्षण लेने वाला कुछ तो पढ़ता है, व्यापमं वाला तो परीक्षा देने तक नहीं जाता। क्या सिर्फ इसलिए कि यह घोटाला संघ और भाजपा के लोगों की मिलीभगत का परिणाम है। जो लोग आरक्षण का विरोध या समर्थन करते हैं, वे नौकरी बढ़ाने की मांग क्यों नहीं करते? सरकारें लगातार सरकारी सेवाएं खत्म कर रही है, विभागों में भी ठेके पर कर्मचारियों की भर्ती की जा रही है। शिक्षकों की जगह शिक्षामित्र या शिक्षाकर्मी ने ले ली। फिर भी युवा आंदोलित नहीं है।
हार्दिक ने आरक्षण खत्म करने की दिशा में जो कदम उठाया है, वह संघ परिवार की एक नए प्रकार की लामबंदी करने का संकेत है। जब देश का संविधान बन रहा था, तब संघ परिवार ने उसका विरोध करते हुए मनु स्मृति को लागू करने की बात कही थी। वही कोशिशें फिर से शुरु हो गई हैं। मनु स्मृति ‘शूद्रों’ को शिक्षा और संपत्ति का अधिकार नहीं देता। हालातों को फिर से वहीं पहुंचाने की तैयारी है, शिक्षा के बजट में कटौती कर मोदी सरकार उन्हें शिक्षा से बंचित रखेगी और आरक्षण लेकर जो थोड़ा बहुत उन्हें मिलता है, वह भी खत्म कर दिया जाएगा। हम फिर से आदिम युग की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां हवाई जहाज नहीं पुष्पक विमान उड़ा करेंगे।
भारत शर्मा


