संघ - भाजपा का मुकाबला तो वामपंथी ही कर सकते हैं
संघ - भाजपा का मुकाबला तो वामपंथी ही कर सकते हैं
भारत में संघ और भाजपा का मुकाबला तो वामपंथी ही कर सकते हैं
कम्युनिस्टों पर सवर्णवाद का आरोप लगाने वालों आज तुम्हारी जुबान पर ताला क्यों लगा है?
जाति के नाम पर वोट लूटने वालों चलो फिर से शर्म पी कर चिल्लाना शुरू करो कि कम्युनिस्ट दलितों के लिए नहीं लड़ते हैं।
खुद को दलितों का नेता कहने वाले दूर बैठ कर चाहे जितना बयानबाजी करते रहें लेकिन लाठी गोली का मुकाबला तो कामरेड ही करते आ रहे हैं, और आज भी कर रहे हैं।
संसद में अपनी सांसदों की संख्या काम होने के बावजूद इस जुल्मी भाजपा सरकार को कॉमरेडों ने सिर्फ चुनौती ही नहीं दिया बल्कि कई बार घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया है। ये एक सच्चाई है कि आज इस दौर में भारत में संघ और भाजपा का मुकाबला अगर कोई कर सकता है तो वामपंथी ही कर सकते हैं।
हाँ ये सच्चाई है कि कम्युनिस्टों में सभी जाति और धर्म के लोग हैं, उनमें सवर्ण जाति के लोग भी हैं, क्योंकि कम्युनिस्ट ये जानते हैं कि क्रन्तिकारी की कोई जाति धरम और देश नहीं होता है। क्रन्तिकारी सिर्फ क्रन्तिकारी होता है। कोई भी व्यक्ति क्रन्तिकारी जाति से नहीं विचारों से बनता है। मैं ऐसे बहुत से कॉमरेडों को जनता हूँ जो सवर्ण जाति से हैं लेकिन मनुवादियों के खिलाफ उनका प्रहार अन्य लोगों से ज्यादा तीखा है।
ये वो लोग हैं जिनकी सोच वैज्ञानिक है और विचारधारा आधुनिक है, जो सबकी समानता और स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं।
देश आजाद होने के बाद पूरे भारत में जो भूमिहीन और सबसे गरीब वर्ग था वह दलित ही था। पूरे भारत में सरकार और जमींदारों से छीन कर दलितों को ज़मीन बाटने वाले अगर कोई है तो कम्युनिस्ट ही है। इस संघर्ष में कितने कॉमरेडों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया है।
जाति के नाम पर सिर्फ वोट बटोरने वालों से सिर्फ इतना ही कहना है कि संघर्ष की इस घड़ी में भले ही तुम्हारा अता पता नहीं है लेकिन चुनाव के समय पर कम्युनिस्टों पर सवर्णवादी होने का आरोप जरूर लगाना। आखिर जो ये तुम्हारी रोटी का सवाल है।
संतोष कुमार मौर्या


