संघर्ष के 30 साल - जो पीड़ा मेधा की है, वही नर्मदा घाटी की
संघर्ष के 30 साल - जो पीड़ा मेधा की है, वही नर्मदा घाटी की
नर्मदा घाटी-सरदार पटेल राजनीति का हथकंडा हैं
जहां इंसानों की जिंदगी पर एक मूर्ति भारी हो, वहां सत्ता प्रतिष्ठान की नीयत साफ समझ में आती है
पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में नर्मदा को लेकर आयोजित एक कार्यक्रम में जब मेधा पाटकर ने जब यह कहा, कि लड़ाई लड़ते हुए 30 साल हो चुके हैं, पर अब समझ नहीं आता, लड़ाई को किस दिशा में ले जाएं, तो इस बयान से उनकी पीड़ा झलक रही थी।
मेधा और नर्मदा घाटी एक दूसरे के पर्याय हैं। जो पीड़ा मेधा की है, वही नर्मदा घाटी की। दोनों लड़ते-लड़ते थक चुके हैं, पर सरकारों को उनका दुख समझ नहीं आता। विकास किसके लिए और किनकी शर्तों पर, यह बहस अभी भी जारी है। लोग लड़ रहे हैं, सत्ता प्रतिष्ठान से, और सत्ता अपनी जिद पर अड़ी है, वह जिसे विकास मानती है, वही अंतिम सच है।
आप मेधा पाटकर से सहमत या असहमत हो सकते हैं। उन पर तमाम आरोप लगा सकते हैं, पर उस लड़ाई से असहमत नहीं हो सकते, जो वे लड़ रही हैं। यह सच है, इतनी लंबी लड़ाई के बाद भी वे कुछ नहीं बचा पाईं, न डूबते शहर, कस्बे, गांव, न विस्थापित होते लोगों को। लड़ाई सड़क से लेकर अदालतों तक लड़ी गई, अदालतों ने कई ऐतिहासिक फैसलें भी दिए, पर सत्ता प्रतिष्ठान ने सभी को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। लड़ाई अब फिर चालू है, सरकार सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने पर तुली है और घाटी के लोग एक फिर अपनी जिंदगी बचाने के लिए संघर्ष के मैदान में हैं। नर्मदा घाटी में एक बार फिर आंदोलन का बिगुल बज चुका है, जो पदयात्रा के रुप में 6 अगस्त को खलघाट से शुरु होगा और 12 अगस्त को राजघाट पहुंचकर सत्याग्रह में बदल जाएगा।
असल में नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहला निर्णय जो लिया, वह सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाकर 139 मीटर करने का था। अगर इसे अमल में लाया जाता है, तो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात के 245 गांव व धरमपुरी शहर डूब में आ जाएगा। हालांकि अदालतों का स्पष्ट निर्देश है, कि जब तक पुर्नवास का काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक किसी ऊंचाई बढ़ाने का काम शुरु नहीं किया जाए। सरकार कहती है, पुर्नवास हो चुका है, जबकि आंदोलन कहता है, हजारों परिवार आज भी विस्थापन के लिए भटक रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली से एक फैक्ट फाइंडिंग टीम भी घाटी का दौरा करने गई थी, इस टीम ने भी पाया, कि सरकार ने विस्थापन का काम सही तरीके से नहीं किया है, उल्टा विस्थापन के नाम पर भारी भ्रष्टाचार किया गया है, जिसकी जांच एस एस झा आयोग कर रहा है।
घाटी में विस्थापन केवल सरदार सरोवर में ही नहीं है, सरकार नर्मदा नदी पर कुल 30 बड़े और 135 मझोले बांध बना रही है। इस पूरे इलाके में जो विस्थापन हुआ है, उसकी बड़ी मार आदिवासियों पर पड़ी है। विस्थापित गांवों में से करीब 70 फीसदी आदिवासी बहुल गांव मप्र के हैं, वहीं महाराष्ट्र व गुजरात के सभी गांव आदिवासी बहुल हैं। इन बांधों के कारण मप्र में सबसे अधिक विस्थापन हुआ है और फायदा गुजरात को हुआ है। मप्र को केवल बिजली के लिहाज से ही फायदा है, जबकि सिंचाई पूरी तरह से गुजरात के हिस्से में जा रही है।
आंदोलन एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा करता है, जो जरुरी भी है कि बांध की जो ऊंचाई है, क्या उसका पूरा उपयोग किया जा सका है।
आंदोलन का कहना है, कि नरेन्द्र मोदी 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, यहां बांध की 122 मीटर ऊंचाई पर 8 लाख हैक्टेयर जमीन को सिंचित बनाने का दावा किया गया था, पर 30 फीसदी से भी कम नहरों का जाल बिछाया जा सका है, जिससे 2 लाख हैक्टेयर से भी कम जमीन सिंचित हो पा रहे हैं। यह भी बताया जा रहा है, कि गुजरात सरकार बड़े औद्योगिक घरानों को एक हजार लीटर पानी मात्र 10 रुपए में बेच रही है, इसमें से कुछ इस पानी को बोतल में भरकर 15 रुपए लीटर बेच रहे हैं।
आंदोलन का दावा है, कि इतने लोगों के विस्थापन के बाद केवल 10 फीसदी बिजली का उत्पादन की अधिक होगा, ऐसे में बांध की ऊंचाई बढ़ाना जरुरी है। क्योंकि विस्थापन के साथ सभ्यता भी खत्म होती है। नर्मदा घाटी का एक बड़ा कस्बा हरसूद जब डूब रहा था, यह यह नजारा मैंने खुद देखा था। किस तरह मुआवजे में गड़बड़ियां की गईं और किस तरह नया हरसूद बसाया गया। यहां के लोग आज भी पुर्नवास और रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट भी इस बात का खुलासा करती है, कि सरकार को जिस प्रकार प्रभावित परिवारों की मदद करना चाहिए थी, वह उसने नहीं की है।
घाटी में जो लड़ाई चल रही है, वह अकेली नहीं है। देशभर में विकास की इस अवधारणा को लेकर लड़ाई जारी है। जीवन का अस्तित्व बचाए रखने की लड़ाई जारी है, पर इन लोगों की बलि लेकर जिन लोगों को विकास का सपना दिखाया जा रहा है, वह भी पूरा नहीं हो पा रहा है। सरकारों की नजर में आम आदमी की कीमत क्या है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि बांध के विस्थापितों के कुल खर्च से अधिक 2500 करोड़ रुपए तो सरकार केवल सरदार पटेल की मूर्ति लगाने में खर्च करने जा रही है, जिससे पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके। सरदार पटेल राजनीति का हथकंडा हैं। जहां इंसानों की जिंदगी पर एक मूर्ति भारी हो, वहां सत्ता प्रतिष्ठान की नीयत साफ समझ में आती है। फिर भी घाटी में लड़ेंगे, जीतेंगे, का जो नारा गूंजेगा, वह उम्मीद की किरण जगाए रखेगा।
भारत शर्मा


