संसद में जब मोदी अपनी पीठ ठोकते रहे होंगे तो शर्तिया उनके सांसद तब अपनी छाती पीटते रहे होंगे
संसद में जब मोदी अपनी पीठ ठोकते रहे होंगे तो शर्तिया उनके सांसद तब अपनी छाती पीटते रहे होंगे
राजीव मित्तल
दोस्तो..इस बार का बजट देख कुछ ऐसा नहीं लगता जैसे गड्ढों से भरी सड़क पर पैचवर्क चल रहा हो...गड्ढों में बजरी भरवा रहे ठेकेदार और उस ठेके से वसूली करने वाले नगर निगम के इंजीनियर दोनों का उद्देश्य ही यही है कि बस.. एक बरसात से ज़्यादा नहीं चलना चाहिये पैचवर्क..
कई वर्षों से आम बजट दिशाहीन... उद्देश्यहीन... उदासीन हो चला है....रस्म अदायगी... जैसे इन दिनों आर्यसमाज में हवन होता है उस तरह..आर्यों की राह तकता एक ऐसा भवन ... जिसमें कुछ बनिये बैठे शेयरों का उतार चढ़ाव बांच रहे..और जिसकी मैनेजरी करमकांडी पंडत के हाथ में हो...
इस बार का बजट तो और कांचू इसलिये भी है कि सरकार ने जैसे मान लिया है कि कुछ न करो...दिन कट ही जाएंगे... न कोई विज़न... न आगे की सोच न पीछे की सुखनुमा यादें.. बस और बस बक़वासबाजी..अपने कारनामों को केले के पत्ते से ढांपना..
नोटबंदी पर संसद में जब मोदी अपनी पीठ ठोकते रहे होंगे तो शर्तिया उनके सांसद तब अपनी छाती पीटते रहे होंगे..
बहरहाल..जूते और प्याज दोनों साथ साथ खाने का कारनामा इस सरकार की अनोखी देन है...जिसका ख़ामियाजा भुगतने को अगली सरकार तैयार रहे..


