सच्चे अर्थों में एक नव-यथार्थवादी फिल्म है फंड्री
सच्चे अर्थों में एक नव-यथार्थवादी फिल्म है फंड्री
राष्ट्र में दलितों की दशा को दर्शाया ‘फंड्री’ ने
‘फंड्री’ के साथ उठा छठे प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्म फेस्टिवल का पर्दा
पटना में आयोजित छठे पटना फिल्मोत्सव प्रतिरोध का सिनेमा में दलित फिल्मकार नागराज मंजुले की फिल्म ‘फंड्री’ का प्रदर्शन किया गया।
‘फंड्री’ महाराष्ट्र के एक दलित समुदाय ‘कैकाडी’ द्वारा बोले जाने वाली बोली का शब्द है जिसका अर्थ सूअर होता है। फिल्म एक दलित लड़के जामवंत उर्फ जब्या (सोमनाथ अवघडे) की कहानी है जो किशोरवय का है और अपनी कक्षा में पढ़ने वाली एक उच्च जाति की लड़की शालू (राजेश्वरी खरात) से प्यार कर बैठा है। लेकिन यह प्रेम कहानी वाली फिल्म नहीं है, बल्कि इस फिल्म के गहरे सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ हैं। पृष्ठभूमि में दिख रही स्कूल की दीवारों पर बनी अम्बेडकर और सावित्रीबाई फुले की तस्वीरें हो या कक्षा में अंतिम पंक्ति में बैठने को मजबूर दलित बच्चे, अपने घर की दीवार पर ‘शुभ विवाह’ लिख रहा जब्या का परिवार हो या फिर स्कूल में डफली बजा रहा जब्या या फिर एक अन्य दृश्य जहाँ जब्या का परिवार सूअर उठाकर ले जाता रहता है, तब भी पृष्ठभूमि में दीवार पर दलित आन्दोलनों से जुड़े सभी अगुआ नेताओं की तस्वीरें नजर आती हैं।
इस फिल्म में एक अविस्मरणीय दृश्य है। जब्या स्कूल जाने की जगह गाँव के सवर्णों के आदेश पर अपने परिवार के साथ सूअर पकड़ रहा होता है, तभी अचानक स्कूल में राष्ट्र-गान बजना शुरू हो जाता है। राष्ट्र-गान सुनकर पहले जब्या स्थिर खड़ा हो जाता है और फिर उसका पूरा परिवार। इस दृश्य के गहरे राजनीतिक अर्थ हैं कि कैसे हमारा शासक वर्ग राष्ट्रीय प्रतीकों और एक कल्पित राष्ट्र के सिद्धांत के बल पर देश के वंचित तबकों को बेवकूफ बनाकर रखे हुए है।
फंड्री सच्चे अर्थों में एक नव-यथार्थवादी फिल्म है जहाँ एक दलित फिल्मकार नागराज मंजुले ने बिना भव्य-नकली सेटों की मदद के असली लोकेशन पर फिल्म शूट की है। फिल्म में जब्या के बाप का किरदार कर रहे किशोर कदम को छोड़कर लगभग सभी किरदार नए हैं। सोमनाथ कोई मंजा हुआ अभिनेता नहीं है बल्कि महाराष्ट्र के एक गांव का दलित लड़का है जो अभी कक्षा 9 में पढ़़़ रहा है वहीं उसके दोस्त पिरया का किरदार कर रहा सूरज पवार सातवीं कक्षा का छात्र है। फिल्म मराठी में है लेकिन कई जगह दलित कैकाडी समुदाय की मराठी बोली का भी प्रयोग किया है। अभी तक मराठी फिल्म निर्माण में सवर्णों का ही दबदबा रहा है. कुछ लोग व्यंग्य से कह रहे हैं कि फंड्री और इसकी भाषा ने मराठी फिल्मों की ‘शुद्धता’ को ‘अपवित्र’ कर दिया है।
फिल्म में सोमनाथ सहित दूसरे सभी किरदारों का अभिनय बहुत ही स्वाभाविक रहा है। फिल्म में जब्या और उसका दोस्त पिरया अभिनय करते नहीं बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जीते दिखते हैं। फिल्म में सोमनाथ ने डफली बजायी है और उसे वाकई डफली बजाना आता भी है। दरअसल फिल्मकार की मुलाकात सोमनाथ से भी तब ही हुई थी जब वह अपने गाँव के एक कार्यक्रम में डफली बजा रहा था। फंड्री में कैमरा और साउंड का काम भी बेहतरीन रहा है। नागराज मंजुले का कहना कि जब तक अलग-अलग समुदाय, खासकर वंचित समुदाय के लोगों को फिल्म इंडस्ट्री में जगह नहीं मिलेगी तब तक हमारा सिनेमा हमारे समाज का सही मायने में प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा। पिछले कुछ सालों में आए हिंदी के कथित प्रयोगधर्मी फिल्में फंड्री के आगे पानी भरते दिखती हैं। फंड्री सच्चे अर्थों में लोगों का सिनेमा है जिसकी हमारे समय में बहुत जरूरत है।
साभार – इस बार


