'परजीवी और अवसरवादी' नेता हैं नीतीश

नीरज

बिहार की सत्ता-राजनीति में आये तीव्र मोड़ पर काफी चर्चा हो रही है. सेकुलर लोग काफी चिंता कर रहे हैं. नीतीश कुमार की निंदा भी खूब हो रही है. मज़ाक भी उड़ाया जा रहा है. उनके राजनीतिक भविष्य की समाप्ति की घोषणाएं भी हो रही हैं. जेपी, लोहिया, कर्पूरी ठाकुर के हवाले दिए जा रहे हैं. समाजवादी, गांधीवादी, मार्क्सवादी सभी बहुत एक्टिव हैं. लेकिन नीतीश कुमार निश्चिन्त हैं. उन्होंने अपनी तरफ से कुछ भी नया नहीं किया है. वे सेकुलरों के नए मसीहा होने के पहले 16-17 साल तक भाजपा के साथ रहे. 2002 में जब गुजरात में मुसलमानों को खुले आम मारा गया तब भी वे मोदी के साथ थे. अब फिर मोदी के साथ चले गए हैं. जद यू में जो नेता नाराज़ हैं वे भी उनके साथ रहे हैं. अभी भी साफ़ तौर पर कोई स्टैंड नहीं ले रहे हैं. विचार, मूल्यों और नैतिकता की राजनीति नीतीश कुमार और उनके साथ वालों ने कभी की ही नहीं है. डॉ. प्रेम सिंह ने कई बार कहा है 'वे परजीवी और अवसरवादी' नेता हैं.

सेकुलर बुद्धिजीवियों की यह समस्या है कि उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी करने के लिए कोई न कोई नेता चाहिए जिसे वे सेकुलर कह कर विचार, मूल्यों और नैतिकता की माला पहना सकें. नीतीश कुमार को पहनाई थी अब फिर कांग्रेस और केजरीवाल को पहनाएंगे. उन्हें सत्ता में हिस्सा चाहिए इसलिए केवल सत्ता की राजनीति में कामयाब नेताओं पर दांव लगाते हैं. ये लोग खुद विचार और मूल्यों की राजनीति में विश्वास नहीं करते. वरना विचार और मूल्यों की राजनीति करने वाली सोशलिस्ट पार्टी की भी कुछ चर्चा करते. कम से कम समाजवादी और गांधीवादी लोग तो करते ही.

सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष डॉ. प्रेम सिंह दो बार पूर्वी दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं. हमने एक भी घर या दूकान ऐसा नहीं छोड़ा जहाँ अपने हाथ से परचा नहीं पहुँचाया. पूर्वी दिल्ली में शहर के सबसे ज्यादा सेकुलर लोग जैसे लेखक, कलाकार, पत्रकार, विद्वान् रहते हैं. शायद किसी ने सोचा भी नहीं कि डॉ. प्रेम सिंह को भी वोट दिया जा सकता है. मुसलमानों और सिखों ने भी नहीं सोचा. मुसलमान उस चुनाव क्षेत्र में बहुलता में हैं.

नीरज
नीरज सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
नीरज सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

डॉ. प्रेम सिंह क्या सेकुलर नहीं हैं? सोशलिस्ट पार्टी क्या विचारों की पार्टी नहीं है? हमारा अनुभव है कि इन सेक्युलर लोगों खास कर समाजवादियों का सोशलिस्ट पार्टी से गहरा विरोध है. वे चाहते ही नहीं कि सोशलिस्ट पार्टी और उसकी विरासत फिर से खडी हो. वे सत्ता की इसी राजनीति को चलने देना चाहते हैं. यह भारतीय राजनीति का सबसे चिंताजनक पहलू है.

लेखक सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.