सपा के राज में 2012 से 2015 तक सर्वाधिक 637 दंगे हुए...
मुज़फ्फरनगर दंगों की चौथी बरसी पर
मेहदी हसन ऐनी कासमी
कभी किसी से सुना था “दंगे तो दरअसल वो ‘फल’ यानी फ्रूट्स होते हैं, जिसे नफ़रत का खाद, पानी और बीज के साथ बोया जाता है.”
और इस बात की बिल्कुल सही व्याख्या आज से चार साल पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फर नगर और उसके आस-पास के गांव में हुए दंगों में हुई।
ये कहानी चार साल पहले उत्तर प्रदेश के कांधला, शामली और बाग़पत जिला के 60 हजार से भी अधिक शरणार्थियों की है, जिसे याद करके आज भी दिल लरज़ उठता है, तो लिखते हुए हाथ कांप उठते हैं।
अपने घर, जानवर, संपत्ति और सब कुछ खो देने वाले 60 हजार अप्रवासियों के चेहरे अब भी सामने आ जाते हैं।
कोई अपने बेटे को खो चुका है तो किसी की बेटी गायब है।
कोई औरत अपने पति की हत्या की कहानी सुनाते-सुनाते आँसू रोक नहीं पा रही है तो कोई बूढ़ा पिता अपने जवान बेटे को कंधा देने के कहानी बयां करते-करते रो पड़ता है।
किसी की पूरी संपत्ति लुट गई है, किसी के घर में आग लगा दी गई है तो किसी के दूध पीते बच्चे को छीन कर उसके सामने ही उसका क़त्ल कर दिया गया है।
किसी की मां घायल है तो किसी का भाई हमेशा के लिए दोनों पैर से विकलांग हो चुका है।
कितने ऐसे हैं जिन्होंने अपने जवान बेटियों को खो दिया है या उन्हें बलवाई अपहरण कर ले गए हैं।
दंगों का जिक्र होते ही अमूमन 1984 का सिख दंगा, 2002 का गोधरा दंगा, या इस जैसी बड़ी घटनाएं ही जेहन में कौंध उठतीं हैं।
यानी कुछ ही बड़े दंगे हर किसी को याद हैं।

देश में अब तक पूरे 25 हजार बार दंगे हो चुके
मगर आपको जानकर हैरानी ही नहीं चिंता भी होगी कि देश में अब तक हजार दो हजार बार नहीं बल्कि पूरे 25 हजार बार दंगे हो चुके हैं। जिनकी भेंट साढ़े दस हजार से अधिक हंसती-खेलती जिंदगियां चढ़ चुकी हैं। वहीं 30 हजार से अधिक लोग मारपीट में अपाहिज होकर आज भी तिल-तिल कर मरने को मजबूर हैं। लगभग हर राज्य उन्मादी भीड़ के खूनी खेल का गवाह बन चुका है।
देश में पिछले दो दशक मे हुए दंगों की संख्या और मरने तथा घायलों के बारे में खुलासा हुआ है यूपी के गाजीपुर निवासी शम्स तबरेज हाशमी की आरटीआई से। उन्होंने गृहमंत्रालय से दंगों व पीड़ितों के बारे में सवालात किये थे।
आरटीआई आवेदनकर्ता हाशमी को गृहमंत्रालय की उपसचिव रीना गुहा ने सभी राज्यों में हुए दंगों, मरने व घायलों की जानकारी आदि बिंदुओं पर पूछे गए सवालों का जवाब दिया है।
रिपोर्ट का मजमून निकालें तो वर्ष 1990 से लेकर 2015 के बीच देश में अब तक 25337 दंगे हुए। जिसमे कुल 10452 लोगों की हत्या हुई तो 30515 लोगों को घायल होना पड़ा। यह तो सरकारी आंकडे़ रहे और हताहत लोगों की संख्या और ज्यादा होने की आशंका है।

सपा के राज में सर्वाधिक दंगे
आरटीआई में यह भी बताया गया है कि उत्तर प्रदेश के इस सपा राज में सर्वाधिक 637 दंगे हुए हैं।
सपा के राज में 2012 से 2015 तक सर्वाधिक 637 दंगे हुए। जिसमें 162 लोगों की हत्या और डेढ़ हजार से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए।
यूपी में 2013 रहा सबसे डरावना साल रहा,

उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए वर्ष 2013 सबसे ज्यादा डरावना रहा। इस साल सपा सरकार की नाकामी से उसके नाम 247 दंगों का अनचाहा रिकार्ड चढ़ गया। कानून-व्यवस्था की नाकामी से सिर्फ एक साल में ही यूपी को छोटे-बड़े कुल 247 दंगे झेलने पड़े हैं.
इसी 2013 में मुज़फ्फर नगर का दंगा हुआ, जो भारत के इतिहास का एक बहूत ही डरावना फसाद था। 200 से ज़्यादा हत्याएं, कई हजार ज़ख्मी, एक लाख,से ज्यादा लोग बेघर,अरबों रूपये का नुक़सान, हजारों करोड़ रूपये का कारोबार ठप। ये वो लेखा जोखा है जिसे सोच कर ही बदन सिहर उठता है। लेकिन अफ़सोस की बात है, बल्कि ये हमारे लोकतंत्र पर कलंक है कि मुज़फ्फरनगर में इंसानियत का क़त्ल होने के बाद भी आज तक इस दंगे के दोषी दनदनाते फिर रहे हैं।
बिकाऊ मीडिया से लेकर उन्मादी नेताओं की मिली भगत से मुहब्बतनगर को जहन्नुम बना देने वाले मुजरिमों को केंद्रीय व राज्य सरकार बचा रही है।
कमीशन ने क्लीन चिट दे दिया तो प्रधान मंत्री ने दंगाई नेताओं को एवार्ड से नवाज़ कर उनके उन्माद पर अपनी ताईद की मुहर लगा दी।

ये वो कभी ना मिटने वाला दर्द है जिस का इहसास सिर्फ़ मुसलमानों को ही नही इंसाफ़ पसंद देश वासियों को आज भी सोने नहीं देता।
लाशों की रथ पर हुकूमत करने वाली, सपा और बी.जे.पी ने जिस तरह से मिलकर लोकतंत्र व इंसानियत का मज़ाक़ उड़ाया है, इतिहास कभी उसे माफ़ नहीं करेगा.
चार साल पहले जिस डरावने ख्वाब को देख कर मुज़फ्फर नगर की आसमा,अब्दुल हलीम, शामली की आमिना, रियाज़ और इन जैसे हजारों की नींद गायब हुयी थी, आज भी वह ख्वाब इन्हें सोने नहीं देता।
अपने बच्चों को गंवाने वाली माएँ, विधवा होने वाली औरतें, यतीम होने वाले बच्चे, जमीन जायदाद खोने वाले किसान आज भी इंसाफ की तलाश में हैं।
उन की खामोश निगाहें भारत की 125 करोड़ जनता से आज भी अपना कूसूर पूछती हैं, और उनके मुजरिम और कातिल उन्हीं के बीच दनदनाते फिर रहे हैं और हर लमहा भारतीय संस्कृति, सभ्यता और विविधिता, इंसाफ़ और लोकतंत्र सब एक साथ दम तोड़ते हैं....