सपा शासन में बर्बर मर्दवाद को खुले प्रोत्साहन तथा दबंगों को खुली छूट
सपा शासन में बर्बर मर्दवाद को खुले प्रोत्साहन तथा दबंगों को खुली छूट
बदायूं में बलात्कार और हत्या की घटना-
लखनऊ, 30 मई। स्त्री मुक्ति लीग, नौजवान भारत सभा और जागरूक नागरिक मंच की ओर से आज यहां हुई बैठक में बदायूं में दो दलित बहनों के साथ दबंगों द्वारा सामूहिक बलात्कार और हत्या करके पेड़ से लटका देने की नृशंस घटना की कठोर भर्त्सना करते हुए कहा गया कि यह घटना सपा शासन में बर्बर मर्दवाद को खुले प्रोत्साहन और कानून-व्यवस्था को दबंगों के हाथों गिरवी रख देने का नतीजा है।
बैठक में वक्ताओं ने इस घटना को देश में लगातार बढ़ते स्त्री विरोधी अपराधों की एक और घिनौनी कड़ी बताते हुए कहा कि 16 दिसंबर 2012 के बाद हुए आंदोलनों और देशव्यापी गुस्से की लहर के बावजूद ज़मीनी हालात में कोई अंतर नहीं आया है। यह घटना उत्तर प्रदेश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था की स्थिति का भी एक आइना है। जहां सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया सामूहिक बलात्कार जैसे घिनौने अपराध पर कहते हों कि "लड़कों से गलतियां हो ही जाती हैं" वहां की सरकार से यह उम्मीद करना भी बेमानी है कि वह ऐसे अपराधों पर कठोर कार्रवाई करेगी।
अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब मेरठ में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराने गई लड़की के साथ थाने में बलात्कार किया गया और लखीमपुर में पुलिस थाने में एक किशोरी के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। प्रदेश की राजधानी से लेकर गांवों तक में कोई दिन नहीं जाता जब बच्चियों और महिलाओं पर घृणित यौन हमलों की खबरें न आती हों। ऐसे अधिकांश हमलों का निशाना ग़रीब और दलित स्त्रियां बन रही हैं और दबंग तथा पैसे वाले अपराधी सरेआम घूम रहे हैं। मुज़फ़्फ़रनगर में दंगों के दौरान बड़ी संख्या में बलात्कार की शिकार स्त्रियों को न सिर्फ इंसाफ़ नहीं मिला बल्कि उनके हमलावर खुलेआम उन्हें धमकियां दे रहे हैं।
वक्ताओं ने कहा कि प्रदेश की सपा सरकार हो, या हरियाणा की कांग्रेस सरकार - दोनों के रवैये में कोई अंतर नहीं है। हरियाणा के भगाणा गांव में सामूहिक बलात्कार की शिकार चार किशोरियां अपने परिवारों के साथ स्वयं पिछले एक महीने से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी हैं लेकिन आज भी उन्हें इंसाफ़ का इंतज़ार है। वे अपने गांव लौटने की भी हिम्मत नहीं कर सकते। केंद्र की भाजपा सरकार से भी ऐसे मामलों में कारगर कार्रवाई की उम्मीद करना व्यर्थ है, जिसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया से लेकर भाजपा के नेता और साधू-संत तक बलात्कार के लिए स्त्रियों को ही दोषी ठहराते रहे हैं। ऐसे में, मौजूदा कानूनों को कठोरता से लागू कराने और सुरक्षा के बेहतर इंतज़ामों के लिए भी जनता को सड़कों पर उतरना होगा और साथ ही स्त्री-विरोधी सोच और मानसिक रुग्णता पैदा करने वाली पूंजीवादी संस्कृति तथा सामाजिक ढांचे के खिलाफ़ भी निरंतर संघर्ष करना होगा। स्त्रियों को अपनी सुरक्षा और सम्मान के लिए खुद लड़ना सीखना होगा।
बैठक में स्त्री मुक्ति लीग की गीतिका, विमला सक्करवाल, शाकंभरी, शिवा, शिप्रा, नौजवान भारत सभा के लालचंद्र, सत्येंद्र सार्थक, सृजन, आदित्य, संजय, अवनीश तथा जागरूक नागरिक मंच के सत्यम, रामबाबू, संजय श्रीवास्तव, आशीष कुमार, अमेंद्र आदि उपस्थित थे। तीनों संगठनों द्वारा स्त्री उत्पीड़न एवं स्त्री विरोधी हिंसा के विरुद्ध पोस्टर प्रदर्शनी एवं अन्य सांस्कृतिक माध्यमों से चलाये जा रहे अभियान को भी और तेज़ करने का भी निर्णय लिया गया।


