सफलता और आत्मविश्वास की चाबी है-सामंजस्य व समय प्रबंधन
सफलता और आत्मविश्वास की चाबी है-सामंजस्य व समय प्रबंधन
क्या कम महत्वाकांक्षी लोग उन लोगों से ज्यादा अच्छे होते हैं, जो कि बेहद महत्वाकांक्षी व प्रतिद्वंदी होते हैं? जो छात्र साधारण रहते हैं और ठीक-ठाक अंकों से पास होते हैं, ठीक-ठाक डिग्री हासिल कर अच्छी नौकरी में खुद को श्रेष्ठ कर सही जीवन जीते हैं. क्या वे अब्वल आने वाले छात्रों से बेहतर होते हैं?
यहां सवाल उठता है कि कौन अपने जीवन में कितना सुखी व संतुष्ट है। यहां पर भी महत्वाकांक्षी लोग परिवार व बच्चों के लिए ऊंचे परिणाम तय करते हैं व कम महत्वाकांक्षी लोग कम परिणाम तय करते हैं, जिससे उनकी आकांक्षाए भी कम होती है अतः वे निराशा के शिकार भी कम ही होते हैं. लेकिन आइए देखते हैं कि अपने जीवन में कौन कितना खुश होता है.
मनीष शर्मा (बदला नाम) अपने एक ऐसे सहपाठी का वर्णन करते हैं जो कि जनरल मैनेजर से नीचे की पोस्ट पर जाना ही नहीं चाहता था. उसकी चाहत ही थी जरनल मैनेजर बनना. आज मनीष खुद को उससे बेकार मानते हुए कहते हैं कि आज छोटी-मोटी नौकरी करते हुए न मेरे पास अपने लिए समय है, न अपने परिवार के लिए और न ही अपने बच्चों के लिए. मेरा अपनी पत्नी के साथ केवल एक साप्ताहिक रिश्ता बनकर रह गया है, क्यों कि मेरा सारा समय मेरे बॉस लोग ले लेते हैं. इस लिए मुझे लगता है कि मेरा दोस्त बहुत स्मार्ट था. उसने एक ऐसा करियर चुना जो कि न सिर्फ बेहतर था, बल्कि अब उसके पास बाकी चीजों के लिए बेहद समय है.
मनीष के मुताबिक मेरे जीवन की गति इतनी तेज हो गई है कि इस साल के आठ महीने कैसे बीत गए, मुझे पता भी नहीं चला. मैं दिन रात इतना व्यस्त रहता हूं कि मेरे पास अपने दोस्तों के लिए भी बिल्कुल वक्त नहीं है. मेरी उम्र बढ़ती जा रही है और मैं यह भी अच्छी तरह से जानता हूं कि मैं जल्द ही बूढ़ा हो जाएगा और तब मेरा कोई अच्छा गहरा दोस्त भी मेरे साथ नहीं होगा. हालांकि मैं बहुत से लोगों को जानता हूं वो भी फेसबुक के जरिए.
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फेसबुक वह माध्यम है जिससे बहुत से लोग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. यह डिजिटल विश्व की ओर हम इतने आकर्षित इस लिए है क्यों कि उसे खोलना व बंद करना, किसी के साथ बात करना या न करना हमारे हाथ में ही होता है.
मेहल कुमार का कहना है कि, ‘धीरे-धीरे अपने व्यस्त काम व प्रोजेक्ट के बीच खुद को बहुत अकेला महसूस करने लगा हूं. यहां तक कि अब तो मेरे पास अपने परिवार के लिए समय नहीं है. मैं सब कुछ मिस करता हूं, अपनी सोच, अपने विचार, अपने दोस्त आदि सब. लगता है कि सब कुछ छूट रहा है और वक्त हाथ से फिसलता जा रहा है. इसके अलावा मै फेसबुक जैसी साइटों पर भी किसी के साथ नहीं जुड़ पाता हूं.
अब यहां सवाल उठता है कि अगर इसी तरह सब कुछ चलना है तो हम उन जानवरों से अलग कैसे हो सकते हैं जो कि सिर्फ खाते हैं, सोते हैं और जीते हैं. हमारे और उन जानवरों में क्या अंतर रह जाता है. कुछ करने की चाहत ही हमें जानवरों से अलग बनाती है. अगर जीवन में कोई चाहत न हो तो जीवन का आश्रम ही खत्म हो जाता है. चाहत से ही हमें एक के बाद एक सपने पूरे करने की प्रेरणा और ताकत मिलती है. हमारा लक्ष्य चाहे कितना भी बढ़ा क्यों न हो? उसे पूरा करने व पाने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए. अगर कोई मामूली सा बढ़ई प्रधानमंत्री बनने का ख्याब देखेगा तो वो अपना छोटा व्यवसाय अवश्य ही शुरू कर पाएगा. लेकिन अगर उसका कोई तथ्य या ख्याब ही नही होगा. तो वह बढ़ई की तरह मर जाएगा और अपने बच्चों के लिए कुछ अच्छा नहीं कर पाएगा. इस लिए हर इंसान को सपने देख कर उन्हें पूरा करने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए ताकि वह अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे सके.
दरअसल, ख्याब सा सपने देखने में कोई हर्ज नहीं है. गलत है तो उस सपने को अपना पागलपन या जुनून बना लेना. इसी तरह किसी प्रकार की चाहत रखने में कोई बुराई नहीं है. बुराई सिर्फ इस बात में है कि उस चाहत को अपने जीवन से बड़ा नहीं बना लेना चाहिए. चाहत और एक खुशहाल जीवन एक दूसरे के प्रतिद्वंदी नहीं होने चाहिए, बल्कि एक साथ चलने चाहिए हमें यह समझ आना चाहिए कि कौन सी चाहत पात्र संभव है और कौन सी असंभव? हमें कभी भी अपने चाहतों और ख्वाबों को अपनी खुशहाल जीवन पर हावी नहीं होने देना चाहिए. जीवन में ऐसे कई मोड़ आते हैं जब अपने काम की तरफ जी जान से पूरी मेहनत लगा देनी चाहिए. साथ ही कई बार ऐसा समय भी आता है जब पूरे आत्मविश्वास के साथ उतना ही महत्व अपनी व्यक्तिगत जीवन व उसकी सफलतापूर्वक करने की सबसे बड़ी चाबी है. सामंजस्य व समय प्रबंधन की ओर देखना चाहिए. ये सब सफलतापूर्वक करने की सबसे बड़ी चाबी है. सामंजस्य व समय प्रबंधन. लेकिन यही कला शायद सबके पास नहीं होती है.
जो लोग बहुत महत्वाकांक्षी होते हैं उनके जीवन में कभी-कभी ऐसा समय आता है कि जब उन्हीं का जीवन उन पर बोझ बन जाता है और वह उसे झेल नहीं पाते हैं. कई बार ऐसा परीक्षा का समय आता है कि जब हम बुरी तरह से तनाव व चिंताग्रस्त हो जाते हैं सब कुछ विपरीत होने लगता है. कई बार इतना सामंजस्य पैदा हो जाता है कि यह निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है कि मेहनत करते रहें और एक दिन राजा की तरह जिएं या फिर प्रयास करना छोड़ दें और जीवन भर कीड़े मकोड़ों की तरह रेंगते रहें.
ब्रिटिश फिलॉसफर जॉन स्चुअर्ट मिल के अनुसार, ‘अगर आप असंतुष्ट भी हैं तो भी आप जीवन में खुश रह सकते हैं. लेकिन अगर आपको खुशी, आनंद में सामंजस्य करना आता है. वैसे भी कौन ऐसा इंसान होगा जो कि एक सुअर की तरह खुश रहना चाहेगा जिसके जीवन में न कोई चाहत हो, न कोई शिकायत हो और न ही कोई सवाल.
(सक्सेस गुरु ए के मिश्रा लेखक, चाणक्य आईएएस एकेडमी के निदेशक हैं. सम्प्रेषण)
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