सब शामिल हैं बंधुआ शोषण में
सब शामिल हैं बंधुआ शोषण में
बिहार-झारखंड-छत्तीसगढ़ की लेबर दयनीय हालत में
शालिनी द्विवेदी
कानपुर। देश की अर्थव्यवस्था में चाहे कितना उछाल आया है, शैक्षिक दर बढ़ी है, पर बंधुआ मजदूर की किस्मत का ताला अभी नहीं खुल सका है। पेट पालने के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन करना आज भी उनकी नियति बना हुआ है। ठेकेदार और नियोक्ता दोनों उनका शोषण कर रहे हैं और उनके श्रम की कीमत पर डाका डाला जा रहा है।
बंधुआ मजदूर के पास खेती योग्य जमीन नहीं है। रोजी रोजगार के कोई साधन सरकार की तरफ से नहीं मिले हैं। ईंट भट्टों पर आसानी से काम मिल जाता है.और भट्टा मालिकों और ठेकेदारों द्वारा इनका जमकर शोषण किया जा रहा है। बिहार व झारखण्ड के लोकल ठेकेदार बड़ी संख्या में मजदूरों को यूपी में ला रहे हैं। ये ठेकेदार उन्हें भट्टा मालिकों को देते है। इनको पैसा भी सीधे मालिको से न मिलकर ठेकेदारों द्वारा ही दिया जाता है। पहले से मजदूरी निश्चित नहीं की जाती है। जब भट्टों का काम बंद होता है, उस समय मालिक जो चाहे उस रेट के हिसाब से मजदूरी देता है। श्रम मूल्य भी ठेकेदार को दिया जाता है और फिर ठेकेदार मनमर्जी से मजदूरों को पैसा देता है।
बिहार, झारखण्ड व छत्तीसगढ़ राज्यों में तो ये स्थिति है कि इनको गाँव के अन्दर भी नहीं रहने दिया जाता।.गाँव के बाहर घास फूस की झोपड़ी बना कर ये लोग गुजारा करते हैं। इनके बच्चों के साथ वहां आज भी छुआछूत का वर्ताव है। इनके बच्चों को स्कूल में सभी आम बच्चों के साथ पढ़ने को नहीं बैठाया जाता हैं। मजदूरी इतनी कम है कि इसमें गुजारा करना नामुमकिन है। बिहार आदि राज्यों मे एक दिन की मजदूरी २०-२५ रु. और दो से तीन किलो चावल है। यूपी में कच्ची ईंट ढुलाई का १००० प्रति ईंट पर ९०-११० रु. मिलता है, जबकि पूरे परिवार के साथ खच्चर या घोड़ा जो भी इनके पास हो, उसकी मजदूरी भी शामिल होती है।
छत्तीसगढ़ राज्य के मजदूर ज्यादातर निकासी के काम के लिए जाने जाते हैं। इनका काम तो और भी कठिन है। वे गर्म ईंट को हाथ से निकाल कर चट्टे तक पहुचाते हैं। इनको मिलते हैं प्रति ४००० ईंट के २०० से २५० रु.। मास्क उपलब्ध नहीं कराये जाने से जले कोयले की राख सांस द्वारा इनके शरीर के अन्दर जाती है और उससे ये दमा अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।


