प्रीतपाल कौर
सबरीमाला मंदिर का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केरल सरकार से सवाल किया कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं क्यूँ नहीं जाने दिया जाता। सर्वोच्च अदालत के अनुसार ऐसा भेद-भाव मान्य नहीं है क्योंकि यह भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का उलंघन करता है।
पारंपरिक तौर पर सबरीमाला मंदिर में उन युवा महिलाओं को अन्दर नहीं जाने दिया जाता जो कि नियमित रूप से रजस्वला होती हैं। यानि वे महिलाएं जो युवावस्था में प्रवेश कर चुकी हैं। केवल छोटी बच्चियां और बूढ़ी महिलाएं जो मासिक धर्म से मुक्ति की उम्र में आ चुकी हों, वे ही मंदिर में जाने के योग्य समझी जाती हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा इसलिए है क्यूंकि महिलाएं मासिक धर्म के वक़्त अशुद्ध समझी जाती हैं। जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार ऐसा नियम इसलिए है क्यूंकि अय्याप्पा जिनके सम्मान में यह मंदिर बनाया गया है, एक ब्रह्मचारी योगी थे।
2015 में त्रवंकोरे देवासम बोर्ड, जो कि सबरीमाला मंदिर की देख रेख करता है, के अध्यक्ष गोपालकृष्णन ने एक बयान में कहा कि महिलाओं को तब तक मंदिर में नहीं जाने दिया जाये जब तक कि ऐसी कोई मशीन नहीं बन जाए जो यह पता लगा सके कि कोई महिला मासिक धर्म से है कि नहीं।
इस पर देश भर में महिलाओं ने बेहद आपत्ति जताई और सोशल मीडिया पर एक जंग छिड़ गयी।
अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के इस सवाल ने इस मुद्दे को गरमा दिया है।
देखा जाये तो आज इक्कसवीं सदी में जब हम समानता की बातें करते हैं। हम महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर देने की बात करते हैं। हम कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक जुट हो कर उठ खड़े होने की बात करते हैं। हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ महिला का मासिक धर्म से होना उसे अपवित्र बना देता है।
क्या हमारा समाज इस बात से अनजान है कि मासिक धर्म होना इस बात का संकेत है कि महिला गर्भ धारण करने के योग्य है। यानी जो बात गर्व की है किसी भी महिला या समाज के लिए उसी की वजह से ही उसे अपवित्र माना जाता है। तो फिर क्या कोई समाज ऐसा भी है जिसमें उन महिलाओं का सामान होता हो जो रजस्वला नहीं होतीं? क्या कोई ऐसा धर्म भी है जिसमें बच्चों का पैदा होना ग़लत समझा जाता हो?

हमारे इसी समाज में जो रजस्वला महिलाओं को अपवित्र मानता है, ऐसी महिलाओं को बाँझ कहा जाता है जो रजस्वला नहीं होतीं। और कुछ पिछड़े इलाकों में तो उन्हें डायन करार दे कर मार तक दिए जाने की घटनाएँ भी सुनने में आती हैं।
महिलाओं के साथ जुड़ी इस तरह की कई भ्रांतियां और पाबंदियां हमारे समाज में आम हैं। कुछ घरों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को रसोई में जाने पर पाबंदी लगा दी जाती है। यहाँ तक कि उन्हें नहाने की भी मनाही होती है।
बात हालाँकि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर उठी है और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर केरल सरकार से जवाब तलब भी किया है, लेकिन हमारे देश में हजारों ऐसी छोटी-बड़ी दरगाहें मौजूद हैं, जहाँ महिलाओं को अन्दर जाने की इजाज़त नहीं है। वे सिर्फ बाहर से अन्दर झाँक सकती हैं। कहीं-कहीं तो इस पर भी पूरी पाबंदी है। बहुत सी मस्जिदों में महिलाओं के जाने पर पाबंदी है।
आज जब हम इक्कसवीं सदी के दूसरे शतक को भी आधा पार कर चुके हैं, औरतों ने लगभग हर क्षेत्र में खुद को पुरुष के बराबर साबित कर दिया है। हमारे वैज्ञानिक जिनमें कई महिलाएं हैं मंगल तक अपनी पहुँच बना चुके हैं। यहाँ हमारा समाज उन्हीं घिसी पिटी परम्परों को सीने से लगाये बैठा रहेगा तो समाज में विघटन की आशंकाएं ज़यादा होंगी, समानता की संभावनाएं कम।