समझदारों की समझदारी
समझदारों की समझदारी
अपने देश में समझदार लोगों की कमी नहीं है । सबसे बड़े समझदार तो विज्ञापन फिल्मों के लेखक या निर्देशक होते हैं । जैसे हम कंप्यूटरचियों से बड़े होते हैं कार्टूनिस्ट – बस कुछ लाइने खिंची , एक वाक्य लिख दिया । काम पूरा । हम हैं कि शब्दों की जलेबी ही नहीं इमरती बना रहे हैं । और बात है कि बनती नहीं । लगता है हम कंप्यूटरची लोग कोई न कोई आयोग हो गए हैं । बड़ी मेहनत से महीनों से सालों काम करते हैं । चार-पांच सौ पृष्ठों की रिपोर्ट बना कर शीला की जवानी हो जाते हैं कि तेरे हाथ नहीं कुछ आनी । तेलांगना मसले पर श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट भी कुछ कुछ वैसी ही है कि क्या से क्या हो गया तेरी समझ में समझदार कि पूरी रिपोर्ट ही हो कर रह गई समझदारों की समझदारी ।
हम सब जानते हैं कि हमारा संविधान ही नहीं आजादी के बाद के राजपाटी समझदारों के पास सब कुछ था , पर आजादी पाने के गुमान में सपना देखने वाली नजर नहीं थी । अब जहां जाओ , वही किस्सा पाओ कि रुला के गया सपना मेरा – रोते हैं हम अब क्योंकि जब सुलझ सकता था तो नहीं सुलझाया सपना तेरा । हम इसी में गदगद कि हैदराबाद को इंडिया में मिला लिया । हैदराबाद में मदरास प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्सों को मिला दिया । वह भी रो धो कर । समझा कि भाषा एक है तो भूमि की कसक कम हो जाएगी । रो गा कर भाषाई राज्य बना दिया । कहीं की इंट , कहीं का पत्थर मिला कर एक नाम दे दिया कि तरे सपने तेरी भाषा के साथ खत्म । यह थी समझदारों की समझदारी जो नहीं समझ पाए कि भूमि की भावना भाषा बढ़ाती है ।
पहले भी भाषा एक बोले तो अ को आ बना दिया यानी कर को कॉर सेवा बना दिया । एक था पंजाब , समझदारों ने हरयाणा , हिमाचल तो बनाया ही साझे का शहर चंडीगढ़ में यूनियन टेरीटरी बना दिया । जब बना रहे थे आंध्र प्रदेश तभी बन जाता तेलांगाना तो समझदारों की समझदारी में हैदराबाद यूनियन टेरीटरी की शक्ल में नहीं आता । हैदराबाद को हमारे आजादी के बाद के समझदारों ने जीत की पहचान बना कर छोड़ दिया था । जो जीता वही सिकंदर , इसीलिए हैदराबाद का एक हिस्सा सिकंदराबाद भी बना दिया गया । आज के समझदारों को यह न सूझा कि एक की राजधानी हैदराबाद तो दूसरे की सिकंदराबाद हो सकती है । जैसे पंजाब ने अपना चंडीगढ़ मोहाली बना लिया और हरयाणा ने पंचकुला – ऐसा भी हो सकता था । पर समझदारों की समझदारी ।
उलझाना हमारे इंडिया का खास अंदाज है । भारत तो अपनी भूमि के लिए मरता है । उसकी उम्मीद में जीता है । इंडिया तो बना ही उलझाने के लिए , लड़ाने के लिए । जिसके जन्म में ही उलझाना और लड़ाना हो , उससे कैसे करे कोई उम्मीद की भारत की बात समझेगा । फिर तेलांगाना तो भारत भी नहीं हिंदुस्तान है । जैसे भारत में तरह तरह के इंडिया हैं , मसलन साउथ इंडिया और नॉर्थईस्ट इंडिया में हो कर भी इंडिया नहीं होता । समझदारों की समझदारी को कौन समझाए कि भूमि की भावना भाषा से नहीं भाव से समझी जाती है ।


