समझो आडवाणी जी.. भाजपा में सम्मान से बुढ़ापा केवल वाजपेयी का गुजरा वरना...
समझो आडवाणी जी.. भाजपा में सम्मान से बुढ़ापा केवल वाजपेयी का गुजरा वरना...
भाजपा के महाकवि कलिदास
संजीव पांडेय
एलके आडवाणी भारतीय जनता पार्टी के महाकवि कालिदास साबित हुये हैं। कम से कम पहले गोवा कार्यकारणी की बैठक में नरेन्द्र मोदी को प्रचार समिति के कमान दिये जाने के कारण पहले इस्तीफा देना, 24 घण्टे में दोबारा इस्तीफा वापस लेने का एपिसोड तो उन्हें गुप्त कालीन महाकवि कालिदास ही बनाता है। अगर उन्हें आज इस्तीफा वापस ही लेना था तो कल इस्तीफा देने की जरूरत क्या थी? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने उन्हें आखिर क्या घुट्टी पिलायी की वे आज वे इस्तीफा वापस लेने को तैयार हो गये ? क्या आडवाणी को वाकई में यह महसूस हो गया था कि उन्हें भाजपा में अब बलराज मधोक बनाया जायेगा ? अभी तक जो बातें सामने आयी हैं उससे स्पष्ट हो गया कि गोवा कार्यकारणी में जो फैसला हुआ उससे पीछे हटने को संघ और भाजपा तैयार नहीं है। न ही भविष्य में आडवाणी को कुछ दिया जायेगा, उसके भी कुछ संकेत मिले हैं। आखिर आडवाणी ने किसके सलाह पर ये पत्र लिखा ? क्योंकि पत्र लिखने के बाद आडवाणी मजाक के पात्र बन गये थे। एक सवाल उठने लगा था कि आखिर अपने खास चेले नरेन्द्र मोदी से उनका आज विरोध क्यों है? क्योंकि इसी नरेन्द्र मोदी को उन्होंने कभी बचाया था। लेकिन आज मोदी को कैम्पेन कमेटी के चेयरमैन पद दिये जाने से भी नाराज हो गये। कहीं न कहीं इस पूरे घटनाक्रम के बाद एलके आडवाणी का कद बुरी तरह से गिर गया है।
आडवाणी ने गलत समय पर गलत चाल चली। वैसे कभी कभी वरिष्ठ खिलाड़ी को यह महसूस होता है कि उसकी हर चाल कामयाब होगी। जब आडवाणी ने मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्यूलर बताया था तो पार्टी ने उनसे इस्तीफा लिया था। लेकिन बात इस्तीफे तक रह गयी थी। बाद में फिर 2009 में परिस्थितियाँ कुछ इस तरह की थीं कि उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार भाजपा ने घोषित कर दिया। लेकिन वो भाजपा को सत्ता पर काबिज नहीं करवा सके। उन्होंने संघ परिवार पर चोट करना शुरू किया। काफी कुछ उनकी चोट डालने का अंदाज अटल बिहारी वाजपेयी जैसा था। किसी समय में अटल बिहारी वाजपेयी ने संघ परिवार का प्रभाव पार्टी पर कम किया था। खासकर उस समय जब देश में राजग की सरकार थी। लेकिन आडवाणी यह भूल गये कि वो अटल बिहारी वाजपेयी नहीं है। आडवाणी ने संघ को हाल ही में सीधी चुनौती तब दी जब संघ के प्रिय नितिन गडकरी को उन्होंने दोबारा अध्यक्ष चुने जाने से रोक दिया। नितिन गडकरी के पक्ष में फैसला हो चुका था। नितिन गडकरी के लिये पार्टी में संविधान संशोधन किया गया था। लेकिन ताजपोशी के कुछ घण्टों पहले आडवाणी ने कुछ इस तरह की चाल चली कि संघ परिवार चित्त हो गया। संघ परिवार मौके पर दबाव में आया और गडकरी की जगह राजनाथ अध्यक्ष बन गये। लेकिन संघ परिवार आडवाणी की इस चोट को नहीं भूला था। आडवाणी को इस बार भी गलतफहमी थी कि वो संघ पर दबाव बनाकर पिछली बार की तरह सारा कुछ अपने पक्ष में कर लेंगे। लेकिन इस बार संघ का पत्ता नितिन गडकरी की तरह कमजोर नहीं था। संघ का पत्ता नरेन्द्र मोदी था जो साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति को कहीं भी किसी पर इस्तेमाल कर सकता है। आडवाणी को उनकी हैसियत बता दी गयी। आडवाणी ने इस्तीफा तो दे दिया। लेकिन शालीनता से उन्हें बता दिया गया कि गोवा का फैसला नहीं बदला जायेगा। अगर बलराज मधोक की तरह ज़िन्दगी जीना चाहते हैं तो इस्तीफा दे दीजिये। आडवाणी भी परिस्थिति को समझ गये।
नरेन्द्र मोदी को पिछले कई महीनों से पता था कि उन्हें चुनौती आडवाणी से मिलेगी। इसलिये आडवाणी के खास लोगों को उन्होंने साम, दाम, दण्ड, भेद से तो़ड़ना शुरू कर दिया। आडवाणी कैम्प के अरूण जेतली मोदी के कैम्प में चले गये। इसी तरह से कई और नेता अन्दर खाते मोदी के सम्पर्क में हो गये थे। आडवाणी के पास बची हुयी फौज में सिर्फ सुषमा स्वराज और अनंत कुमार हैं। पार्टी का साफ संदेश सुषमा स्वराज के लिये भी है। सु्षमा को भी अपनी जमीनी हकीकत पता है। लोकसभा चुनाव जीतने के लिये उन्हें अपने गृह शहर अंबाला कैंट से मध्य प्रदेश के विदिशा तक जाना पड़ता है। अनंत कुमार को भी अपनी हैसियत पता है। 2 जी केस में नीरा राडिया से संबंध उजागर होने के बाद संघ परिवार के पास उनकी भी कमजोर कड़ी है। उनकी भी बलि किसी समय ली जा सकती है। बचे वेंकैया नायडू। अन्दर खाते मोदी से भी सम्पर्क में है। क्योंकि जिस राज्य से आते हैं वहाँ उन्हें जनता नहीं जानती है। मजबूरी में दक्षिण के दूसरे राज्य में प्रवासी के तौर पर रहते हैं और राज्यसभा संघ परिवार की दया से पाकर दिल्ली में मजे लेते हैं। आखिर संघ से विरोध लेकर ये बेचारे आडवाणी कैम्प के सिपाही कितनी देर लड़ाई लड़ेंगे ?
आडवाणी देश के पुराने नेताओं की पीढ़ी में से हैं। लेकिन कल के फैसले ने उन्हें अनुभवहीन साबित किया। आडवाणी को भारतीय राजनीति में सक्रिय कई दूसरे दलों के नेताओं से भी सीख लेनी चाहिये थी। देश के वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इसके उदाहरण हैं। प्रणव मुखर्जी ने काँग्रेस में रहते हुये आडवाणी से कम जलालत नहीं झेली। इंदिरा गांधी के कैबिनेट में 1980 के दशक में वो वित्त मन्त्री थे। मनमोहन सिंह उनके अधीन ही काम करने वाले अधिकारी थे। लेकिन 2004 में परिस्थितियाँ बदल गयीं। उनका ही मातहत देश का प्रधानमन्त्री बन गया। मनमोहन सिंह के मन्त्रिमण्डल में प्रणव मुखर्जी को आठ साल तक काम करना पड़ा। अलग-अलग मन्त्रालय में। प्रणव मुखर्जी इस जलालत के बावजूद जनता में एक कामयाब संदेश देने में कामयाब हो गये। उन्होंने समय की परिस्थिति पहचानते हुये नेहरू गांधी परिवार के खिलाफ बगावत नहीं की। पीएम पद के दावेदार तो वो भी थे। लेकिन उन्होंने यूपीए-1 और 2 के कार्यकाल के दौरान काँग्रेस के लिये संकट मोचक की भूमिका निभायी जिसे पूरा देश जानता है। इसे एक अनुभव की राजनीति कहते हैं, जिसमें मौके के हिसाब से अपने कद को बरकरार रखते हुये काम करना होता है। प्रणव मुखर्जी ने वही किया। मनमोहन सिंह पर भी उनका कामकाज हावी रहा। आज एक बार फिर किस्मत बदली। वो पाँच साल के प्रणव बाबू राष्ट्रपति भवन पहुँच गये। किस्मत की बात होती है। सोनिया गाँधी तो हामिद अंसारी को राष्ट्रपति पर देखना चाहती थीं। लेकिन राजनीतिक परिस्थिति इस तरह बदली की मुखर्जी की किस्मत चमक गयी। वो राष्ट्रपति बन गये। एलके आडवाणी को कम से कम प्रणव मुखर्जी से सीख लेनी चाहिए थी।
एलके आडवाणी को यह मालूम होना चाहिए कि भाजपा में बुढ़ापे या जवानी में विद्रोह के बाद सम्मान नहीं, पार्टी निकाला मिलता है। बुढ़ापे का सम्मानजक एग्जिट केवल अटल बिहारी वाजपेयी को मिला। हालाँकि उनके राह में रोड़ा डालने में आडवाणी ने कोई कसर नही छोड़ी। कई लोग पहले विद्रोह कर बैठे लेकिन उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया। बलराज मधोक से लेकर केएन गोविंदाचार्य इसके उदाहरण हैं। आज गोविंदाचार्य की हालत यह है कि पार्टी में उन्हें लाने की तमाम कोशिशें नाकाम हो गयी। कल्याण सिंह एक और उदाहरण हैं। पार्टी से बगावत की थी हाशिए पर आ गये। अब दोबारा पार्टी में वापस आ गये हैं। अगर अपने इस्तीफे को वापस नहीं लेते तो एलके आडवाणी का वही हाल होता जो मधोक, गोविंदाचार्य और कल्याण सिंह का हुआ था।
आडवाणी वैसे भी अब जनता की पसन्द नहीं हैं। आडवाणी ने कई यात्राएं पिछले दस सालों में निकालीं। लेकिन उनकी यात्राओं में सैकड़ों की संख्या जुटाने के लिये भारी मशक्कत करनी पड़ती थी। उनकी सारी यात्राएं फ्लाप साबित हो गयीं। लेकिन वे 1990 की रथयात्रा के सपने से अभी तक नहीं निकले हैं। 2009 तक आते-आते यूपीए सरकार का बुरा हाल हो गया था। लेकिन आडवाणी 2009 में यूपीए को हरा पाने में सफल नहीं रहे। यूपीए की सीटें पहले से बढ़ गयी। यूपीए 200 सीटें क्रॉस कर गयी। जबकि भाजपा की सीटें पहले से घट गयी। आखिर आडवाणी इतने लोकप्रिय थे तो 2009 में पीएम पद पर जनता उन्हें बिठा देती। लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। लेकिन आडवाणी के सलाहकार अभी भी उन्हें पीएम पद का सपना दिखाते रहते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि जलालत के बाद भी इस्तीफा वापस लेना पड़ा।
वैसे जो कुछ एलके आडवाणी के एपीसोड में सामने आया वो भारतीय राजनीतिक संस्कृति का एक एपीसोड ही है। इस तरह की घटनाएं हर राजनीतिक दल में घटती हैं। कांग्रेस में इंदिरा गांधी के जमाने में भी ये घटनाएं घटीं। महात्मा गांधी के समय में सुभाष बाबू को इसी तरह से कांग्रेस छो़ड़ना पडा। इन्दिरा गाँधी तो गजब की तानाशाह थीं। पार्टी के कई नेता बाहर का रास्ता उनके सामने पकड़ चुके थे। सोनिया गाँधी के जमाने में भी कई घटनाएं इस तरह की घटीं। सीताराम केसरी के साथ किया गया अपमान सबके सामने है। पूर्व प्रधानमन्त्री पीवी नरसिम्हा राव की मौत के बाद उनके शरीर को काँग्रेस मुख्यालय नहीं लाने दिया गया। जबकि शरद पवार, तारिक अनवर और पीएस संगमा को भी सोनिया विरोध के कारण पार्टी छोड़नी पड़ी। एक बार राजीव गांधी के समय में प्रणव मुखर्जी ने भी विद्रोह किया था। गुंडू राव के साथ मिलकर अलग पार्टी बनायी थी। लेकिन कुछ दिन बाद ही पार्टी में आ गये थे। दरअसल भाजपा में जो कुछ हो रहा है वो भारतीय राजनीतिक संस्कृति ही है। संघ परिवार और भाजपा को देश के राजनीतिक परिवेश से अलग कैसे देख सकते हैं।


