जगजीत शर्मा
देश के हालात दिनोंदिन खराब होते जा रहे हैं। पंजाब पवित्र धर्म ग्रंथ की बेअदबी की आग में झुलस रहा है। हरियाणा में जातीय झगड़ों ने जड़ें जमा ली हैं। दलित और सवर्ण आमने-सामने आकर मोर्चा खोले हुए हैं। उत्तर प्रदेश धधक रहा है। मध्य प्रदेश के खरगोन में कर्फ्यू लगा हुआ है। राजस्थान के सलासर में आग लगाकर निजी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। वहां भी दुकानें बंद हैं। गुजरात आरक्षण की आग में झुलस रहा है। अभी कुछ ही दिन पहले झारखंड में दंगे हुए थे। पश्चिम बंगाल में भी अराजक तत्वों में प्रतिमाओं को तोड़कर माहौल को अशांत करने की कोशिश की है। जम्मू-कश्मीर में आए दिन नमाज के बाद पाकिस्तानी और आईएसआईएस के झंडे फहराये जा रहे हैं। कहीं भी शांति नहीं है।
देश में जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्र को लेकर होने वाले झगड़े दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। अभी दादरी के गांव बिसाहड़ा में हुई घटना की स्याही सूखने भी नहीं पाई थी कि फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में राजपूतों ने एक दलित परिवार के दो बच्चों को सोते समय जिंदा जला दिया। इस घटना में दो बच्चों वैभव और दिव्या की मौत हो गई है, जबकि इन बच्चों की मां रेखा और पिता जितेंद्र बुरी तरह जल गए हैं। हालांकि पुलिस इसे जातीय विद्वेष मानने से इंकार करते हुए पुरानी रंजिश बता रही है, लेकिन जिस तरह केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर को दोबारा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने की चेतावनी दी है, उससे ही मामले की गंभीरता समझी जा सकती है।
देश भर में पिछले कुछ दशकों से जातीय, धार्मिक या सांप्रदायिक घटनाओं में जिस तरह से लगातार वृद्धि होती जा रही है, वह चिंतनीय है। लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के आधार पर अगर बात की जाए, तो वर्ष 2010 से 2014 के बीच ऐसी घटनाओं के मामले में उत्तर प्रदेश का स्थान देश के पांच शीर्ष राज्यों में पहला है। पिछले पांच वर्षों में लगभग बीस करोड़ की आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 703 धार्मिक संघर्ष या जातीय विद्वेष की घटनाएं दर्ज की गईं और इन घटनाओं में 176 से अधिक लोगों की मौत हुई और 2007 लोग घायल हुए हैं। ऐसे मामलों में यह आंकड़ा देश में सबसे अधिक है। वर्ष 2015 की ही बात करें, तो पहले के छह महीनों में ऐसी 68 घटनाएं दर्ज की गई हैं। आबादी की दृष्टि में सांप्रदायिक हिंसा के मामले में कर्नाटक का स्थान दूसरा है। वर्ष 2013 में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक सांप्रदायिक संघर्ष के मामले दर्ज की गई है।
आंकड़ों पर नजर डालें, तो हाल के वर्षों में मुजफ्फरनगर में हुए धार्मिक संघर्ष सहित उत्तर प्रदेश में 247 घटनाएं दर्ज की गई हैं। मुजफ्फनगर में हुए दंगों में कम से कम 59 लोगों की जान चली गई थी एवं 50,000 लोग बेघर हुए हैं। पिछले पांच सालों में सांप्रदायिक हिंसा के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान महाराष्ट्र का है। वर्ष 2010 से 2014 के बीच महाराष्ट्र में कुल 484 धार्मिक संघर्ष की रिपोर्ट दर्ज की गई है। घटनाओं में होने वाली मौत एवं घायलों की संख्या में भी महाराष्ट्र का स्थान दूसरे स्थान पर है। आंकड़ों पर नजर डालें, तो महाराष्ट्र में धार्मिक संघर्ष के कारण मरने वालों की संख्या 70 एवं घायलों की संख्या 1,462 दर्ज की गई है। पूरे देश में पिछले पांच सालों में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं पर नजर डालें, तो हालात निराशाजनक दिखाई देते हैं।
वर्ष 2010 में 701 घटनाएं (116 लोग मारे गए और 2138 घायल हुए), वर्ष 2011 में 580 घटनाएं (91 मारे गए और 1899 लोग घायल हुए), 1012 में 668 घटनाएं (94 लोग मारे गए और 2117 लोग घायल हुए), 2013 में 823 घटनाएं (133 लोग मारे गए और 2269 लोग घायल) और 2014 में 644 घटनाएं (95 लोग मारे गए और 1921 लोग घायल) हुईं। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2010 में हुई 121 घटनाओं में 22 लोग मारे गए थे और 426 लोग घायल हुए थे। वर्ष 2011 के दौरान हुई 84 घटनाओं में 12 लोगों की हत्या और 347 घायल हुए थे, वहीं 2012 में हुई 118 घटनाओं में 39 लोगों की हत्या और 500 लोग घायल हुए थे। इतना ही नहीं, वर्ष 2013 में हुई 247 सांप्रदायिक घटनाओं में 77 लोग मारे गए और 360 लोग घायल हुए थे। वर्ष 2014 में हुई 133 घटनाओं में मरने वालों की संख्या 26 और घायलों की संख्या 374 थी।
सांप्रदायिक हिंसा के मामले में पिछले पांच सालों में उत्तर प्रदेश अव्वल रहा है। वर्ष 2010-14 के बीच उत्तर प्रदेश में जहां 703 घटनाएं हुईं, वहीं महाराष्ट्र में इस दौरान 484, मध्य प्रदेश में 416, कर्नाटक में 356 और गुजरात में 305 घटनाएं हुईं। इस दौरान उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा में 176 लोग मारे गए, तो वहीं महाराष्ट्र में 70, मध्य प्रदेश में 68, राजस्थान में 48 और गुजरात में 34 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इन सांप्रदायिक हिंसा में घायलों की संख्या भी कम नहीं थी। पांच सालों में हुए दंगों में उत्तर प्रदेश में 2007, महाराष्ट्र में 1462, कर्नाटक में 1044, मध्य प्रदेश में 1027 और बिहार में 1004 लोग घायल हुए थे। सांप्रदायिक दंगों के मामले में पिछले साल बिहार का स्थान छठे स्थान पर था।
2014 में बिहार में 61 धार्मिक संघर्ष के मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन इस वर्ष जनवरी से जून तक मिले अनुमानित आंकड़ों के अनुसार 41 सांप्रदायिक घटनाओं एवं 169 घायलों की संख्या के साथ बिहार तीसरे स्थान पर था। 14 मौत के आंकड़ों के साथ, इस वर्ष बिहार उत्तर प्रदेश से आगे था, जबकि इसी दौरान उत्तर प्रदेश में 10 मौत दर्ज किया गया था। यह आंकड़े भारत में सांप्रदायिक हिंसा से होने वाली मौतों की संख्या के संबंध में सबसे अधिक है। पिछले पांच वर्षों में भारत में 3,400 सांप्रदायिक घटनाएं हुई हैं। इन घटनाओं में 529 लोगों की मौत एवं 10,344 लोग घायल हुए हैं।
इन घटनाओं से पता चलता है कि हालात पिछले कई वर्षों से लगातार चिंताजनक होते जा रहे हैं। यदि ऐसी घटनाओं पर रोक नहीं लगाई गई, तो वैश्विक स्तर पर भी हमें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। अभी कुछ ही दिन पहले अमेरिका के विदेश विभाग ने भारत के संबंध में एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें भारत में साप्रदायिक हिंसा में बढ़ोतरी और धर्मनिरपेक्ष लोगों के रहने लायक माहौल न होने की बात कही गई है। इस रिपोर्ट की हम अनदेखी नहीं कर सकते हैं।
एक ओर तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब विदेशी पूंजी निवेशकों को भारत में आने का निमंत्रण देते घूम रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश में अराजकता का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री की मुहिम विफल भी हो सकती है क्योंकि विदेशी पूंजीपति और उद्योगपति इस रिपोर्ट पर ध्यान जरूर देंगे।
जगजीत शर्मा, लेखक दैनिक न्यू ब्राइट स्टार में समूह संपादक हैं।