साथ आए वामपंथी और समाजवादी
नई दिल्ली। दिल्ली में शनिवार को एक नई राजनैतिक पहल हुई है जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जन आंदोलनों के साथ समाजवादी और वामपंथी धारा के कार्यकर्त्ता शामिल हुए। दिल्ली के एनडी तिवारी भवन में दिन भर चली बैठक के बाद राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा राजनैतिक मोर्चा बनाने का फैसला हुआ जिसमें सभी धर्म निरपेक्ष ताकतों को शामिल होने की अपील भी की गई। यह पहल वाम धारा के कई संगठनों के साथ भाकपा माले, समाजवादी समागम और विभिन्न जन आंदोलनों की तरफ से हुई थी। बैठक में इंकलाबी नौजवान सभा, क्रन्तिकारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, पंजाब से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, जन संस्कृति मंच, एटमी उर्जा विरोधी आंदोलन, आइसा, रिहाई मंच, खेत मजदूर सभा, सोशलिस्ट पार्टी इण्डिया, लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी, समाजवादी समागम, एआईसीसीटीयू जैसे कई जन संगठनों के साथ देश के महत्वपूर्ण चिन्तक और सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्त्ता शामिल हुए। इनमें भाकपा माले के दीपंकर भट्टाचार्य, कविता कृष्णन, रामजी राय, प्रणय कृष्ण, बिहार के खांटी समाजवादी और मजदूर नेता विद्या भूषण, राजा राम, गौतम नवलखा, मेनस्ट्रीम के संपादक सुमित चक्रवर्ती, विनायक सेन, एन डी पंचोली, विजय प्रताप, अशोक चौधरी, रोमा, सुन्दरलाल सुमन, पत्रकार अनिल चमड़िया, अंबरीश कुमार, आइसा की राधिका, गौतम मोदी, वैज्ञानिक मेहर इंजीनियर, अनिल सदगोपाल, प्रोसेनजीत बोस, राजीव यादव, मंगतराम पासला समेत देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधि शामिल थे। मुंबई से आनंद पटवर्धन ने तो असम से अखिल गोगोई ने इस पहल का समर्थन करते हुए अपनी एकजुटता दर्शाई।
बैठक में देश में समाजवादी समागम की तरफ से शामिल हुए विजय प्रताप ने कारपोरेट घरानों की बढ़ती लूट और साम्प्रदायिक ताकतों से उनके नए गठजोड़ पर चिंता जताई। साथ ही राज्य की बढती हिंसा और दमन पर प्रकाश डाला खासकर जिस तरह दलितों का उत्पीड़न तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि दोनों मुख्य राष्ट्रीय दलों के साथ ही क्षेत्रीय दलों की भूमिका भी एक ही जैसी है। जो दल हाशिए के समाज के नाम पर सत्ता में आए उनका चरित्र भी राष्ट्रीय दलों जैसा रहा और बहुत से सवालों पर इनमे एक मौन सहमति भी नजर आती है। केंद्र की नई सरकार बहुत से कानून बदल रही है जिससे मजदूर किसान के अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। ऐसे में एक प्रतिरोध के लिए बड़ा मंच बने तो बेहतर हो जिसमे समाजवादी,वामपंथी और देश के विभिन्न हिस्सों में खेती, किसानी, जल जंगल जमीन से लेकर शिक्षा स्वस्थ्य और अन्य क्षेरों में चल रहे आंदोलन शामिल हों तो इन चुनौतियों का साझा मुकाबला किया जा सकता है।
इस मौके पर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले अनिल सदगोपाल ने तालीम के नाम पर जमीन कब्ज़ा करने की बढती प्रवृति पर रौशनी डाली जिसमें सरकार कारपोरेट घरानों के साथ खड़ी नजर आ रही है। उन्होंने बताया कि देश में बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूलों को बंद कर उन्हें निजी क्षेत्र को सौंपा जा रहा है। मुंबई में यह अब बड़े पैमाने पर हो रहा है जिसके चलते स्कूल शिक्षा के साथ बच्चों के खेलने के मैदान भी ख़त्म हो जाएंगे और बड़ा संकट पैदा होगा। उन्होंने शिक्षा के मुद्दे पर फुले, गाँधी आम्बेडकर और भगत सिंह के बीच के रिश्ते को समझने पर जोर दिया ।
जॉन दयाल ने ओड़िसा में अल्पसंख्यकों खासकर ईसाई और मुस्लिम पर बढ़ रहे हमलों की जानकारी दी। जिस तरह कट्टरपंथी संगठन चर्च और ईसाईयों को निशाना बना रहे वह चिंताजनक है। यह सब केंद्र में सत्ता बदलने के बाद और तेज हुआ है।
रिहाई मंच के राजीव यादव ने उतर प्रदेश के साथ देश के अन्य हिस्सों में मुस्लिम नौजवानों को किस तरह फर्जी मामलो में फंसा कर जेल भेजा जाता है इस पर विस्तार से प्रकाश डाला।
गौतम नवलखा ने प्राकृतिक संसाधनों की लूट के साथ इसका विरोध करने वालों को किस तरह नए नए कानून के तहत फंसाया जाता है यह विस्तार से बताया। उन्होंने छतीसगढ़ के बस्तर अंचल का उदहारण दिया जहां कई बड़े स्टील प्रोजेक्ट लाने की तैयारी है जिसके लिए आदिवासियों को बेघर होना पड़ेगा और इसका विरोध करने वालों का दमन होगा। इन प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए कानून में परिवर्तन किया जा रहा है तो नए कानून बनाया जा रहा है । खास बात यह है कि अपराधियों पर नियंत्रण के नाम पर जो कानून बनाए जाते हैं, उनका इस्तेमाल मजदूर संगठनों के साथ जमीन की लड़ाई लड़ने वाले आदिवासियों के खिलाफ किया जाता है। उन्होंने सेना को दिए जा रहे विशेष अधिकार का सवाल भी उठाया जिसके चलते दमन करने वाले किसी अफसर के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं हो सकती।
अशोक चौधरी ने सभी जन आंदोलनों को एक मंच पर लाकर कॉरपोरेट लूट के साथ मजहबी गोलबंदी के खिलाफ संघर्ष तेज किया जाना चाहिए।
भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा- मैंने अपनी याददाश्त में इतने विविध धाराओं के लोगों को पहली बार एक साथ बैठे देखा है जिसमें वामपंथ की भिन्न विचारधारा के लोग हैं तो समाजवादी विचारधारा के लोग शामिल हैं। असम अरुणाचल से लेकर तमिलनाडु कर्णाटक में जन आंदोलन से जुड़े कार्यकर्त्ता यहां आए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, मानवाधिकार, एटमी उर्जा से लेकर मजहबी गोलबंदी के खिलाफ लड़ने वाले लोग यहां आए हैं और बहुत से लोग जो नहीं आ पाए उन्होंने सन्देश भेजा है।
इससे साफ़ है कि खतरा जितना बड़ा है उससे मुकाबला करने की जन इच्छा भी उतनी ही प्रबल है। यह खतरा इस साल ही आया और इस साल के अंत तक हम सब इसका जवाब भी दे देंगे। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर का एक साझा मंच बने और देश के सामने आई नई चुनौतियों का साझा मुकाबला किया जाए। उन्होंने इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए नवम्बर से जनवरी के बीच एक बड़ा सम्मलेन बुलाने की बात कही।
पत्रकार अनिल चमड़िया ने सम्मेलन से पहले देश के विभिन्न क्षेत्रों में क्षेत्रीय सम्मेलन बुलाकर इस अभियान का दायरा बढ़ने पर जोर दिया। बैठक में कविता कृष्णन, एनडी पंचोली, विजय प्रताप, विनायक सेन, गौतम नवलखा, अनिल सदगोपाल आदि को शामिल कर एक संचालन समिति का गठन किया गया जो जल्द ही इस मंच का नाम और आगामी सम्मलेन की तारीख तय करेगी।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क