समावेशी और बहुलतावादी संस्कृति वाले शहर बनारस की तरफ से आपको हार्दिक अभिवादन!
आज हमें गालिब की बनारस के बारे में लिखी निम्नलिखित पंक्तियाँ याद आ रही हैः
“त आलल्ला बनारस चश्मे बद्दूर, बहिश्ते खुर्रमो फि़रदौसे मासूर
इबातत ख़ानए नाकूसियाँ अस्त, हमाना काब-ए- हिन्दोस्तां अस्त”
(हे परमात्मा बनारस को बुरी दृष्टि से दुर रखना, क्योकि यह आनन्दयम स्वर्ग है। यह घण्टा बजाने वालों अर्थात् हिन्दुओं की पुजा का स्थान है। यानी यही हिन्दोस्तान का काबा है।)
दुनिया के प्राचीनतम शहरों में एक बनारस/वाराणसी/काशी विभिन्न विचार धाराओं, धर्मों के साथ दुनिया भर में आकषर्ण का प्रतीक रहा है। जहां यह हिन्दुओं का पवित्र शहर है। वहीं महात्मा बुद्ध के प्रथम उपदेश (धर्म चक्र प्रवर्तन) के लिए बौद्ध धर्मावलम्बियों का प्रमुख केन्द्र भी है। जैन धर्म के तीन तीर्थंकर यहीं पर पैदा हुए। साम्प्रदायिकता व जातिवाद के खिलाफ संत कबीर, संत रैदास व सेन नाई की जन्मस्थली तथा कर्मस्थली यही रही है। वही दूसरी तरफ बनारस की बनारसी रेशमी साड़ी को मौलाना अल्वी साहब ले आये। समन्वयवाद के तुलसीदास, हिन्दी व उर्दू के महान कथाकार मुंशी प्रेमचन्द, महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, डॉ. श्याम सुन्दरदास एवं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और बनारस घराने के प्रसिद्ध संगीतकारों की जन्मभूमि व कर्मभूमि यही रही है। वाराणसी से चार भारत रत्न महान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी, महान सितार वादक प. रविशंकर और स्वतंत्रता संग्राम, ऐनी बेसेन्ट व हिन्दुस्तानी कल्चरल सोसाइटी से जुड़े तथा महात्मा गांधी के साथ काशी विद्यापीठ की स्थापना करने वाले डॉ. भगवान दास का जुड़ाव यहीं से रहा है। बनारस घराना के संगीतज्ञ जहाँ एक तरफ हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुति पर अपना शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत करते हैं। वही अफगानिस्तान से आये सरोद, ईरान से आये शहनाई व सितार का गौरव के साथ उपयोग करते हैं। भारतीय दर्शन की विभिन्न शाखाओं के साथ हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, यहूदी, बहाई, बौद्ध, जैन, सिख, सूफी सभी का बनारस से जुड़ाव रहा है। जो बनारस को बहुलतावाद व समावेशवाद का केन्द्र बनाता है और यह केन्द्र ‘गंगा तटीय सभ्यता का हेरिटेज’ है। जिससे भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लोग सीख सकते हैं कि अपने अन्तर्विरोधों के साथ सहिष्णु व फक्कड़ तरीके से कैसे रहा जा सकता है। इसलिए जरूरी हो गया है कि ‘आस्था, विश्वास व तर्क के शहर’ बनारस को ‘हेरिटेज शहर’ घोषित किया जाये। उसे ‘गन्दा जल’ नहीं, ‘गंगा जल’ मुहैया कराया जाये और भगवान शिव के प्रिय साड़ को बनारस शहर में पीने का पानी और पशुचिकित्सक भी मुहैया कराया जाये। सिंगापुर की तर्ज पर पुराने शहर को हेरिटेज के तौर पर संजोया जाये और नये शहर को आधुनिक दुनिया की तरह बसाया जाये। वही शहर के बिनकारी, खिलौने के काम, जरदोजी को प्रोत्साहित व संरक्षित किया जाये। विदित है कि दुनिया के विभिन्न सेनाओं व पुलिस के बैज भी बनारस से बनते हैं। हिन्दू देवी-देवताओं के वस्त्र बनारस के मुस्लिम बुनकर बनाते हैं। बनारस के बहुलतावाद और समावेशी इतिहास को कम से कम बनारस के स्कूलों में जरूर पढ़ाया जाये। ये इसलिये जरुरी है कि केवल बनारस में ही नहीं, बल्कि भारत व दक्षिण एशिया में जातिवाद व साम्प्रदायिक सोच को खत्म कर इंसानों के बीच सकारात्मक एकता (Positive Conflict Resolution) स्थापित किया जा सके, जो नागरिक बनाने की प्रक्रिया को मजबूत कर सके। जिससे जातिवाद व सम्प्रदायवाद से होने वाली यातना व संगठित हिंसा को समाप्त किया जा सके। इसी परिपेक्ष्य में बनारस के मूलगादी कबीरचौरा मठ में 09 अगस्त, 2014 (शनिवार) को ‘बनारस सम्मेलन’ कार्यक्रम का आयोजन 11:00 बजे सुबह से शुरू होगा। कार्यक्रम की शुरुआत पं. विकास महाराज (प्रसिद्ध सरोदवादक) व पं. प्रभाष महाराज (तबलावादक) के नेतृत्व में ‘पंचनाद’ से शुरू होगा। जिसमें आप सादर आमंत्रित है।
लेनिन रघुवंशी