राजीव यादव

क्या आप राजकुमार भारती को जानते हैं? बलिया के हैं.. नहीं जानते हैं न? मैं भी नहीं जानता था। 27 को जब गोरखपुर से सिवान के लिए जा रहा था तो अमर उजाला के पेज 3 पर 'सीएम से न मिल पाने पर आत्मदाह की कोशिश' करने वाली खबर से ये पहचान हुई।

खबर थी कि बलिया से आए एक व्यापारी जिसने ढाई लाख कर्ज लिया था और व्यापार में मुनाफा न होने के चलते पूरा परिवार भारी मानसिक दबाव में था। ऐसे में जब उसे पता चला की सीएम गृह जनपद गोरखपुर में हैं तो अपनी कर्ज माफी की गुहार लेकर वह पहुंचा और न मिल पाने पर झोले से केरोसिन तेल निकाल कर आत्मदाह की कोशिश की।

इस घटना को सुरक्षा में भारी चूक भी बताया गया। राजकुमार की नहीं। सीएम की। राजेश को तो हिरासत में ले लिया गया और ख़बरों के मुताबिक सीएम सुबह से गायोँ को गुड़-बिस्कुट खिलाने में व्यस्त दिखे।

राजीव यादवखैर बलिया पहुँचने पर डॉ Ahmed Kamal भाई से इस घटना के बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि मालूम करता हूँ। कुछ वक्त बाद उनका फोन आया कि एक मीडिया के दोस्त ने बताया कि पास में राजपूत नेवरी में घर है। कुछ वक्त बाद एक जगह मिलने का प्लान किया गया और फिर अहमद और Manzoor भाई के साथ उस जगह चल दिया गया।

मेन सड़क के किनारे से जैसे ही अहमद भाई ने गाड़ी मोड़ी और तभी उनके एक परिचित से दिखने वाले नौजवान से सलामी हुई और उन्होंने गोरखपुर कि घटना से जुड़े उस शख्स के बारे में पूछा तो वो आस-पास के लोगों और दुकान वालों से इशारे से पूछने लगा।

एक दुकान पर बैठे एक आदमी ने जब घटना बताई गई तो उनके घर की तस्दीक की। उन सब के चेहरे पर दिख रहा भाव अजीब सा लगा। मुझे नहीं समझ आता क्या शब्द दूँ। पर जो भी था दुःख या क्रोध नहीं था। क्योंकि वह एक मुस्कराहट थी।

जैसे-जैसे गली के अंदर हम घुसने लगे असहज सा हो रहा था। क्यों कि खबर में पढ़ा था कि आत्मदाह करने वाला व्यापारी था। और अहमद और मंजूर भाई पूछते-पूछते आखिर जब उनके घर पर पहुँचे तो मेरे दिमाग में जो तस्वीर व्यापारी की बनी थी, टूट गई।

पानी सप्लाई की टूटी हुई पाइप से उस घर के सामने एक महिला पानी भर रहीं थीं औऱ बच्चे आस-पास मंडरा रहे थे। पूछने पर मालूम चला कि वो 'व्यपारी' लट्ठा बेचने अभी-अभी पांच मिनट पहले ही घर से निकले हैं। मिलने के बारे में पूछने पर कहा बैठिये और पास के एक चचा ने कुर्सियां लाई।

अहमद भाई ने उन महिला से पूछा कि ठेला लेके गए हैं तो उन्होंने कहा कि नहीं दिन भर थे कुछ तो करना होगा न तो अभी झोला में लेकर गए हैं बेचने। शायद उनके पास ठेला नहीं, उन महिला के बोलने के भाव से लगा।

कुछ वक्त बाद एक और महिला आयीं और उन्होंने कहा कि पता नहीं कब तक आएंगे। मंजूर भाई ने कहा कि इंतजार करंगे हम यहीं, तो उन्होंने कहा कि 8-9 बज जायेगा। हम लोगों ने उनका कोई मोबाइल नंबर माँगा पर वो न दे सके। नहीं मालूम कि उनके पास नम्बर था कि नहीं या वो हमसे डर तो नहीं रहे थे ऐसा मुझे एक बार लगा।

फ़िलहाल डॉ साहब ने मोबाइल नम्बर दिया और कहा कि आने पर बात कर लेंगे और हम कल फिर आएंगे।

उस घर से तो निकल आए। बलिया से लखनऊ के दूसरे सफर के लिए। पर कई सवाल जेहन में घूम रहे हैं। क्या वो राजकुमार का ही घर था, हमने तो घटना के बारे में सिर्फ मुहल्ले वालों से जिक्र कर पूछा था उसके घर पर तो नहीं। क्योंकि राजकुमार का घर है इससे ज्यादा पूछने की हिम्मत हमारी नहीं हुई। अगर वो राजकुमार का ही घर था जिसका रास्ता गोरखपुर में खुद पर तेल छिड़कने वाले व्यक्ति के घर का पता पूछने पर लोगों ने बताया तो उनका उसके प्रति क्या नजरिया है। क्यों कि मात्र रास्ता पूछने से जो भाव दिखे उसमें तो ऐसा कुछ उसको दिलासा दिलाने वाला नहीं दिख रहा था। घर पर पहुँचने पर ऐसा नहीं लगा कि इतनी बड़ी घटना जिसे एएनआई जैसी एजेंसियों ने भी प्रसारित किया उसे देख चंद रोज पहले गलियों-गलियों में भटकने वाला कोई नेता क्यों नहीं गया।

अहमद और मंज़ूर भाई कल जरूर जाएंगे ये जानते हुए भी कई बार कहा कि कल जरूर जाइएगा। क्योंकि यही बार-बार जेहन में आ रहा है कि सरकार ने तो गरीबों से मुँह मोड़ ही लिया है पर जिस तरह से समाज भी मोड़ रहा है वो बहुत खतरनाक है। अगर कहीं कुछ उसे हो जाता तो क्या ये समाज जो उसके इस हालत में जब वो खुद को जला डालने पर उतारू है, क्या उसके साथ खड़ा होता? जो जिन्दा रहने पर तो नहीं है।

घर आया तो Shahnawaz भाई से बोला तो उन्होंने एक महत्वपूर्ण सवाल किया कि जो लोग चंद रोज पहले दलित-मुस्लिम एकता की बात कर रहे थे वो कहाँ गए। उनसे उससे मिलने की बात पर उन्होंने कहा कि रुक जाओ पर लगा की कई साथियों से गुजारिश के बाद मुश्किल से Anil भाई ने 200 कुछ का टिकट बनाया जिसे कैंसिल कर कल बनवाना मुश्किल होगा और जब इतनी हैसियत है तो राजेश जैसे किसी व्यक्ति की क्या मदद कर सकते हैं। क्यों कि उसके सवाल उठाने के साथ ही उसे मदद की भी जरुरत है।

वैसे तो इस सोशल वेलफेयर स्टेट में ये जिम्मेदारी सरकार की है पर जब वो पीछे हट गई है तो इस जिम्मेदारी को समाज को लेना होगा। जिससे कोई उस देश में जहां हज़ारों करोड़ रूपये के कर्जदार देश से भाग जा रहे हों उस देश में एक-दो लाख के लिए आत्मदाह न करने पर मजबूर हों।