अभिषेक रंजन सिंह

लाहौर की कोटलखपत जेल में बंद भारतीय कैदी सरबजीत सिंह और अजमेर की जेल में बंद पाकिस्तानी कैदी खलील चिश्ती की रिहाई के लिए सरहद के पार दोनों मुल्कों की आवाम पिछले कुछ सालों से दुआ कर रहे हैं। एक ऐसी सजा जो उसने की है या नहीं, इसकी गवाही मुकम्मल तौर पर दोनों देशों की हुकूमत और वहां के नौकरशाह भी नहीं दे सकते। तो आखिर उन दो कैदियों को यह सजा क्यों दी जा रही है, जिसके बारे में खुद प्रशासन भी पसोपेश में है। यही वजह है कि उनकी तसल्ली पूरी होने तक भारतीय कैदी सरबजीत सिंह और पाकिस्तानी कैदी डॉक्टर खलील चिश्ती पिछले कई वर्षों से जेल की कालकोठरी में बेजार हो चुकी अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। सरबजीत और चिश्ती की आजादी के लिए भारत और पाकिस्तान में मौजूद वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ सियासी लोग कोशिश कर रहे हैं। लेकिन नई दिल्ली और इस्लामाबाद की हूकूमतें जनता की आवाज और उनकी फरियाद अनसुनी कर रहे हैं। हर साल भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश के सैकड़ों लोगों को अपनी भूल की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। गिरफ्तार होने वाले ज्यादातर लोग न तो कोई आतंकी होते हैं और न ही वे किसी गलत मकसद से सरहदें लांघते हैं। इनमें से कुछ खुशकिस्मत होते हैं, जिनकी रिहाई जल्दी हो जाती है, लेकिन बहुत सारे लोग सौभाग्यशाली नहीं होते जिनकी रिहाई चंद दिनों में हो जाए। उन्हें न किए गए अपराध के लिए भी वर्षों जेल में रहना पड़ता है। भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बाग्लादेश की सरकारें और आला अधिकारी एक-दूसरे के साथ आपसी रिश्ते सुधारने की कोशिश करते हैं। व्यापार, वाणिज्य समेत कई मसलों पर चर्चाएं होती हैं, लेकिन कैदियों की रिहाई के बारे में कभी भी ठोस वार्ता नहीं की जाती और न ही कोई ऐसे समझौते की बात होती, जहां धोखे से सरहद लांघने की इतनी क्रूर सजा को खत्म किया जा सके। पिछले दिनों पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों के बीच एक उच्च स्तरीय वार्ता संपन्न हुई। संयोग से सरबजीत सिंह की बहन दलबीर कौर भी उन दिनों पाकिस्तान में थी, जो अपने भाई से मिलने लाहौर के कोट लखपत जेल आई हुई थी। इस्लामाबाद में बेशक, दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने के मकसद से वार्ताएं हुई, लेकिन विदेश सचिव निरूपमा राव ने पाकिस्तान में अपने समकक्ष सलमान बशीर से सरबजीत सिंह की सुरक्षित रिहाई के लिए कोई बातचीत नहीं की। लिहाजा दोनों देशों की सरकारें इस मामले में गंभीर पहल करते हुए सरबजीत सिंह और डॉ. खलील चिश्ती समेत उन तमाम बेगुनाह लोगों की रिहाई सुनिश्चित करें, जो वर्षों से दोनों मुल्कों की जेल में जानवरों जैसी जिंदगी गुजार रहे हैं।