(एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक अध्ययन )

-एच.एल, दुसाध

प्रख्यात ख्यात दलित चिन्तक- एक्टिविस्ट और आंबेडकर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. लालजी निर्मल मैला ढोने की प्रथा का अध्ययन करने के लिए आजकल अपनी टीम के साथ बुन्देलखंड के दौरे पर हैं। वहां से उन्होंने सोशल मीडिया पर कई ऐसी सूचनाएं व तस्वीरे डाली हैं, जिन्हें देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति स्तब्ध हो सकता है। ऐसी ही एक स्तब्धकारी सूचना उन्होंने कल रात फेसबुक पर डाली थी, जो विश्व इतिहास की महानतम विद्रोहिणीयों में से एक फूलन देवी के आश्रितों से संपर्कित थी। उन्होंने लिखा था,’बैंडिट क्वीन फूलन की बहन रामकली बेहद गरीबी में मेहनत मजदूरी कर जीवन यापन कर रही हैं। रोते हुए रामकली ने बताया कि उसका बेटा होटल में प्लेट धो रहा है। इनके गांव के एक छोटे से बच्चे से जब फूलन देवी के बारे में पूछा गया तो उसने कहा फूलन के बारे में नहीं जानते किन्तु उनकी बहन को जानते हैं, उसका नाम रामकली है वह रोटी मांगने आती है। फूलन के घर शेखपुर गुढ़ा के ठीक बगल में यमुना बहती हैं। फूलन देवी के परिवार की दयनीय दशा देख कर हमारी टीम के लोग भी रुआंसे हो गए। उनकी बहन को आर्थिक मदद भी दी गई। हमारी टीम की बहादुर बेटी साक्षी विद्यार्थी ने वहां संकल्प लिया कि फूलन देवी के नाम को मरने नहीं देंगे।

’उनके उस पोस्ट पर कमेन्ट करते हुए एक व्यक्ति ने लिखा था,’ यही हाल फूलन की मां का भी रहा ,राशन कार्ड भी नहीं था उनका’।

डॉ.। निर्मल की उपरोक्त पोस्ट पढने के बाद मेरी तो आँखें भर आयीं और मैं फूलन के आश्रितों की दुर्दशा से कहीं ज्यादा बहुजन समाज के लोगों की सोच पर भावुक हुआ। बहरहाल बहुजन समाज के साईक का ठीक से अध्ययन करने पर कोई भी मेरे तरह भावुक हुए बिना नहीं रह पाएगा। वास्तव में बैंडिट क्वीन के आश्रितों की दुर्दशा, दलित-पिछड़ों से युक्त एक मरियल व लुंज-पुंज समाज की कारुणिक सोच का प्रतिफल है।

इस समाज में अपने-अपने संघर्ष व स्वाभिमान के प्रतीकों को संरक्षित न कर पाने की कारुणिक मानसिकता का उत्पाद है, रामकली।

अगर यह समाज फूलन के ऐतिहासिक अवदानों की कीमत समझता तो उनके आश्रितों को योग्य संरक्षण जरुर प्रदान करता फिर, रामकली या फूलन की मां यह दशा नहीं रहती!

दरअसल यह भारत के हजारों साल के जन्मजात शोषकों के खिलाफ सामाजिक अन्याय की सर्वाधिक शिकार विश्व की विशालतम आबादी की हार है।

अगर कायदे से अध्ययन हो तो पता चलेगा कि फूलन के आश्रितों की बदहाली के पीछे उस शोषक वर्ग का बड़ा हाथ है, जिसके खिलाफ उसने विद्रोह के झंडे को एवरेस्ट सरीखी ऊंचाई प्रदान की थी। इनकी दुर्दशा देखकर देश का शक्तिसंपन्न वर्ग संतुष्ट हो सकता है कि इन्हें देखकर फिर कोई फूलन की भूमिका में अवतरित होने की हिमाकत नहीं करेगा!

फूलन ही नहीं, जिस तरह चंद्रशेखर रावण में बहुजन समाज के लोग 21 वीं सदी के भगत सिंह- चंद्रशेखर का अक्स देखने लगे थे, उसकी वर्तमान दशा देखकर भी कौन चंद्रशेखर की भूमिका ग्रहण करने की मूर्खता करेगा!

युवा जोश की जिन्दा मिसाल चंद्रशेखर आज व्हील चेयर का सहारा लेने के लिए विवश है, तो उसके पृष्ठ में शासन-प्रशासन पर हावी सदियों के विशेषाधिकारयुक्त तबके का ही हाथ है।

मेरे फ़िल्मी गुरू ‘हम लोग’ सीरियल फेम एम.एस.सोढ़ी कहा करते थे,’ क्रांतिकारी और पहलवान, लेखक और कलाकार, यहाँ तक कि गुंडे भी नर्चर किये जाते हैं। भरपूर संरक्षण के बिना बड़ा पहलवान, क्रान्तिकारी, लेखक- कलाकार विकसित हो ही नहीं सकते। बिना इसके बनेंगे तो वे ज्यादातर दोयम दर्जे के ही होंगे, अपने क्षेत्र के चैम्पियन नहीं हो सकते !’

अब अगर कोई अतीत का ठीक से सिंहावलोकन करे तो पायेगा कि राष्ट्रीय या या स्थानीय स्तर पर जितने भी लेखक, कलाकार, पहलवान, गुंडे इत्यादि पैदा हुए उनको समाज के नेताओं, पैसे वालों व अन्य सक्षम लोग का आर्थिक, नैतिक, प्रशासनिक इत्यादि समर्थन मिला तो ही वे गहरी छाप छोड़ पाए। यही नहीं गुंडे, पहलवानों, लेखक, कलाकारों, क्रान्तिकारी इत्यादि के अवदानों से धन्य समाज ने उनके आश्रितों के केयर में भी कोई कोताही नहीं की।

अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि बहुजन समाज अपने पहलवानों, जांबाजों, लेखक-फनकारों एवं उनके आश्रितों को योग्य संरक्षण देने के मामले में पूरी तरह व्यर्थ रहा है। इसीलिए दुनिया में सर्वाधिक अन्याय के शिकार इन समुदायों के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले लोग अपवाद रूप में ही उभरते हैं।

इस मामले में अधिकार चेतना से भरपूर समृद्ध भारत का परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त समुदाय मीलो आगे है। वह अपने समुदाय के हित में रिस्क उठाने वालों को योग्य संरक्षण देने में सदा तत्पर रहता है, इसलिए इस समुदाय पर जब किसी फूलन का खौफ हावी होता है, उससे निजात दिलाने के लिए कोई राणा सामने आने में देर नहीं लगाता। संरक्षण देने की मानसिकता से पुष्ट इस समाज की कोख से ही राष्ट्रीय-जिला और गली स्तर पर भूरि-भूरि ब्रह्मदेव मुखिया – राणा पैदा होते रहे हैं। इस कारण ही भारत में यथास्थितिवादी लेखक-कलाकारों की भावी पीढियां अपने पुरखों का सुफल भोग रही हैं।

अगर बहुजन समाज अपनी दुरावस्था से मुक्ति चाहता है तो उसे अपने समाज के लेखक-कलाकारों, फूलन – चद्रशेखरों और उनके आश्रितों को हर मुमकिन संरक्षण और सहयोग देने की मानसिकता से पुष्ट होना होगा।

स्मरण रहे दुनिया के इतिहास में आजादी की जंग लड़ने वाले ढेरों संगठनों को कभी शहादत देने वालों की कमी नहीं पड़ी तो इसलिए कि उन्होंने अपने मिशन के लिए सर्वस्वदान करने वालों में अपने आश्रितों के प्रति असुरक्षाबोध नहीं पनपने दिया जिस कारण वे हँसते-हँसते प्राण-दान करते गए।