सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द किये जाने के बाद ऊर्जा नीति पर भी पुनर्विचार ज़रूरी
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द किये जाने के बाद ऊर्जा नीति पर भी पुनर्विचार ज़रूरी
लखनऊ। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले में अवैध करार दिए गए कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द किये जाने का स्वागत करते हुए आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने कहा है कि अब नए परिप्रेक्ष्य में ऊर्जा नीति के पुनरीक्षण की भी आवश्यकता है क्योंकि निजीकरण की एकतरफ़ा ऊर्जा नीति का सबसे बड़ा सम्बल अवैध तरीके से मिले कोयला ब्लाक थे जो अब रद्द हो गए हैं। फेडरेशन पहले से ही यह मांग कर रही है कि इस हेतु प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति गठित की जाये जिसमे विशेषज्ञों को समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाये।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द किये जाने के बाद निजी घरानों द्वारा कोयला संकट और कोयला आयात की आड़ में बिडिंग के बाद बिजली की दरों में की गयी वृद्धि भी अवैध मानी जानी चाहिए अतः विगत दो दशक से चल रही नीति पर पुनर्विचार नितान्त ज़रूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान बिजली संकट के दौर में निजी घरानों द्वारा कोयला संकट के नाम पर बिजली घरों को जानबूझकर बंद करना या कम क्षमता पर चलाना दरअसल ब्लैकमेलिंग है और बिडिंग के बाद बिजली दरों में वृद्धि कराने की साज़िश है। रिलायंस के सासन बिजली घर को पूरी क्षमता पर न चलाना इसी साज़िश का हिस्सा है क्योंकि बिडिंग के अनुसार उ प्र सहित अन्य प्रांतों को 70 पैसे प्रति यूनिट की दर पर बिजली मिलनी चाहिए जो निजी कंपनी नहीं देना चाहती है। सासन का मामला अब और भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने जिन चार कोयला ब्लाकों को निरस्त नहीं किया है उनमे दो सासन रिलायन्स के हैं, अतः अब रिलायन्स पर सासन बिजली घर पूरी क्षमता पर न चलाने पर केंद्र सरकार को दण्डात्मक कार्यवाही करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि ऊर्जा नीति की निष्पक्ष समीक्षा में कोयला घोटाले से भी बड़े घोटाले सामने आएंगे। उन्होंने कहा कि देश की सभी निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियों का सरकारी कंपनियों की तरह सी ए जी आडिट कराया जाये तो बिजली निजीकरण का सच सामने आ जाएगा। फेडरेशन ने यह भी मांग की कि कोयला घोटाले से जुड़े सभी बिजली क्रय करारों पर जनहित में पुनर्विचार कर उच्च दरों के पी पी ए रद्द किये जाएँ।
बिजली अभियंता संघ नेता ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद कुछ कारपोरेट परस्त लोग बेमतलब हाय तौबा मचा रहे हैं जिसके सामने केन्द्र सरकार को कदापि नहीं झुकना चाहिए और नए सिरे से कोयला आवंटन की पारदर्शी नीति बनानी चाहिए जिससे कोयला होते हुए भी कोयले की कमी से बिजली घर बंद न हों। उन्होंने कहा कि सबको पता है कि कोयला ब्लॉक के नाम पर निजी घरानों ने शेयर मार्केट में करोड़ों रुपए का मुनाफा पहले ही कमा लिया है। यदि सभी 218 कोयला ब्लाकों से आज कोयला निकाला जा रहा होता तो देश में कोयले का सरप्लस भण्डार होता जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि निजी कंपनियों ने मात्र 40 खदानों में काम किया और शेष के नाम पर पैसा कमाते रहे। फेडरेशन ने कहा कि अवैध कोयला ब्लाक आवंटन रद्द होने से बिजली उत्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि जब इन खदानों से कोयला निकाला ही नहीं जा रहा था तो कौन सा प्रभाव पड़ सकता है, जिन 40 खदानों में काम चल रहा है उसे छह माह के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अप्रभावित रखा है वैसे भी इन खदानों से देश की कुल ज़रूरत का मात्र सात प्रतिशत कोयला निकलता है।
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