जनपक्षधर राजनीति,समाजवादी विचारधारा और बेबाक शैली का प्रयोग करने वाले शरद यादवका नाम मुद्दा आधारित राजनीति करने वालों में

शामिल है। दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के कल्याण के सवाल पर समझौता विहीन संघर्ष के कारण राजनीति में उन्हें अलग मुकाम और पहचान हासिल है। आपातकाल, मंडल और महिला आरक्षण के सवाल पर संसद और उसके बाहर अपनी राय रखने से उन्होंने कभी गुरेज नहीं किया। भाजपा के साथ रहते हुए भी उनका ख्याल है कि समाजवाद आयेगा और गैर बराबरी की व्यवस्था बदलेगी । प्रदीप सिंह ने उनसे कई अहम मसलों पर बातचीत की। पेश है बातचीत का मुख्य अंश-
राहुल गांधी भट्टा-पारसौल की घटना के बाद लगातार किसानों और भू अधिग्रहण के सवाल पर सक्रिय हैं। वह किसान यात्रा कर रहे हैं। गांधी परिवार का वारिस किसानों के सवाल पर सड़क पर उतरे इसके क्या सियासी मायने हैं?
उत्तर प्रदेश में विधान सभा का चुनाव नजदीक है। राहुल गांधी की किसान पदयात्रा उसी का हिस्सा है। वह किसानों का दर्द कम करने नहीं अपनी सीट बढ़ाने के लिए यात्रा पर हैं। पिछले नौ सालों में देश भर में 27 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है। केंद्र में भूमि अधिग्रहण विधेयक लंबित पड़ा है। कांग्रेस इस कानून पर कुंडली मारे बैठी है। यह अधिग्रहण उसी का नतीजा है। भट्टा-पारसौल में सबसे पहले हमने संघर्ष किया। किसान नेता मनवीर तेवतिया के ऊपर सरकार ने 50 हजार रुपये का इनाम घोषित कर रखा है। वह भागा-भागा फिर रहा है। राहुल गांधी अगर किसानों के हितैषी बनने की बात करते है तो अभी तक भूमि अधिग्रहण कानून क्यों नहीं बन पाया?

कालाधन पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है?
यूपीए सरकार भ्रष्टाचार, कालेधन और महंगाई पर कोई कारगर कदम नहीं उठा रही है। वह जनता और अदालत सबको गुमराह कर रही है। काले धन पर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार उसी का नतीजा है। सर्वोच्च अदालत का फैसला और पहल स्वागत योग्य है। एसआईटी बनाने का निर्देश सहीहै।

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विपक्ष जोरदार तरीके से सरकार की घेराबंदी नहीं कर पाया। एनडीए इस सवाल पर नाकाम क्यों रहा?
भ्रष्टाचार के सवाल पर एनडीए ही नहीं समूचा विपक्ष लड़ रहा है। सारी विपक्षी पार्टियों ने 5 जुलाई को भ्रष्टाचार के सवाल पर भारत बंद रखा। इस संघर्ष में हमारे 27 साथी जेल में हैं। यूपीए सरकार की जनविरोधी नीतियों, भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ हमने देश के नौ राजयों में महारैली आयोजित कीं। अब अगर लोग यह आरोप लगाएं कि विपक्ष शांत बैठा है, तो ऐसे में कहा जा सकता है कि सवाल उठाने वालों की याददाश्त कमजोर हैें?
लोकपाल की मुहिम को सरकार संसद बनाम सिविल सोसायटी के संघर्ष के रूप में पेश कर रही है। क्या टीम अन्ना हजारे अपने को संसद के ऊपर मान रही है? एनडीए का अन्ना - बाबा रामदेव के अभियान पर क्या नजरिया है?
सरकार पहले अन्ना हजारे और बाबा रामदेव से बात करती है। एयरपोर्ट पर बाबा रामदेव से मिलने केंद्रीय मंत्री जाते हैं। उसके बाद आप टीम अन्ना हजारे और सिविल सोसायटी से बात करते हैं। टीम अन्ना संसद से ऊपर नहीं है। इस मामले में सरकार दोहरी नीति अपना रही है। जो कि गलत है।

सिविल सोसायटी और संसद में कोई संघर्ष नहीं हैं।
भ्रष्टाचार से निपटने के लिए ‘मजबूत’ लोकपाल बिल का क्या अर्थ है?

मजबूत बिल से हमारा मतलब है कि प्रधानमंत्री और संसद भी इसके दायरे में आए। न्यायपालिका की जवाबदेही तय की जाए। न्यायापालिका के लिए अलग से प्राधिकरण बने। मीडिया को भी इसके दायरे में लाना होगा। लोकतंत्र में सरकार, न्यायपालिका, मीडिया और विपक्ष सबकी जवाबदेही होती है। इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा।
सलवा जुडूम को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध ठहराया है। एनडीए के मुख्य घटक दल भाजपा की वहां सरकार है। इस निर्णय पर आपकी क्या प्रतिक्रया है। इस मुद्दे पर क्या कभी एनडीए की बैठक में आपकी पार्टी ने भाजपा से बातचीत की थी?
सलवा जुडूम पर अदालत का फैसला काबिले तारीफ है। जनता को हथियार बांटने की सरकारी नीति को किसी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता है। दूसरी बात जनता को हथियार बांट कर जनता पर हथियार से हमला करवाना गलत है। इसको तत्काल रोका जाना चाहिए। एनडीए की बैठक में हर मुद्दे पर बात नहीं होती है।

मानसून सत्र आ रहा है। संसद में एनडीए किन मुद्दों पर सरकार को घेरने जा रही है?
महंगाई और भ्रष्टाचार से इस समय देश त्रस्त है। खाद्य वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हंै। सरकार के पास इसका कोई समाधान नहीं दिख रहा है। इससे निपटने की वह इच्छा शक्ति भी नहीं दिख रही है। मानसून सत्र में हम यूपीए सरकार द्वारा किए गए घोटाले और भ्रष्टाचार, देश भर में हो रहे कृषि भूमि का अधिग्रहण, भूमि अधिग्रहण कानून, प्रभावी लोकपाल विधेयक, जाति आधारित जनगणना में हो रही खामियों और कावेरी-गोदावरी बेसिन के मुद्दे प्रमुखता से उठाएंगे।

जनता दल(यू) का दायरा बिहार से बाहर नहीं निकल पा रहा है। इसमें क्या कोई राजनीतिक संकट है?
जनता दल पहले तो पूरे देश में था। अभी भी बिहार में हमारी सरकार चल रही है। पूरे देश में हमारे कार्यकर्ता हैं। यह सवाल आप मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव और एचडी देवगौडा“ से कीजिए तो बेहतर जवाब मिल सकता है।

उत्तर प्रदेश, ओडिसा और कर्नाटक में आज भी जनता दल से टूट कर अलग हुए लोग राजनीति में हैं।
देश में सरकारी सेवाओं का हाल खस्ता है। स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक परिवहन से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है?
उदारीकरण और बाजारीकरण के कारण सरकार ने पब्लिक सेक्टर को तबाह किया है। जबकि यूरोप में उदारीकरण और बाजरीकरण के पहले शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा को संरक्षित किया गया। हमारे देश में सबसे पहले इसी क्षेत्र में निजीकरण किया गया। जिसका परिणाम सामने है। आप बाजारीकरण कर रहे हैं तो बाजार का पूरा नियम मानिए। पहले शिक्षा,स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा का बंदोबस्त कीजिए तब बाजारीकरण की छूट दीजिए?
पंूजीवाद अपने चरम पर है। इसके दुष्परिणाम सामने है। ऐसे में समाजवाद की क्या भूमिका है?
समाजवाद हर व्यक्ति को संपन्न और बराबरी का अधिकार देने की बात करता है। संपन्नता आए बगैर बराबरी और समानता के बिना संपन्नता नहीं आ सकती है। जब तक हमारे समाज में गैरबराबरी और विपन्नता रहेगी। समाजवाद की भूमिका प्रभावी रहेगी।