सवाल छोड़ता तेलंगाना रेल हादसा
सवाल छोड़ता तेलंगाना रेल हादसा
मसाईपेट की दुर्घटना नरेंद्र मोदी सरकार में तीसरा बड़ा रेल हादसा है।
सिद्धार्थ संकर गौतम
गुरूवार का दिन नौनिहालों के लिए काल साबित हुआ। दरअसल तीन शहरों में स्कूली बच्चों से भरी वैन या बस की अन्य वाहनों से हुई टक्कर में 25 से अधिक बच्चों की मौत हो गई। पंजाब और कानपुर की घटनाओं को यदि पर रखा जाए तो नवगठित राज्य तेलंगाना के मेडक जिले के मसाईपेट इलाके की मानवरहित क्रॉसिंग पर गुरुवार स्कूल बस ट्रेन की चपेट में आ गई। हादसे में 19 मासूम, बस ड्राइवर और सहायक की मौत हो गई। तकरीबन 20 अन्य घायल बच्चों को हैदराबाद के अस्पतालों में भर्ती कराया गया। तेलंगाना सरकार और स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार दुर्घटना के लिए रेलवे जिम्मेदार है, जबकि रेलवे ने दुर्घटना के लिए ड्राइवर को जिम्मेदार ठहराया है। हैदराबाद से करीब 70 किमी दूर मसाईपेट में गुरुवार सुबह इस्लामपेट के बच्चों को तूपरान स्थित ककटिया टेक्नो स्कूल पहुंचाने के लिए बस ड्राइवर ने शॉर्टकट लिया और मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग का रास्ता पकड़ लिया। 9.15 बजे स्कूल बस क्रॉसिंग को पार कर ही रही थी कि ठीक उसी समय नांदेड़-सिकंदराबाद पैसेंजर ट्रेन वहां पहुंच गई और बस को तकरीबन एक किमी तक घसीटती ले गई। बस में पांच से 15 वर्ष आयु के कुल 40 बच्चे सवार थे। इस ह्रदय विदारक घटना के जिम्मेदार चाहे जो भी हों किन्तु जिन माता-पिता को अपने बच्चे की अर्थी देखना पड़ी हो, उसके लिए यह महान दुःख का क्षण रहा होगा। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये मुआवजे की पेशकश तथा रेल मंत्रालय द्वारा मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये मुआवजे का एलान भी उनके जिगर के टुकड़े की असामायिक मृत्यु के समक्ष कोई मायने नहीं रखता। मसाईपेट की दुर्घटना नरेंद्र मोदी सरकार में तीसरा बड़ा रेल हादसा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 मई 2014 को पद व गोपनीयता की शपथ लेने की तैयारी कर ही रहे थे। तभी खबर आई कि उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले के खलीलाबाद स्टेशन के नजदीक गोरखधाम एक्सप्रेस एक मालगाड़ी से जा टकराई। दुर्घटना में 25 लोगों की मौत हुई, जबकि 50 से ज्यादा घायल हुए। ठीक एक महीने बाद 25 जून को बिहार के छपरा में दरभंगा राजधानी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई। इसमें चार लोगो की मौत हुई और आठ घायल हो गए। अब तीसरा बड़ा हादसा गुरुवार 24 जुलाई को मसाईपेट में हो गया। इसके अलावा बिहार में नक्सली गुटों द्वारा रेल पटरी को क्षति पहुंचाने की कोशिश के चलते कई दुर्घटनाएं किस्मत से रुक गईं। आखिर रेलवे से जुड़े हादसों में कमी क्यों नहीं आ रही है? एक ओर तो सरकार देश में बुलेट ट्रेन चलाने का दावा कर रही है तो वहीं दूसरी ओर देशभर में 11000 से अधिक मानवरहित रेलवे फाटकों पर सुरक्षा की अनदेखी की जा रही है। हर बड़ी दुर्घटना के बाद पीड़ित परिवार को मुआवजा राशि देकर उसकी बोलती बंद कर दी जाती है। रेलवे या तो दुर्घटना को राज्य सरकार की नाकामी बताकर पेश करता है या पीड़ित पक्ष पर ही इल्जाम लगा दिए जाते हैं। वहीं राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए रेलवे की प्रणाली को दोषी ठहरा देती है। आखिर हमारी सरकारें और संस्थाएं जिम्मेदारी लेने से बचती क्यों हैं? मेडक जिले की हालिया घटना में गलती चाहे बस ड्राइवर की हो किन्तु रेलवे विभाग इस जवाबदेही से नहीं बच सकता कि दुर्घटना यदि मानवरहित रेलवे क्रासिंग पर हुई है उसमें खामी रेलवे की ही है। फिर आम आदमी की बात छोड़िए, मई 2014 में उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री सतही राम यादव की मौत भी मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग के चलते हुई थी। उनकी सरकारी गाडी तेज रफ्तार ट्रेन की चपेट में आ गई, जिसमें उनके अलावा उनके स्टाफ के दो अन्य कर्मचारियों की भी मौके पर ही मौत हो गई थी।
भारत में मानवरहित रेलवे फाटकों पर होने वाली दुर्घटनाओं के आंकड़े बेहद भयानक हैं। 2012 के आंकड़ों को देखें तो सरकारी कमेटी की रिपोर्ट कहती हैं कि हर साल 15 हजार से अधिक जानें लापरवाही की भेंट चढ़ जाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में रेलवे फाटकों पर सुरक्षा दिशानिर्देशों का मखौल उड़ाया जाता है। इसके लिए आम लोगों के साथ-साथ रेलवे के अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कमेटी द्वारा पहले दिए उन सुझावों को भी रेलवे ने नहीं माना, जो रेलवे फाटकों और ब्रिज को पार करने के सुरक्षात्मक तरीकों को लेकर दिए गए थे। इतना ही नहीं, रिपोर्ट के मुताबिक, मरने वालों में सबसे ज्यादा संख्या (तकरीबन 70 फीसद) मानवरहित रेलवे फाटक क्रास करने वालों की है, जबकि 1000 से ज्यादा लोग ट्रेन से गिरने के चलते हर साल अपनी जान गंवा देते हैं। भारत में आज से 4 वर्ष पहले यानी 2010 में 15,99३ मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग थीं। 2010-11 के रेल बजट में इन सभी को समाप्त कर देने का प्रस्ताव रखा गया था और इनकी जगह ओवरब्रिज, सबवे जैसे विकल्प तैयार करने की बात कही गई थी, किन्तु यह सब कागजों तक ही सीमित रहा। 2007-08 में रेलवे ने सुरक्षा मानकों के लिए 5३4 करोड़ की फंडिंग रिजर्व रखी थीं जो 2008-09 में बढ़कर 566 करोड़ हो गई। 2009-10 में इस फंड में भरपूर इजाफा किया गया और रिजर्व फंड 901 करोड़ का कर दिया गया किन्तु मामला वही ढाक के तीन पात वाला रहा। ऐसा नहीं है कि हर दुर्घटना के पीछे रेलवे की खामी ही दोषी हो? हम अकसर अपने आस-पास में यह देखते हैं कि अतिसुरक्षित रेलवे क्रासिंग पर भी लोग जल्दबाजी में नियमों को तोड़ते हैं। ऐसी स्थिति में यदि हादसा हो तो क्या रेलवे जिम्मेदार है? कदापि नहीं। किन्तु सवाल वही है, आखिर बदलाव आएगा कैसे? जनता में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास और रेलवे द्वारा सुरक्षा के तमाम मापदंड अपनाने ने निश्चित ही इन हादसों में कमी आएगी। किसी परिवार के सदस्य का यूं काल का ग्रास बनना नैराश्य उत्पन्न करता है। अतः रेलवे, राज्य सरकार एवं तमाम एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करें ताकि किसी और को ऐसी दर्दनाक मौत न मिले। तेलंगाना का हादसा सभ्य समाज में कई सवाल छोड़ रहा है जिसके जवाब हमें सामूहिक रूप से खोजने होंगे।


