जुगनू शारदेय

यूं तो यह एक पिक्चर का भी नाम है – सात खून माफ । पूरी पिक्चर अंधेरे में डूबी हुई है । इसकी वजह भी है कि पिक्चर एक औरत के मन के अंधेरे की कहानी है । मन के अंधेरे से बाहर निकलने के लिए वह अपने मतलबी पतियों की हत्या करती है । पिकचर को जनता ने पसंद नहीं किया । कुछ कुछ ऐसा ही हाल हमारे बजट मंत्री का होता है । अपने ही आंकड़ों और कुछ करने की तमन्ना में कुछ न कुछ ऐसा करते हैं कि किसी न किसी का खून करना पड़ता है । यहां तो सब अपने हैं । जिसका भी कत्ल करोगे ,सजा से बच जाओगे – पर दामन पर फैले न दिखाई देने वाले खून के छींटों के एहसास से भाग कर कहां जाओगे ।
जाइए , आप जहां जाएंगे – लौट कर इसी सच्चाई की दुनिया में आएंगे कि आपने जो सिस्टम बनाया है ,वह सब सोख लेता है । रसगुल्ले की तरह फूला फूला होता
है । जरा निचोड़ो तो रस कहीं और होता है और हाथ में लिजलिजी सी एक मिठाई होती है । निचोड़े हुए रस में फिर से डाल दो तो यह रसगुल्ला हो जाता है ।
दादा के बजट के निचोड़े हुए रसगुल्ले के रस से भाग कर कहां हाओगे ।
राजनीति में ही नहीं सब जगह भारत की गरीबी ही बिकाऊ चीज है । देखते नहीं , सारी तरक्की के बाद अचानक याद आता है देश के विदेश बिहार को कि हमारे
यहां गरीब बहुत ज्यादा हैं । भारत सरकार के इंडियाई आंकड़े से भी बहुत ज्यादा है । एआररहमान को एक चिरकुट गरीबी दिखलाने वाली कचड़ापट्टी के लखपति के जय हो के लिए ऑस्कार मिला जाता है । दुबारा नहीं मिलता क्योंकि इसमें गरीबी हाय – हो –हो नहीं था । पता नहीं 100 साल के बिहारी इतिहास में बिहार की 100 साल की गरीबी का गीत होगा या नहीं । तरक्की ही तरक्की की सात खून माफ शैली में कहानी होगी या विकास दर का चने का झाड़ होगा ।
जाइए आप कहां जाएंगे , हमारे बीपीएल से भाग कर कहां जाएंगे । प्रणव बाबू का बजटिया संदेश बहुत साफ है । बीच बीच में हम लोग इसे भूल जाते हैं । कभी कभी कोई अमीर याद भी दिलाता है कि पेट्रोल पर प्रति लीटर तीन रुपए की छूट दी जाती है । बीपीएल को इस रकम से एक किलो अनाज मिल जाता है । बिपीएल की याद दिलाना बहुत जरूरी है । अभी पूर्व से दक्षिण तक चुनाव हो रहा है । वहां का बीपीएल क्या खा रहा है । पिछली बार करुणानिधि ने वहां के बीपीएल को टीवी सेट दिया था । अब डिवीडी सेट ही बचा है । करुणानीधि जी अपने अनुभवों से ,अपनी उम्र से तो निपट लोगे पर अपने परिवार से भाग कर कहां जाओगे ।
किसी को याद हो न हो कि याद कि गरीबी का खेला तो अपने बंगाल से हुआ था । अंग्रेजों ने यहीं पहले राजपाट बनाया था । कहना मुश्किल है कि इस राजपाट
में किसकी बढ़ी । अंग्रेजों की अमीरी या बंगाल की गरीबी । उसका एक हिस्सा बिहार भी है । आज भी कुछ बंगाल मूल के लोग बिहार को गरीबी के बारे में बता बता कर अमीर हुए जाते हैं । आंकड़ों में तो समझा देते हो निर्वहन कुमार को लेकिन अपने जीवन के सात खून माफ से भाग कर कहां जाओगे ।