साम्प्रदायिकता लड़ने से नहीं बल्कि लोगों से संवाद और उनकी सोच को बदलने से कमजोर होगी
साम्प्रदायिकता लड़ने से नहीं बल्कि लोगों से संवाद और उनकी सोच को बदलने से कमजोर होगी
‘प्रतिरोध की संस्कृति और साम्प्रदायिकता का सवाल’
इलाहाबाद। पिछले रविवार को ‘प्रतिरोध की संस्कृति और साम्प्रदायिकता का सवाल’ पर केंद्रित कार्यक्रम की शुरूआत प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, भारतीय जन-नाट्य संघ, जन संस्कृति मंच और दस्तक पत्रिका के आह्वान पर, एक जुलूस के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के यूनियन हॉल से जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज तक जा कर एक सभा में तब्दील हो गया।
सभा के अध्यक्ष मण्डल में शामिल थे खगेन्द्र मण्डल, ओपी मालवीय, अकील रिजवी, प्रो. राजेंद्र कुमार, गौहर रजा, कॉ. जियाउल हक, चौथीराम यादव, राजेंद्र राजन और हरीशचंद्र पाण्डे।
देश भर से आए साहित्यकारों का स्वागत करते हुए, संतोष भदौरिया जी ने कहा कि जिस तरह से फिरकापरस्त ताकतें मजबूत हुई हैं और हम भाइयों के बीच भेद-भाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है, उसका ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर की घटना है। उन्होंने आगे जोड़ते हुए कहा कि, जब-जब ऐसे हालात पैदा हुए हैं उसके विरोध में हम लेखक बंधुओं, संस्कृति कर्मियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और हम उसी क्रम में आज यहां एकट्ठा हुए हैं।
संजय श्रीवास्तव ने अपनी बात रखते हुए कहा कि यह केवल कुछ लेखक संगठनों का कार्यक्रम नहीं है। यह उस आंदोलन का एक भाग है जिसने दुनिया बदली। हम सत्ता विरोधी हैं, हम यथास्थितिवाद के विरोधी हैं। यह प्रगतिशील आंदोलन बहुत महत्वपूर्ण है और यह ऐतिहासिक होगा, ऐसा हम उम्मीद करते हैं।
राकेश जी के अनुसार, हम लोग कुछ नया नहीं करने जा रहे हैं। जो हो चुका है, उसको बस दोहराने भर जा रहे हैं। मुंशी प्रेमचन्द ने कहा था कि साम्प्रदायिकता संस्कृति का चोला ओढ़ कर आती है लेकिन अब तो इसने विकास का चमचमाता दुशाला भी ओढ़ लिया है। साथ ही राकेश जी ने आत्मावलोकन पर जोर देते हुए कहा कि कहीं ना कहीं हम बेसुरे और बेताले होते जा रहे हैं।
शकील सिद्दीकी ने कहा कि प्रतिरोध की संस्कृति और अभियान के जनसम्वाद जरूरी है। साम्प्रदायिकता लड़ने से नहीं बल्कि लोगों से संवाद, लोगों को समझने और उनकी सोच को बदलने से कमजोर होगी। आज सम्प्रदायिक ताकतों का सारे संचार माध्यमों पर, जो कि जन संवाद के माध्यम हैं, कब्जा है। मुनाफाखोर शक्तियाँ, लूटने वाली शक्तियाँ हमारे बीच की खाई को बढ़ावा दे रही हैं। ऐसी स्थिति में हमें एक जुट हो कर नई रणनीति बनाने की जरूरत है।
उज्ज्वल भट्टाचार्या ने कहा कि दरअसल साम्प्रदायिकता एक ऐसा सवाल है जो भारत से बाहर अपना अर्थ नहीं रखती। वास्तव में यह पहचान की समस्या है। धर्म, लिंग और जाति पर आधारित पहचान समाज में बंटवारे को जन्म देती है। साम्प्रदायिकता के बढ़ते दायरे की ओर इशारा करते हुए भट्टाचार्या जी ने अपनी बात रखी कि कॉर्पोरेट घराने जिस प्रकार से राजनीति का ध्रुवीकरण कर रहे हैं ये सारी चीजें हमें दिखाती हैं कि साम्प्रदायिकता के सवाल के साथ इन सारे सवालों के साथ जोड़ कर देखे जाने की आवश्यकता है। ताज्जुब होता है कि इस देश ने महंगाई के खिलाफ कोई लड़ाई नहीं शुरू की जिसकी सख्त आवश्यकता है।
सीमा आजाद के अनुसार हमें हताश होने की जरूरत नहीं क्योंकि साम्प्रदायिक ताकतें जब कमजोर होती हैं तभी वो अपना मुखौटा उतार कर अपना वीभत्स रूप उजागर करती हैं।
प्रणय कृष्ण के अनुसार आज के समय में हाईटेक साम्प्रदायवाद से कैसे निपटा जाय इस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है।
गौहर रजा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हम साम्प्रदायिकता के खिलाफ क्यूँ हैं? साम्प्रदायिक होना या ना होना उस प्रकार से नहीं है जैसे कि हिंदू होना या मुसलमान होना। गैरसाम्प्रदायिक होना अपने अंदर से शुरू करना होगा। साम्प्रदायिकता वो मानसिकता है जिसमें हम अपने अंदर अलग-अलग होते हैं। हम साम्प्रदायिक हो सकते हैं, प्रगतिशील होने के बावजूद, जब हम बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने के समय उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते। साम्प्रदायिकता की लड़ाई हमारी पहचान की लड़ाई है। इस बात पर काफी हंगामा खड़ा हुआ जब गौहर रजा ने कहा कि अब साम्प्रदायिकता का वायरस कम्युनिस्ट पर्टियों में भी प्रवेश करता हुआ प्रतीत होता है।
राजेंद्र राजन ने कहा कि संस्कृति भी बंटी हुई है। हम लोक- संस्कृति के पक्षधर हैं ना कि भद्र- संस्कृति के। साथ ही उन्होंने जोड़ा कि साम्प्रदायिकता का सवाल तब तक हल नहीं होगा जब तक कि बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा से जुड़े सवाल हल नहीं होंगे। ये आम जन से जुड़े सवाल हैं। हमें ये देख कर बड़ी खुशी हुई कि आपने इस सभा से पहले सीधे आम जन के बीच जुलूस के माध्यम से जुड़े। आज के समय की माँग है कि हम मुजफ्फरनगर चलें, वहाँ के राहत शिविरों मेँ रह रहे दंगा पीड़ितों की मदद करें उनको जल्द न्याय दिलाए जाने और पुनर्वास के लिए अनशन करें।
चौथीराम यादव ने कहा कि मुजफ्फरनगर में गुजरात दंगे का ही विस्तार था। संस्कृति सत्ताधारियों का बड़ा प्यारा शब्द है। प्रतिरोध की संस्कृति, सत्ताधारियों की संस्कृति के विरोध में है। प्रतिरोध के लिए साहस का होना जरूरी है। कबीर ने जो साहस का परिचय दिया था, वो क्या हमारे अंदर है? इस पर आत्ममंथन की जरूरत है। हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि क्या हमने समाज के हर तबके की बात को ठीक ढंग से रखा? अगर हमने उनकी बात को सही तरीके से रखा होता तो स्त्री विमर्श, दलित आंदोलन ना खड़े होते। आज के दौर में एक ऐसे सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है जिसमें समाज के सभी वर्गों को साथ ले कर चला जा सके।
खगेंद्र ठाकुर ने कहा कि साम्प्रदायिकता का जन्म स्वाधीनता संग्राम के समय हुआ, सताधारियों के हितसाधन के लिए। साम्प्रदायिकता का उपयोग पूंजीवाद के लिए जनाधार बनाने के लिये साधन के रूप में भी हुआ है। उन्होने आगे जोड़ते हुए कहा कि भूख और बेरोजगारी के खिलाफ नारा बुलंद करने से साम्प्रदायवाद कमजोर होगा, साम्प्रदायवाद के विरुद्ध नारा बुलंद करने से नहीं। कांग्रेस और साम्प्रदायिकता पर अपनी बात स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस साम्प्रदायिक ना हो कर साम्प्रदायवाद से समझौता और उसका इस्तेमाल करने वाला दल है। साम्प्रदायवाद उसका लक्ष्य नहीं है। साथ ही साम्प्रदायिक फासिज्म के उलट धर्मनिरपेक्ष फासिज्म भी होता है, इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। धर्मनिरपेक्ष को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि जिसे संचालित करने के लिए धर्म की जरूरत नहीं वह धर्मनिरपेक्ष है।
बहुत ही सार्थक सभा का आयोजन रहा जहाँ पर वक्ताओं ने खुल कर अपनी बात रखी।


