साम्प्रदायिकता ही भाजपा की अंतिम शरण स्थली है
साम्प्रदायिकता ही भाजपा की अंतिम शरण स्थली है
मसीहुद्दीन संजरी
बसपा नेता और उत्तर प्रदेश विधान सभा के नेता प्रतिपक्ष नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर कथित रूप से क्षत्रिय महासभा के लोगों का हमला पूरी तरह भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति की लोमड़ चाल है। संघ–भाजपा इस तरह के हमले करवाने में अभ्यस्थ हैं। छद्म नाम से अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमले करवाने का उसका पुराना इतिहास है। ऐसे घृणित अपराधों के बाद संगठन उससे किनारा कर लेता है, लेकिन अपराधी उनके हीरो बने रहते हैं।
गांधी जी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को कौन भूल सकता है। संघ–भाजपा के कई नेता उसकी तस्वीर पर माला भी पहनाते हैं और उससे दूरी भी बना कर रखते हैं, गांधी जी गुणगान भी कर लेते हैं। बस स्थान और समय का मामला होता है।
हर घटना को साम्प्रदायिक रंग देकर बच निकलने का प्रयास भी संघ की रणनीति का हिस्सा रहा है।
दर असल साम्प्रदायिकता ही उसकी अंतिम शरण स्थली है।
मायावती पर दयाशंकर सिंह की अश्लील टिप्पणी के बाद बसपा के विरोध प्रदर्शन में कथित रूप से उसकी पत्नी और बेटी के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कही गई थीं। अगर आरोप को सही भी मान लिया जाए तो भी ऐसा करने वाले नसीमुद्दीन अकेले नेता नहीं थे। उसमें बसपा के क्षत्रिय नेता भी शामिल थे। लेकिन नसीमुद्दीन सिद्दीकी को निशाना बनाने के पीछे संघ–भाजपा की चाल है। वह इसे साम्प्रदायिक रुख देकर अपना दलित विरोधी चेहरा छुपाना चाहते हैं।
दलित मतदाता को रिझाने के उनके प्रयास पर पानी फिर चुका है इस वजह से उनकी तिलमिलाहट और बढ़ गई है।
यह बढ़ती ही जाएगी क्योंकि दयाशंकर सिंह के मामले को तूल देकर भाजपा की हालत छछूंदर पकड़ छछूंदर पकड़ लेने वाले सांप (घोंटै तो मरै छोड़ै तो अंधा होय) जैसी हो गई है।
Communalism is BJP's last refuge


