साहित्यकारों का मुकाबला अब बॉलीवुड करेगा।
महेंद्र मिश्रा

बीजेपी को अपने साथ खड़ा होने के लिए जब एक भी साहित्यकार नहीं मिला। तो उसने विरोध की कमान बालीवुड को सौंप दी। इसकी जिम्मेदारी अनुपम खेर और रवीना टंडन ने ली है। दोनों मिलकर साहित्यकारों, वैज्ञानिकों, नागरिक सम्मान प्राप्त देश की शीर्ष शख्सियतों से मोर्चा लेंगे।

कभी मैं खेर को अच्छा कलाकार होने के साथ एक बेहतर इंसान भी समझता था। सारांश का वो बूढ़ा आज भी जेहन में उसी तरह से ज़िंदा है। जो अपने मृत बेटे को न्याय दिलाने के लिए बुढ़ापे में भी सिस्टम से लड़ता है। लेकिन शायद समय सारी चीजों को पीछे छोड़ देता है।
खेर चरित्र कलाकार से डॉ डैंग कब बन गए पता ही नहीं चला।
एतराज उनके अभिनय और कलाकार होने से नहीं है। लेकिन खेर पर्दे के इस चरित्र को लगता है हकीकत में भी निभाने के लिए खड़े हो गए हैं। वह 7 नवंबर को दिल्ली की सड़कों पर मार्च करेंगे। विरोध के विरोध में निकलने वाला यह अपने किस्म का अनूठा ही जुलूस होगा।

दरअसल कई कड़ियां ऐसी हैं जो खेर को बीजेपी-संघ से जोड़ देती हैं। सबसे बड़ा रिश्ता झूठ का है। गुजरात दंगों पर बनी फिल्म ‘फाइनल सोल्यूशन’ के निर्देशक राकेश शर्मा इसकी तस्दीक करते हैं।

पिछली एनडीए की सरकार के दौरान अनुपम खेर सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष थे। उन्होंने फिल्म को मंजूरी देने से मना कर दिया था। बाद में जब केंद्र में यूपीए की सरकार बनी तब फिल्म रिलीज हो सकी। जबकि खेर ने टाइम्स नाऊ पर दावा किया है कि एनडीए के शासन में ही फिल्म रिलीज हुई थी।

पत्नी किरण खेर बीजेपी की सांसद हैं। लिहाजा अपने लिए एक राज्यसभा सीट कोई घाटे का सौदा नहीं होगा। किस्मत का ताला खुला तो पार्टी में शत्रुघ्न सिन्हा का विकल्प बनने से लेकर भविष्य में अनंत संभावनाएं मौजूद हैं।

अफसोस इस बात का है कि सारांश का बूढ़ा सिस्टम से लड़ा लेकिन हकीकत का बूढ़ा सिस्टम के खिलाफ खड़े बूढ़ों से लड़ रहा है।

महेंद्र मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार हैं।