अमलेन्दु उपाध्याय

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आ चुके हैं। हिंदी पट्टी के चार राज्यों के परिणामों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण जारी हैं। भारतीय जनता पार्टी इसे मोदी लहर बता रही है तो आप भी लहर पर सवार है। लेकिन निरपेक्ष रूप से कहा जाए तो यह न मोदी की लहर है, न आप का कोई कमाल है। यह शुद्ध रूप से कांग्रेस के रणनीतिक प्रबंधन की चूक और उसकी आर्थिक नीतियों की पराजय है।

हां इन परिणामों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि विकास का नारा खोखला है। विकास एक अतिरिक्त कारक तो हो सकता है लेकिन विकास के नारे पर चुनाव नहीं जीते जा सकते। अगर विकास से सरकारें बनती और बिगड़तीं तो दिल्ली में शीला दीक्षित और राजस्थान में गहलोत सरकार का ऐसा बुरा हाल न हुआ होता। ...और दिल्ली के संदर्भ में कहा जा सकता है कि यहां कॉरपोरेट मीडिया जीता है।

मतदान से पहले पांच राज्यों के चुनाव को लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल मानने से इंकार कर रही भाजपा अब परिणामों को मोदी लहर बता रही है। एकबारगी भाजपा की बात को सही मान लेते हैं और यह स्वीकार कर लिया जाए कि यह मोदी लहर है तब तो कई गंभीर सवाल उठते हैं।

पहला प्रश्न तो यही है कि क्या शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह नाकारा मुख्यमंत्री थे ? क्या वसुंधरा राजे का कोई अस्तित्व नहीं था और डॉ. हर्षवर्धन ईमानदार नेता नहीं थे? यदि मोदी लहर के चलते ही रमन सिंह और शिवराज की सत्ता में वापसी हुई है तो भाजपा को स्वीकार करना चाहिए कि उसकी छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सरकारें नाकारा थीं। जबकि हकीकत यह है कि मप्र और छत्तीसगढ़ दोनों ही जगह मोदी को भाजपा की चुनाव प्रचार सामग्री पर स्थान नहीं मिला और जो मिला भी वह अंतिम समय में पार्टी की लाज रखने के लिए।

छत्तीसगढ़ में रमन सिंह से अजीत जोगी की खुली दोस्ती और नक्सली हमले में अपना सारा नेतृत्व गँवा देने के बाद भी जिस तरह से कांग्रेस ने वहां चुनौती दी उसमें कौन सी लहर थी, कहा नहीं जा सकता। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक लगभग चार लाख लोगों ने नोटा का बटन दबाया। जाहिर है नोटा का बटन दबाने वाले भी मोदी लहर के सवार नहीं थे। अगर यह नोटा वाले भी कोई और बटन दबा आते तो नतीजे क्या आते ?

जबकि दिल्ली में मतदान मतदान का प्रतिशत बढ़ने के बावजूद भाजपा का मत प्रतिशत पिछली बार की अपेक्षा कम हुआ है। यदि मोदी लहर थी और दिल्ली में मोदी की वजह से भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी तब तो मानना चाहिए कि मोदी जी का बैण्ड बज गया। शीला दीक्षित से इतनी नाराजगी के बाद भी दिल्ली वासियों ने पूर्ण बहुमत नहीं दिया जबकि भाजपा के पास इसी दिल्ली में मदनलाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा जैसे दिग्गज नेता रह चुके हैं। इसको इस तरह भी देखें। “आप”को जो वोट मिला है वो किसका मिला है ?
क्या भाजपा का ? यदि ऐसा है तो साहेब का तो बैण्ड बज गया ! फिर कहां रही मोदी लहर ? और अगर ऐसा नहीं है तो यह वोट किसका है ??? कांग्रेस का है? तो जनाब जिसे आप पप्पू कहते हैं वो तो पास हो गया है.... आप कुछ भी कहते रहिए... क्योंकि जो वोट कांग्रेस से नाराज था उसकी पसंद भाजपा नहीं बन सकी, जहां तीसरा विकल्प था वह वहां चला गया। यह मानने में आखिर क्या बुराई है कि भाजपा पिछली बार के मुकाबले सिमटी है और यह तय मानिए कि अगर 'आप' ने कांग्रेस को खत्म करने का काम न किया होता तो जो 'आप' को मत मिले हैं वो भाजपा को तो नहीं ही मिलते और तब दिल्ली का नक्शा क्या होता?

अगर बात राजस्थान की की जाए तो भी वहां कोई चमत्कार नहीं हुआ है। वहां जो हमेशा होता आया है वहीं हुआ। एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा। जिसे मोदी लहर कहकर खुशी मनाई जा रही है वह दरअसल कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का फल है। वैसे भी अशोक गहलोत की सरकार पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं थी लेकिन पांच साल तक लंगड़ी सरकार को चला ले जाना कांग्रेसियों की ही दक्षता है। जब गहलोत के मुकाबले के लिए कांग्रेस में सीपी जोशी थे तो किसी और की बाहर वैसे भी जरूरत नहीं थी।

और अगर राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में मोदी की लहर थी तो जरा राजस्थान में वसुंधरा, छग में रमन सिंह और मप्र में शिवराज के स्थान पर किसी अन्य स्वयंसेवक को भाजपा मुख्यमंत्री बनाने का जोखिम उठाए। ...और ऐसा करना न्यायोचित् भी होगा क्योंकि जीत तो मोदी ने दिलाई है!!! वैसे भी दिल्ली फतह के लिए नाकारा मुख्यमंत्रियों को हटाया जाना जरूरी है !

तो साहेब मप्र, छग और राजस्थान के दम पर दिल्ली फतह करेंगे ? ख्वाब अच्छे हैं पर दिन के हैं। मप्र, छग और राजस्थान तो साहेब की पार्टी 1990 के दशक में भी जीती थी और उत्तर प्रदेश भी जीती थी लेकिन बिना नेहरू गांधी खानदान के दखल के कांग्रेस सरकार बनाकर पांच साल चलाने का कीर्तिमान भी 1991 में ही बनाया गया था। इसलिए चार राज्यों के कीचड़ में कमल खिलने के बावजूद साहेब दिल्ली बहुत दूर है। क्या उस मिजोरम को भी लहर का पैमाना माना जा सकता है जहां कमल से ज्यादा नोटा का बटन दबा है ?

इस सबके बावजूद कांग्रेस को उसकी असफलता के लिए माफ कतई नहीं किया जा सकता। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले उसका पिछड़ना सवाल तो खड़े करता ही है वह भी तब जब देश के एक तिहाई राज्यों में उसकी सरकारें हैं। जो राहुल गांधी आज “आप” से सीखने की बात कर रहे हैं सवाल यह है कि उन्होंने अब तक अपने परदादा पं. नेहरू और दादी इंदिरा जी से क्या सीखा है? सीखने के लिए उनके परिवार की परंपरा कम नहीं है जो उन्हें कहीं बाहर से कुछ सीखना पड़े। लेकिन क्या वे सीखने को तैयार होंगे ? जिस तरीके से कांग्रेस के अंदर चमचा संस्कृति का बोलबाला है और ज़मीन से जुड़े लोगों को धक्के मारकर किनारे किया गया है क्या यह संस्कृति बदलना भी चाहते हैं राहुल गांधी ?

क्या राहुल गांधी इस बात को स्वीकार करने को तैयार होंगे कि मध्य प्रदेश में तेरह-तेरह मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त की जांच, हर रोज़ भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े खुलासे होने के वावजूद अगर शिवराज सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से को कांग्रेस अपनी तरफ नहीं मोड़ पाई तो उसका एक बड़ा कारण ऐन समय पर एक राजघराने के युवराज को कांग्रेस की बागडोर सौंपना भी रहा ?

जिस विकास का राग राहुल गांधी पिछले साढ़े चार साल से अलाप रहे हैं, जनता ने उस विकास को धूल चटा दी। लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस का नेतृत्व इस हकीकत पर मंथन करने को तैयार भी होगा!

हां, यह बात सही है कि कॉरपोरेट मीडिया ने अपनी ताकत दिखा दी है और यह साबित कर दिया है कि शहरी क्षेत्रों में वह परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता हासिल कर चुका है। “आप” कॉरपोरेट मीडिया का लिटमेस टेस्ट था, जिसमें उसे जीत हासिल हुई है और अब इससे भी ज्यादा ताकत के साथ लोकसभा चुनाव में कॉरपोरेट मीडिया प्रचार करेगा लेकिन आप के लिए नहीं बल्कि नमो के लिए. ...

अमलेन्दु उपाध्याय: लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं। http://hastakshep.com/oldold के संपादक हैं.